{"_id":"5f1234957e93ba397d37e47a","slug":"bank-sakhi-is-helping-financially-to-migrant-workers","type":"story","status":"publish","title_hn":"प्रवासी श्रमिकों का सहारा बनी बैंक सखी, वित्तीय लेन-देन से लेकर इन कामों में कर रही है मदद","category":{"title":"Business Diary","title_hn":"बिज़नेस डायरी","slug":"business-diary"}}
प्रवासी श्रमिकों का सहारा बनी बैंक सखी, वित्तीय लेन-देन से लेकर इन कामों में कर रही है मदद
Sat, 18 Jul 2020 05:00 AM IST
संजीव कुमार झा
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला
Published by: संजीव कुमार झा
Updated Sat, 18 Jul 2020 05:00 AM IST
विज्ञापन
बैंक सखी
- फोटो : amar ujala
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
लॉकडाउन के दौरान अपने-अपने घरों को लौटे प्रवासी श्रमिकों के लिए बैंक में खाता खोलने से लेकर रोजगार कार्यक्रमों में पंजीयन तक में बैंक सखी उनकी मदद कर रही हैं। बैंक सखियों के जिम्मे ग्रामीण विकास मंत्रालय के राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत केंद्र और राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली वित्तीय सुविधाओं का लाभ लेने में सहायता करना होता है।
विज्ञापन
इसके साथ ही इन बैंक सखियों के जिम्मे ग्रामीण इलाकों में घर बैठे बुजुर्गों को पेंशन, दिव्यांगों को उनके भत्तों का भुगतान, मनरेगा श्रमिकों का भुगतान दिलाने और किसी ग्रामीण को खाते से पैसा निकालने में सहायता करना रहता है।
विज्ञापन
खास बात यह है कि इस अभियान के चलते कई महिलाओं को भी रोजगार मिला है। इस समय देश में 63 लाख स्वयं सहायता समूह हैं जिनमें 690 लाख महिला सदस्य हैं जिनके वित्तीय मामलों की देखरेख बैंक सखियां कर रही हैं।
विज्ञापन
इन बैंक सखियों के चलते लॉकडाउन के दौरान किसी ग्रामीण क्षेत्र में किसानों से लेकर ग्रामीणों को अपने खाते से रुपये निकालने से लेकर वित्तीय लेन-देन करने में कोई तकलीफ नहीं हुई। उन्हें बैंक तक जाने की जहमत भी नहीं उठानी पड़ी। इस समय उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ में बड़े पैमाने पर बैंक सखियां अपनी सेवाएं दे रही हैं।
दसवीं पास होना जरूरी
बैंक सखी बनने के लिए 10वीं पास और अंकगणित का ज्ञान होना जरूरी है। महिलाएं जिनकी आयु 18 से 45 वर्ष होती है उन्हें साक्षात्कार के माध्यम से चुना जाता है। बैंक द्वारा उन्हें निर्धारित मानदेय दिया जाता है। 30 समूह पर एक बैंक सखी और 80 से 160 समूहों के खातों पर दो बैंक सखियों की नियुक्ति की जाती है। इसके बाद समूहों की संख्या के अनुसार सखियों की संख्या में गांवों के हिसाब से इजाफा किया जाता है।