Manmohan Singh: विदेश से लौटकर सो रहे मनमोहन को जगाकर दिया गया वित्त मंत्री बनने का ऑफर, फिर बदला देश का भाग्य
Manmohan Singh: जनवरी, 1991 में भारत के पास मात्र 89 करोड़ डॉलर की विदेशी मुद्रा रह गई थी जिससे महज दो सप्ताह के आयात का खर्चा ही जुटाया जा सकता था। ऐसे कठिन समय में पीवी नरसिम्हा राव ने डॉ मनमोहन सिंह को वित्त मंत्रालय सौंप दिया। हालांकि डॉ. मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री बनने की कहानी काफी दिलचस्प रही, आइए इस बारे में जानें।
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जनवरी, 1991 में भारत के पास मात्र 89 करोड़ डॉलर की विदेशी मुद्रा रह गई थी जिससे महज दो सप्ताह के आयात का खर्चा ही जुटाया जा सकता था। ऐसे कठिन समय में पीवी नरसिम्हा राव ने डॉ मनमोहन सिंह को वित्त मंत्रालय सौंप दिया। हालांकि डॉ. मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री बनने की कहानी काफी दिलचस्प रही, आइए इस बारे में जानें।
देश के बिगड़ते आर्थिक हालात को थामने के लिए राव ने चुना था मनमोहन को
20 जून, 1991 की शाम नवनियुक्त प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से उनके कैबिनेट सचिव नरेश चंद्रा मिले और उन्हें 8 पेज का एक टॉप सीक्रेट नोट दिया। इस नोट किन कामों को प्रधानमंत्री को तुरंत तवज्जो देनी चाहिए, उनका जिक्र था। जब राव ने वो नोट पढ़ा तो हक्का-बक्का रह गए। उन्होंने चंद्र से पूछा-.'क्या भारत की आर्थिक हालत इतनी खराब है ?' चंद्रा का जवाब था, 'नहीं सर, वास्तव में इससे भी ज्यादा खराब है।' उस समय भारत के विदेशी मुद्रा भंडार की हालत इतनी खराब थी कि वो अगस्त, 1990 तक यह 3 अरब 11 करोड़ डॉलर ही रह गया था।जनवरी, 1991 में भारत के पास मात्र 89 करोड़ डॉलर की विदेशी मुद्रा रह गई थी जिससे महज दो सप्ताह के आयात का खर्चा ही जुटाया जा सकता था। 1990 के खाड़ी युद्ध के कारण तेल की कीमतों में तिगुनी वृद्धि हुई थी। कुवैत पर इराक के हमले की वजह से भारत को अपने हज़ारों मज़दूरों को वापस भारत लाना पड़ा थ। नतीजा ये हुआ था कि उनकी ओर से भेजी जाने वाली विदेशी मुद्रा पूरी तरह से रुक गई थी। ऊपर से भारत की राजनीतिक अस्थिरता और मंडल आयोग की सिफारिशों के खिलाफ उभरा जन आक्रोश अर्थव्यवस्था को कमजोर किए जा रहा था। देश को इस कठिन हालात से बाहर लाने के लिए उस समय देश के प्रधानमंत्री रहे पीवी नरसिम्हा राव ने डॉ. मनमोहन सिंह को चुना था।
सो रहे मनमोहन सिंह को जगाकर वित्त मंत्री बनने के लिए मनाया गया
भारत की ओर से अस्सी के दशक में लिए गए अल्पकालीन ऋण की ब्याज दर बढ़ गई थी। महंगाई दर बढ़ कर 16.7 फ़ीसदी हो गई थी। इन कठिन आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए तत्कालीन पीएम पीवी नरसिम्हा राव अपने मंत्रिमंडल में एक पेशेवर अर्थशास्त्री को बतौर वित्त मंत्री रखना चाहते थे। उन्होंने अपने दोस्त और इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव रहे पीसी अलेक्ज़ेंडर से इस बारे में बात की। पीसी ने रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर आईजी पटेल और मनमोहन सिंह के नाम सुझाए। अलेक्ज़ेंडर मनमोहन सिंह के पक्ष में थे, इसलिए राव ने उन्हें ही मनमोहन सिंह को मनाने की ज़िम्मेदारी दे दी। पीसी एलेक्ज़ेंडर ने अपनी आत्मकथा 'थ्रू द कोरीडोर्स ऑफ़ पावर एन इनसाइडर्स स्टोरी' में लिखा, "20 जून को ही मैंने मनमोहन सिंह के घर फ़ोन लगाया। उनके नौकर ने मुझे बताया कि वो यूरोप गए हुए हैं और आज देर रात लौंटेंगे। 21 जून की सुबह साढ़े पांच बजे जब मैंने उन्हें फ़ोन किया तो उनके नौकर ने कहा कि साहब गहरी नींद में हैं। उन्हें जगाया नहीं जा सकता। मेरे बहुत जोर देने पर उसने मनमोहन लिंह को जगा दिया और वो फ़ोन लाइन पर आए। मैंने उनसे कहा कि मेरा आप से मिलना बहुत ज़रूरी है. मैं कुछ ही मिनटों में आपके घर पहुंच रहा हूँ। जब मैं उनके घर पहुंचा तो मनमोहन सिंह दोबारा सो चुके थे।" बकौल अलेक्जेंडर, मनमोहन सिंह को फिर किसी तरह जगाया गया। अलेक्जेंडर ने उनको नरसिम्हा राव का संदेश दिया कि वो उन्हें वित्त मंत्री बनाना चाहते हैं। सिंह ने अलेक्जेंडर पूछा, आपकी राय क्या है ? जवाब मिला, "अगर मैं इसके खिलाफ़ होता तो इतने अस्वाभाविक समय पर आपसे मिलने न आता।"

वित्त मंत्री की कुर्सी मनमोहन को सौंप कर पीएम राव ने साफ कह दी थी यह बात
शपथ लेने से पहले नरसिम्हा राव ने मनमोहन सिंह से कहा था, "मैं आपको काम करने की पूरी आज़ादी दूंगा। अगर हमारी नीतियाँ सफल होती हैं तो हम सब उसका श्रेय लेंगे। लेकिन अगर हम असफल होते हैं तो आपको जाना पड़ेगा।" 24 जुलाई, 1991 को दिल्ली में भयानक गर्मी थी। पहली बार नेहरू जैकेट पहने और आसमानी रंग की पगड़ी बाँधे हुए मनमोहन सिंह ने अपने भाषण की शुरुआत में कहा कि वो राजीव गांधी के आकर्षक और मुस्कराते हुए चेहरे को मिस कर रहे हैं। जयराम रमेश ने अपनी एक किताब में लिखा है, 'उन्होंने अपने पूरे भाषण के दौरान उस परिवार का बार बार नाम लिया जिसकी नीतियों और विचारधारा को वो अपने बजट के माध्यम से सिरे से पलट रहे थे।' मनमोहन सिंह ने अपने बजट में न सिर्फ़ खाद पर दी जा रही सब्सिडी को 40 फ़ीसदी कम किया बल्कि चीनी और एलपीजी सिलेंडर के दाम भी बढ़ा दिए। उन्होंने अपने भाषण का अंत विक्टर ह्यूगो की मशहूर पंक्ति से किया, 'उस विचार को कोई नहीं रोक सकता जिसका समय आ पहुंचा हो।' इस तरह नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह ने मिल कर लाइसेंस राज के तीन स्तंभों- सार्वजनिक क्षेत्र का एकाधिकार, निजी कारोबार को सीमित करना और विश्व बाज़ार से अलगाव को ध्वस्त कर दिया था।
मनमोहन सिंह का पूरा सफर एक नजर में
- 1954: पंजाब विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की।
- 1957: कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से इकॉनमिक्स ट्रिपोस (तीन वर्षीय डिग्री प्रोग्राम)।
- 1962: ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में डी.फिल।
- 1971: वाणिज्य मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार के रूप में भारत सरकार में शामिल हुए।
- 1972: वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार नियुक्त हुए।
- 1980-82: योजना आयोग के सदस्य।
- 1982-1985: भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर।
- 1985-87: योजना आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में कार्य किया।
- 1987-90: जिनेवा में दक्षिण आयोग के महासचिव।
- 1990: आर्थिक मामलों पर प्रधानमंत्री के सलाहकार नियुक्त हुए।
- 1991: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष नियुक्त हुए।
- 1991: असम से राज्यसभा के लिए चुने गए और 1995, 2001, 2007 और 2013 में फिर से चुने गए।
- 1991-96: पी वी नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री।
- 1998-2004: राज्यसभा में विपक्ष के नेता।
- 2004-2014: भारत के प्रधानमंत्री।