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Bombay High Court: उद्योगपति गौतम अदाणी और राजेश अदाणी कथित बाजार विनियमन उल्लंघन मामले में बरी, ये है मामला
Mon, 17 Mar 2025 01:10 PM IST
कुमार विवेक
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: कुमार विवेक
Updated Mon, 17 Mar 2025 01:10 PM IST
सार
Bombay High Court: गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआईओ) ने 2012 में अदाणी एंटरप्राइजेज लिमिटेड (एईएल) और इसके प्रमोटर्स गौतम अदाणी और राजेश अदाणी के खिलाफ मामला शुरू किया गया था। इस दौरान एक आरोप पत्र दायर कर उन पर आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी का आरोप लगाया गया था। अब बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस मामले में गौतम अदाणी और राजेश अदाणी को बरी कर दिया है। आइए इस बारे में विस्तार से जानते हैं।
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गौतम अदाणी
- फोटो : amarujala.com
विस्तार
बॉम्बे हाईकोर्ट से सोमवार को अदाणी समूह के अध्यक्ष गौतम अदाणी और प्रबंध निदेशक राजेश अदाणी को बड़ी राहत मिली। दोनों को करीब 388 करोड़ रुपये के बाजार नियमन के कथित उल्लंघन के मामले से बरी कर दिया गया।
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गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआईओ) ने 2012 में अदाणी एंटरप्राइजेज लिमिटेड (एईएल) और इसके प्रमोटर्स गौतम अदाणी और राजेश अदाणी के खिलाफ मामला शुरू किया गया था। इस दौरान एक आरोप पत्र दायर कर उन पर आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी का आरोप लगाया गया था। 2019 में, दोनों उद्योगपतियों ने उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की, जिसमें उसी वर्ष के सत्र अदालत के आदेश को रद्द करने की मांग की गई, जिसमें उन्हें मामले से मुक्त करने से इनकार कर दिया गया था।
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सोमवार को हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति आरएन लड्ढा की एकल पीठ ने सत्र अदालत के आदेश को रद्द कर दिया और दोनों को मामले से बरी कर दिया। विस्तृत आदेश की प्रति बाद में उपलब्ध होगी। दिसंबर 2019 में उच्च न्यायालय ने सत्र अदालत के आदेश पर रोक लगा दी और इसे समय-समय पर बढ़ाया गया। 2012 में, एसएफआईओ ने अदाणी सहित 12 लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दायर किया, जिसमें उन पर आपराधिक षड्यंत्र और धोखाधड़ी का आरोप लगाया गया।
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लेकिन मई 2014 में मुंबई की एक मजिस्ट्रेट अदालत ने उन्हें मामले से बरी कर दिया। एसएफआईओ ने बरी करने के आदेश को चुनौती दी। नवंबर 2019 में एक सत्र अदालत ने मजिस्ट्रेट के आदेश को खारिज कर दिया और कहा कि एसएफआईओ ने अदाणी समूह की ओर से गैरकानूनी लाभ का मामला बनाया था। उद्योगपतियों ने उच्च न्यायालय में दायर अपनी याचिका में सत्र न्यायालय के आदेश को "मनमाना और अवैध" बताया। इस मामले में लगभग 388 करोड़ रुपये के बाजार विनियमन उल्लंघन का आरोप शामिल था। यह मामला एसएफआईओ की ओर से गई जांच के दौरान विनियामक अनुपालन और वित्तीय लेनदेन से जुड़ी चिंताओं के बाद सामने आई थी।
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