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नफा-नुकसान का गणित: सरकारी प्रतिभूतियों में समझदारी से करें निवेश, इन बातों का रखें ध्यान

Mon, 15 Nov 2021 06:37 AM IST
देव कश्यप बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: देव कश्यप Updated Mon, 15 Nov 2021 06:37 AM IST
सार

रिजर्व बैंक ने खुदरा निवेशकों के लिए भी सरकारी प्रतिभूतियों के सीधे रास्ते खोल दिए हैं। एफडी से ज्यादा ब्याज होने के कारण वरिष्ठ नागरिकों के लिए आकर्षक विकल्प बन सकता है। सरकार की गारंटी से इस पर डिफॉल्ट का जोखिम तो नहीं रहता, लेकिन ब्याज में बदलाव का असर दिखता है। प्रतिभूतियों में निवेश का नफा-नुकसान बताती प्रमोद तिवारी की रिपोर्ट-

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Invest wisely in government securities keep these things in mind
निवेश (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : pixabay

विस्तार

निवेश सलाहकार संदीप जैन का कहना है कि रिजर्व बैंक ने कोरोनाकाल में नीतिगत ब्याज दरें (रेपो रेट) 2.5 फीसदी घटा दी हैं। इससे एफडी, पीपीएफ, एनएससी सहित सभी लघु बचत योजनाओं पर ब्याज दरों में गिरावट आई है।

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अब खुदरा निवेशक गिल्ट खातों के जरिये सीधे प्रतिभूतियों में पैसे लगा सकेंगे, जिससे टीयर-2 और टीयर-3 शहरों के छोटे निवेशकों के साथ सेवानिवृत्त और वरिष्ठ नागरिकों का रुझान भी इसमें बढ़ेगा। प्रतिभूतियों की ओर ऐसे निवेशक भी आकर्षित होंगे, जो अभी तक सिर्फ एफडी और एलआईसी जैसे निश्चित रिटर्न वाले विकल्पों में ही पैसे लगाते थे। प्रतिभूतियों पर ब्याज उनके जारी होने के समय ही निश्चित कर दिया जाता है, जिससे इन पर बाजार के उतार-चढ़ाव का असर नहीं पड़ता।
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7.17 फीसदी तक ब्याज मिलता है अभी सरकारी प्रतिभूतियों पर
कोरोना का खतरा कम होने के साथ रिजर्व बैंक फिर रेपो रेट बढ़ाने पर विचार कर सकता है। एक साल में प्रतिभूतियों पर एफडी के मुकाबले काफी ज्यादा (7.17 फीसदी तक) रिटर्न मिला है। लेकिन ब्याज में इजाफा होने के बाद रिटर्न पर सीधा असर दिखेगा। आरबीआई दरें बढ़ाता है तो अभी प्रतिभूतियां खरीदने वाले निवेशकों को कम ब्याज की पेशकश होगी, जबकि बाद में इसकी ब्याज दरें भी बढ़ सकती हैं। लिहाजा ऐसे निवेशकों को ज्यादा मुनाफे पर प्रतिभूति बेचना मुश्किल होगा।
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ऐसे समझें नफा-नुकसान का गणित
प्रतिभूतियों के मूल्य और प्रतिफल में उल्टा संबंध होता है। इसका मतलब है कि जब ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो इसकी मांग घटने लगती है और इस पर नए निवेशक को ज्यादा रिटर्न मिलता है। वहीं, पहले खरीदी प्रतिभूतियों के निवेशकों को नुकसान उठाना पड़ता है। उदाहरण के लिए, कोई निवेशक 7 फीसदी ब्याज दर वाली प्रतिभूतियां खरीदता है और ब्याज बढ़ने पर कुछ साल बाद उस पर 7.5 फीसदी या 8 फीसदी का ब्याज पेश किया जाता है, तो नए निवेशक ज्यादा ब्याज वाली प्रतिभूतियों में ही पैसे लगाना पसंद करेंगे। ऐसे में मौजूदा निवेशकों को अपनी प्रतिभूतियां बेचना मुश्किल हो जाएगा। अगर ब्याज दरें घटती हैं, तो आपकी प्रतिभूतियों की मांग बढ़ जाएगी और आप ज्यादा मुनाफा कमा सकेंगे।


रकम लगाने से पहले ये जानकारी जरूरी

  • प्रतिभूतियों में 10 साल जैसी लंबी अवधि के लिए पैसे लगाने पर ब्याज का जोखिम कम हो जाता है।
  • पूरी तरह सुरक्षित विकल्प तलाशने वालों के लिए प्रतिभूतियां बेहतर मौका साबित हो सकती हैं।
  • हर प्रतिभूति की परिपक्वता अवधि अलग-अलग होती है और उसी हिसाब से ब्याज दरें तय की जाती हैं।
  • निवेशक को ब्याज दरों पर निगाह रखनी होगी और योजना में एंट्री व एग्जिट का सही अनुमान लगाना होगा।

रिटर्न पर टैक्स भी देना होगा
सरकारी प्रतिभूतियों के ब्याज का छमाही भुगतान होता है, जिस पर एफडी की तरह टीडीएस तो नहीं कटता लेकिन अन्य स्रोत से आय मानकर टैक्स लिया जाता है। अगर ब्याज दरों में बदलाव होता है, तो यह पूंजीगत लाभ माना जाएगा। इस पर अवधि के हिसाब से एलटीजीसी पर 10 फीसदी और एसटीजीसी पर स्लैब के हिसाब से टैक्स लगेगा। -अनुज गुप्ता, निवेश सलाहकार, आईआईएफएल सिक्योरिटीज

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