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Chemical Sector: क्या भारत के रसायन उद्योग के लिए चुनौती बन सकता है चीन? जानें रिपोर्ट का दावा

Thu, 15 Jan 2026 11:56 AM IST
रिया दुबे बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: रिया दुबे Updated Thu, 15 Jan 2026 11:56 AM IST
सार

नुवामा की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का केमिकल सेक्टर चीन की भारी ओवरकैपेसिटी, कच्चे तेल और फीडस्टॉक की ऊंची कीमतों, डॉलर के मुकाबले रुपये की मजबूती और यूरोप-अमेरिका में कमजोर मांग से दबाव में है। 

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Could China pose a challenge to India's chemical industry? Learn about the report's claims
रसायन उद्योग (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Adobestock

विस्तार

देश का रसायन उद्योग इस समय कई संरचनात्मक और मैक्रो-आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है। ब्रोकरेज फर्म नुवामा की एक रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की लगातार बनी हुई अधिक उत्पादान क्षमता, कच्चे तेल और फीडस्टॉक की ऊंची कीमतें, पश्चिमी देशों में कमजोर मांग और घरेलू नीतिगत अड़चनें,ये सभी भारतीय केमिकल कंपनियों पर दबाव बना रही हैं।

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चीन की ओवरकैपेसिटी सबसे बड़ा खतरा

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय केमिकल निर्माताओं के लिए सबसे बड़ा संरचनात्मक जोखिम चीन से आता है। चीन का वैश्विक कमोडिटी केमिकल क्षमता में दबदबा बना हुआ है। सोडा ऐश, कास्टिक सोडा, फिनॉल, पीवीसी, पॉलीकार्बोनेट, एपॉक्सी रेजिन, टीडीआई, फ्थैलिक एनहाइड्राइड और एसिटिक एसिड जैसे कई प्रमुख उत्पादों में चीन के पास भारी उत्पादन क्षमता है।

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हालांकि वैश्विक मांग कमजोर है, इसके बावजूद चीन में प्लांट उपयोग दर आदर्श स्तर से काफी नीचे बनी हुई है, जिससे अंतरराष्ट्रीय कीमतें दबाव में रहती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी समर्थन प्राप्त चीनी कंपनियां घाटे में भी उत्पादन जारी रखती हैं, जिससे वैश्विक आपूर्ति-मांग संतुलन बिगड़ता है और भारतीय कंपनियों के लिए कीमतों व मार्जिन में टिकाऊ सुधार की संभावना सीमित हो जाती है।
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कच्चे तेल और फीडस्टॉक की ऊंची कीमतें

नुवामा ने कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमतों को भी सेक्टर के लिए बड़ी चिंता बताया है। महंगा कच्चा तेल नाफ्था, बेंजीन, प्रोपिलीन और एथिलीन जैसे प्रमुख फीडस्टॉक की लागत बढ़ा देता है। खास तौर पर ऊर्जा-प्रधान डाउनस्ट्रीम केमिकल चेन लंबे समय तक तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव के दौरान ज्यादा प्रभावित होती हैं।

रुपये की मजबूती से निर्यात पर असर

रिपोर्ट में डॉलर-भारतीय रुपये मुद्रा जोखिम को भी अहम बाधा बताया गया है। डॉलर के मुकाबले रुपये की मजबूती से भारतीय केमिकल कंपनियों की निर्यात आय घटती है, खासकर थोक और मिड-वैल्यू उत्पादों में। चूंकि यूरोप और अमेरिका भारत के प्रमुख निर्यात बाजार हैं, ऐसे में जब वैश्विक केमिकल कीमतें पहले से ही दबाव में हों, तो मुद्रा की मजबूती भारत की लागत संबंधी बढ़त को भी खत्म कर सकती है।

पश्चिमी देशों में कमजोर मांग

यूरोप और अमेरिका में लगातार सुस्ती का असर भी भारतीय कंपनियों पर पड़ रहा है।

  • आवास, उपभोक्ता वस्तुएं, एफएमसीजी, एग्रोकेमिकल, ऑटोमोबाइल और कंस्ट्रक्शन से जुड़े क्षेत्रों में कमजोर मांग के चलते वॉल्यूम ग्रोथ प्रभावित हुई है।
  • आवासीय निर्माण की कमजोरी से पीवीसी, कास्टिक सोडा और पॉलीकार्बोनेट की मांग घटी है।
  • वहीं एग्रोकेमिकल और फार्मा सेक्टर की सुस्ती से इंटरमीडिएट्स और सॉल्वेंट्स पर असर पड़ा है।

भारत में नीतिगत और क्रियान्वयन संबंधी अड़चनें

इसके अलावा, भारत के भीतर भी नीतिगत और कार्यान्वयन से जुड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए नुवामा ने कहा कि पर्यावरणीय मंजूरियों में देरी, एंटी-डंपिंग ड्यूटी का कमजोर क्रियान्वयन, और ऊंची लॉजिस्टिक्स व ऊर्जा लागत भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता को कम करती हैं।
रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि अगर मंजूरियों में तेजी और ज्यादा सहायक व्यापार नीतियां नहीं अपनाई गईं, तो यूरोप के औद्योगिक पतन से पैदा हुए अवसर का लाभ उठाने का मौका भारत गंवा सकता है।


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