डी सुब्बाराव: तेज आर्थिक वृद्धि के बावजूद रोजगार संकट, पूर्व आरबीआई गवर्नर ने बताई भारत की चुनौती
पूर्व आरबीआई गवर्नर डी सुब्बाराव ने कहा कि भारत की तेज आर्थिक वृद्धि के बावजूद रोजगार सृजन एक बड़ी चुनौती है। उन्होंने निजी निवेश, श्रम-गहन विनिर्माण और बेहतर मानव पूंजी पर जोर दिया।
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पूर्व आरबीआई गवर्नर डी सुब्बाराव ने कहा है कि भारत के लिए तेज आर्थिक वृद्धि हासिल करने के साथ-साथ उसे रोजगार-गहन बनाना भी एक बड़ी चुनौती है। उन्होंने बताया कि सात फीसदी या उससे अधिक की वृद्धि बनाए रखने के लिए मजबूत निजी निवेश आवश्यक है। इसके लिए श्रम-गहन विनिर्माण, बेहतर मानव पूंजी और वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में गहरा एकीकरण जरूरी है। सुब्बाराव ने भारत की मध्यम अवधि की संभावनाओं पर आशा व्यक्त की, लेकिन आत्मसंतुष्ट न होने की बात कही।
भारत की पहली तिमाही की 7.8 फीसदी वृद्धि दर्शाती है कि अर्थव्यवस्था उम्मीद से अधिक लचीली है। हाल ही में, विश्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष के लिए भारत का जीडीपी वृद्धि अनुमान 0.5 प्रतिशत अंक बढ़ाकर 7.1 फीसदी कर दिया है। यह मजबूत घरेलू मांग और निर्यात से समर्थित है, भले ही वैश्विक चुनौतियां मौजूद हों। एशियाई विकास बैंक, ओईसीडी और रेटिंग एजेंसियां एस एंड पी व फिच ने भी वित्त वर्ष 2027 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि लगभग 7 फीसदी रहने का अनुमान लगाया है।
ओईसीडी ने तो वित्त वर्ष 2027 के लिए अपना जीडीपी वृद्धि अनुमान 80 आधार अंक बढ़ाकर 7.1 फीसदी कर दिया है। सुब्बाराव ने कहा कि पहली तिमाही की वृद्धि को तीन कारकों ने समर्थन दिया है। घरेलू खपत लचीली बनी हुई है और बुनियादी ढांचे में सार्वजनिक निवेश ने मांग को बढ़ावा दिया है। विनिर्माण और सेवाएं, विशेषकर वित्तीय, रियल एस्टेट तथा पेशेवर सेवाएं, अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं।
क्या तेज आर्थिक वृद्धि पर्याप्त रोजगार पैदा कर रही है?
सुब्बाराव के अनुसार, समस्या यह नहीं है कि वृद्धि रोजगार पैदा नहीं करती, बल्कि यह है कि वृद्धि की संरचना उसकी गति जितनी ही महत्वपूर्ण है। अर्थव्यवस्था पूंजी-गहन उद्योगों, स्वचालन और कम लोगों को रोजगार देने वाले क्षेत्रों के जरिये तेजी से बढ़ सकती है। इससे उत्पादन बढ़ता है, लेकिन रोजगार आनुपातिक रूप से नहीं बढ़ता, जो भारत के लिए एक केंद्रीय चिंता है। कृषि क्षेत्र में लाखों श्रमिक अल्प-रोजगार वाले हैं। कई सेवा नौकरियां अनौपचारिक, कम उत्पादकता वाली और कम वेतन वाली हैं। शिक्षित युवा भी उपयुक्त रोजगार खोजने के लिए संघर्ष करते हैं, क्योंकि अर्थव्यवस्था उनके कौशल से मेल खाने वाले पर्याप्त रोजगार सृजित नहीं कर रही है।
रोजगार-गहन वृद्धि के लिए क्या उपाय जरूरी हैं?
सुब्बाराव ने कहा कि यह केवल श्रम-बाजार की समस्या नहीं, बल्कि एक वृहद-आर्थिक चिंता है। यदि वृद्धि आबादी के एक बड़े वर्ग के लिए आय में नहीं बदलती, तो खपत मांग बाधित रहती है। इससे कारोबारों के निवेश और विस्तार का प्रोत्साहन कमजोर होता है, जो बदले में वृद्धि को नुकसान पहुंचाता है और एक दुष्चक्र बनाता है। हमें कपड़ा, परिधान, जूते-चप्पल और खाद्य प्रसंस्करण सहित श्रम-गहन विनिर्माण को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। हमें उत्पादक सेवाओं में रोजगार का विस्तार करना चाहिए। व्यावसायिक प्रशिक्षण में सुधार करना और छोटे कारोबारों को बड़े, अधिक उत्पादक उद्यमों में बदलना आसान बनाना चाहिए।
क्या जीडीपी अनुमानों की कार्यप्रणाली विश्वसनीय है?
सुब्बाराव ने जीडीपी अनुमानों की कार्यप्रणाली पर भी बात की। उन्होंने कहा कि कार्यप्रणाली को अद्यतन करना आवश्यक है क्योंकि अर्थव्यवस्था बदलती रहती है। चार सुधार विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं: पहला है आधार वर्ष को रिकॉर्ड पर रखना, अनौपचारिक क्षेत्र के बेहतर अनुमान, डबल डिफ्लेशन और बेहतर उत्पादक-मूल्य उपाय। सैद्धांतिक रूप से ये सुधार हैं, लेकिन बेहतर कार्यप्रणाली स्वचालित रूप से हर अनुमान के सही होने की गारंटी नहीं देती। कुछ अनुमानों, जैसे विनिर्माण डिफ्लेटर और जीडीपी आंकड़ों व आर्थिक गतिविधि के अन्य संकेतकों के बीच अंतर पर वैध प्रश्न हैं। इन पर पारदर्शी तकनीकी जांच होनी चाहिए।