नोटबंदी के 50 दिन: कहां से चले, कहां आ गए हम
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8 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नाटकीय रूप से नोटबंदी की घोषणा की थी। इसके तहत 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों को अर्थव्यवस्था में चलन से बाहर कर दिया गया। सरकार ने इस कदम को भारत के कालेधन पर हमला बताया।
साल 2012-13 के लिए किए गए एक अनुमान के मुताबिक भारतीय अर्थव्यवस्था में जीडीपी या सकल घरेलू उत्पाद का 62 फीसदी कालाधन है। कालेधन का नतीजा नीतियों की नाकामी के तौर पर देखने को मिलता है। इससे गरीबी बनी रहती है।
प्रधानमंत्री को यह बात मालूम थी कि करेंसी के 86 फीसदी मूल्य के बराबर के बैंक नोटों को चलन से हटाने से अर्थव्यवस्था में गंभीर दिक्कतें पैदा होंगी। हालांकि उन्होंने लोगों से 50 दिनों तक साथ देने की अपील की। अब यह मियाद खत्म हो गई है।
क्या समाप्त हुई कालेधन की समस्या
क्या नोटबंदी ने भारत में कालेधन की समस्या को खत्म कर दिया है और इस नोटबंदी की वजह से आम लोगों को खासकर गरीब तबके को पेश आ रही दिक्कतें समाप्त हो गई हैं? नोटबंदी का कदम उठाने के पीछे बुनियादी समझदारी यह थी कि कालेधन का मतलब नगदी से है।
इसलिए ये माना गया कि पुरानी करेंसी को अर्थव्यवस्था में चलन से हटाते ही कालाधन खत्म हो जाएगा। यह अंदाजा ही गलत था।
काली कमाई एक प्रक्रिया है जबकि ब्लैक कैश काली कमाई से होने वाली बचत है। पहले तो जरूरत इस बात की थी कि काली कमाई के रास्ते बंद किए जाएं। नकदी सोख लेने का ये मतलब हरगिज नहीं होता कि नशीले पदार्थों का कोई तस्कर अपना धंधा बंद कर देगा।
अधूरी तैयारी से उठाया कदम
सरकार ने इस तरह का कदम उठाने के लिए पूरी तैयारी नहीं कर रखी थी। उसे जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह कितना मुश्किल है और इसका खामियाजा पूरी अर्थव्यवस्था को उठाना पड़ेगा। लेनदेन को अंजाम देने के लिए पैसे की जरूरत होती है और इससे लोगों की आमदनी होती है।
कैश की कमी से लेनदेन पर खराब असर पड़ा है, खासकर असंगठित क्षेत्रों में जहां नगद में ही ज्यादातर सौदे होते हैं। नतीजतन पहले बेरोजगारी बढ़ी और किसानों-मजदूरों के बीच बेचैनी आई। मांग में कमी ने संगठित क्षेत्र को भी प्रभावित किया है।
भले ही खाते-पीते लोगों ने प्लास्टिक मनी और इलेक्ट्रॉनिक कैश का विकल्प चुन लिया, लेकिन उसने भी अनिश्चितता को देखते हुए रोके जा सकने वाले खर्चे टाल दिए। बड़े पैमाने पर पेश आ रही दिक्कतों की खबरों से सरकार घबरा गई और नोटबंदी से जुड़े नियम-कायदों में 60 से ज्यादा संशोधन/बदलाव किए गए।
कैश जमा करने की मची होड़
इससे आम लोगों और कारोबारियों के बीच अनिश्चितता का माहौल और बढ़ा। लोग बड़े पैमाने पर करेंसी जमा करने लगे हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया जो कैश जारी कर रहा है, लोग उसे स्टॉक कर रहे हैं न कि लेनदेन। गरीब लोगों और ग्रामीण इलाकों में इससे नगदी की कमी बढ़ गई है।
भले ही बैंकों और एटीएम के बाहर लगी कतारें छोटी हुईं हों और रिजर्व बैंक पहले से ज्यादा नगदी जारी कर रहा हो, इसके बावजूद कैश की कमी का संकट जारी रहेगा क्योंकि पिछले 15 सालों में जितने नोट छापे गए, उसकी भरपाई करने में टकसालों को आठ महीने से कम वक्त नहीं लगने वाला है।
वह भी तब जब सरकार के टकसाल लगातार तीन शिफ्ट काम करेंगे तभी यह हो पाएगा। इसके लिए जरूरी कागज और स्याही कहां से आएगी? नोटों की जमाखोरी का मतलब यह भी हुआ कि ज्यादा करेंसी छापनी होगी। और आखिरकार कम कीमत वाले नोट ज्यादा छापने की जरूरत होगी तो इसके लिए ज्यादा संसाधन और वक्त भी लगेगा। इस बीच सरकार की बेचैनी भी उसके फैसलों में देखने को मिली।
अपने ही फैसले पर स्थिर नहीं है सरकार
दूसरी बात तो बेमतलब की जान पड़ती है क्योंकि पुराने नोट अब वैध करेंसी रही नहीं तो किसी के रद्दी कागज रखने से क्या फर्क पड़ता है।
सरकार को जैसे ही इस बात का एहसास हुआ कि काले धन को इससे खरोंच भी नहीं आने वाली है तो उसने अपनी दलील बदल दी। सरकार की ओर से कहा गया कि नोटबंदी से डिजिटल और कैशलेस अर्थव्यवस्था का रास्ता खुलेगा। लेकिन एक ऐसे देश में जहां बुनियादी ढांचे का अभाव है, वहां यह सब कुछ इतनी जल्दी नहीं होने वाला है। ऐसे फैसलों को तामील करने के लिए बड़े पैमाने पर तैयारियों की जरूरत होती है और आखिरकार अगर थोड़ी बहुत कामयाबी मिल भी जाती है तो कालेधन पर लगामे कसने के शुरुआती मकसद को देखते हुए इसे सफलता नहीं कहा जा सकता।
नोटबंदी के फैसले का एक राजनीतिक मकसद भी था ताकि सरकार अपना गरीब समर्थक चेहरा पेश कर सके। लोग इसके भुलावे में आ गए और यही वजह थी कि कठिनाइयां पेश आने के बावजूद जनता ने गुस्से में प्रतिक्रिया नहीं दी। आम लोगों ने प्रधानमंत्री की गंभीरता पर यकीन किया और सरकार को 50 दिनों की मोहलत देने के मूड में दिखे। जैसे-जैसे दिक्कतें बढ़ीं और लोगों को लगने लगा कि कालेधन वाले बच गए जबकि आम नागरिकों को कतारों में हर तरह की तकलीफों का सामना करने के लिए खड़ा कर दिया गया, चीजें बदल भी सकती हैं। आखिर में कहें तो सरकार ने हिसाब-किताब लगाने में बड़ी गलती कर दी है। एक ठीक-ठाक सी चल रही अर्थव्यवस्था अचानक मुश्किल में दिखने लगी। जबकि काले धन से लड़ने का शुरुआती मकसद अधूरा रहा। बैंक संकट में हैं, बेरोजगारी बढ़ी है, कारोबार के मुनाफे में कटौती हुई और निवेश गिर रहा है। लंबे समय में पड़ने वाले नतीजों के लिहाज से देखें तो मंदी के हालात की बुनियाद पड़ गई है।