{"_id":"63833f4b1db9202ee0217ab3","slug":"gujarat-bandhani-making-business-in-jamnagar-provides-employment-to-50000-people","type":"story","status":"publish","title_hn":"Bandhani: बांधनी ने जामनगर को दिलाई वैश्विक पहचान, इससे चलती है 50 हजार से ज्यादा लोगों की रोजी-रोटी","category":{"title":"Business Diary","title_hn":"बिज़नेस डायरी","slug":"business-diary"}}
Bandhani: बांधनी ने जामनगर को दिलाई वैश्विक पहचान, इससे चलती है 50 हजार से ज्यादा लोगों की रोजी-रोटी
Sun, 27 Nov 2022 04:13 PM IST
शिव शरण शुक्ला
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, जामनगर
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, जामनगर
Published by: शिव शरण शुक्ला
Updated Sun, 27 Nov 2022 04:13 PM IST
सार
बांधनी कपड़ों की रंगाई और उस पर कलाकृतियां बनाने की एक पारंपरिक कला का रूप है। इसका उपयोग साड़ी, दुपट्टे और स्टोल के लिए कपड़ा सामग्री बनाने में किया जाता है। इस कला ने जामनगर को विश्वव्यापी पहचान दिलाई है। इस काम में केवल पुरुष ही नहीं बल्कि वहां की महिलाओं का भी बड़ा योगदान रहता है।
विज्ञापन
बांधनी।
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
कपड़ों की डाई और टाई करने की अति प्राचीन बांधनी कला केवल राजस्थान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों और गुजरात और वहां भी विशेष रूप से जामनगर में खासी प्रचलित है। जामनगर में रहने वाले लोगों की बड़ी संख्या इस कारोबार से जुड़ी है। जानकारी के मुताबिक, बांधनी बनाने का व्यवसाय जामनगर में कम से कम 50,000 लोगों के लिए रोजगार पैदा करके आजीविका प्रदान करता है।
विज्ञापन
बांधनी ने जामनगर को दिलाई वैश्विक पहचान
बता दें कि बांधनी कपड़ों की रंगाई और उस पर कलाकृतियां बनाने की एक पारंपरिक कला का रूप है। इसका उपयोग साड़ी, दुपट्टे और स्टोल के लिए कपड़ा सामग्री बनाने में किया जाता है। इस कला ने जामनगर को विश्वव्यापी पहचान दिलाई है। इस काम में केवल पुरुष ही नहीं बल्कि वहां की महिलाओं का भी बड़ा योगदान रहता है। यहां के पुरुष कपड़े की रंगाई करते हैं और महिलाएं उन्हें बांधती हैं। एक व्यवसायी सलीम ने बताया कि यह हाथ से किया जाने वाला काम है और इसमें मशीनों से कोई भी काम नहीं होता है।
विज्ञापन
महिलाओं को भी मिला रोजगार
जामनगर में बांधनी बनाने से यहां की महिलाओं को रोजगार भी मिला है जिससे वे अपना घर चलाने और अपने बच्चों की शिक्षा का प्रबंधन करने में सक्षम हैं। इस काम में लगी महिलाओं का कहना है कि वेहद कठिन काम होने के बावजूद वे पूरे मन से बांधनी बनाने का काम करते हैं। उन्होंने कहा कि यह हमारी पारंपरिक विरासत है और इसे ऐसे ही संजोकर चलना है।
विज्ञापन
पर्यावरण और स्वास्थ्य के अनुकूल रंगो का होता है प्रयोग
उन्होंने बताया कि लगभग 50 साल पहले, कपड़ों की रंगाई के लिए रासायनिक रंगों का उपयोग किया जाता था, वे ना तो पर्यावरण के अनुकूल थे और ना ही स्वास्थ्य के। रासायनिक रंगों के कारण अक्सर भारतीयों और यूरोपीय लोगों को त्वचा की एलर्जी जैसे रोग हो जाते हैं। ऐसे में सरकार ने कदम उठाते हुए रंगो का निर्माण करने वाले उद्योग पतियों को हमारी मांग के अनुसार और पर्यावरण की अनुकूलता के मुताबिक रंग बनाने के लिए कहा। सरकार की नीतियों के बाद अब यहां से निर्यात किए जाने वाले 95 प्रतिशत बांधनी को पर्यावरण के अनुकूल रंगों से बनाया जाता है।
वहीं, बांधनी के एक अन्य व्यवसायी विबोध शाह ने बताया कि जामनगर की बांधनी के फेसम होने की एक और वजह भी है। और वो है यहां की रंगाई प्रक्रिया और प्रयोग किए जाने वाले पानी, जो इसे एक निश्चित रंग देता है जो आसानी से हल्का नहीं होता है।
मिला है जीआई टैग
विबोध शाह ने बताया कि जामनगर की बांधनी को जीआई टैग भी मिला हुआ है। यहां से भारत के अलग-अलग हिस्सों और भारत के बाहर भी बांधनी का निर्यात किया जाता है। खासकर उन देशों में जहां गुजराती और मारवाडी भारतीय लोग रहते हैं। इसके अलावा टीवी सीरियल और बॉलीवुड में भी इसकी अच्छी खासी मांग रहती है। फिल्मों और सीरीयलों की शूटिंग के कपड़ों में इसका प्रयोग होता है। हमारे यहां के कारीगर ग्राहक की मांग के अनुसार कपड़े की डिजाइन तैयार करते हैं।
उन्होंने कहा कि भारत सरकार के वोकल फॉर लोकल कैंपेन की वजह से हमें उनकी तरफ से फ्री स्टॉल भी मिलते हैं और हमें उनका सपोर्ट भी मिलता है। इसके अलावा, सरकार कारीगरों को ऑनलाइन पोर्टल पर खुद को पंजीकृत करने में भी मदद करती है जो इसकी बिक्री को प्रभावित करती है।