एक्सप्लेनर: दावों की ऊंची उड़ान के बीच संकट में विमानन क्षेत्र, इंडिगो-एअर इंडिया सब परेशान; कहां हुई चूक?
भारत का एविएशन सेक्टर इन दिनों एक गहरे विरोधाभास के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ सरकार भारत को दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता एविएशन मार्केट बता रही है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी हकीकत विमानन कंपनियों के लिए डराने वाली है। हालिया आंकड़े बताते हैं कि देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो समेत पूरी इंडस्ट्री गंभीर दबाव में है। यह स्थिति सवाल उठाती है कि क्या यह संकट केवल खराब मैनेजमेंट का नतीजा है, या फिर नीतियों की खामियां और बाहरी झटके इसके लिए जिम्मेदार हैं?
विस्तार
भारतीय नागरिक उड्डयन (एविएशन) क्षेत्र इस समय एक अभूतपूर्व और गंभीर विरोधाभास से गुजर रहा है। एक तरफ देश में नए हवाई अड्डों का तेजी से विस्तार का दावा किया जा रहा है तो दूसरी तरफ प्रमुख एयरलाइंस गहरे वित्तीय संकट, विमानों की ग्राउंडिंग और ढांचागत कमियों के बोझ तले दबी हुई हैं। रेटिंग एजेंसी इक्रा (आईसीआरए) के अनुमानों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में भारतीय एविएशन इंडस्ट्री को 17,000 से 18,000 करोड़ रुपये (170 से 180 अरब रुपये) का भारी-भरकम शुद्ध घाटा होने की आशंका है। दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा एविएशन मार्केट बनने का दावा करने वाले भारत के आसमान पर आखिरकार यह संकट क्यों गहरा रहा है और एयरलाइंस का गणित कहां बिगड़ रहा है, आइए इसे विस्तार से समझते हैं।
आंकड़ों में छुपी गिरावट की कहानी क्या कह रही?
वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही (Q2FY27) के हालिया आंकड़े एविएशन इंडस्ट्री के लिए खतरे की घंटी हैं। इस तिमाही में घरेलू हवाई यात्रियों की संख्या गिरकर 3.67 करोड़ रह गई है। अगर इसकी तुलना पिछली तिमाही (Q1FY27) के 4.35 करोड़ यात्रियों से करें, तो यह 16% की भारी गिरावट है। वहीं, पिछले साल की इसी अवधि (Q2FY26) के 3.89 करोड़ यात्रियों के मुकाबले यह 6% की सालाना गिरावट है।
क्यों गहरे वित्तीय घाटे में डूब रही हैं भारतीय एयरलाइंस?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में चालू हवाई अड्डों की संख्या 2014 के 74 से बढ़कर 2025 तक लगभग 163 हो चुकी है और वित्त वर्ष 2023-24 में यात्री यातायात 37.6 करोड़ (376 मिलियन) के आंकड़े को छू चुका था। लेकिन मौजूदा जमीनी हकीकत काफी चिंताजनक है। एक तो देश में पहले सही विमानन कंपनियों की कमी है, दो-तीन ही बड़े खिलाड़ी बचे हैं और वे भी संघर्ष से जूझ रहे। बीते दिनों सरकार की ओर से कुछ नई विमानन कंपनियों को लाइसेंस जारी करने की खबर जरूर सामने आई पर ये कंपनियां अब भी बड़े पैमाने पर परिचालन शुरू करने की स्थिति में नहीं दिख रहे।
- क्षमता में गिरावट: ओएजी के सितंबर 2026 के आंकड़ों के अनुसार, भारत की कुल सीट क्षमता में साल-दर-साल 4.5% की गिरावट आई है और यह घटकर 2.27 करोड़ सीटें रह गई है। इसमें घरेलू क्षमता में 5.6% और अंतरराष्ट्रीय क्षमता में 2.1% की कमी दर्ज की गई है।
- क्षेत्रीय रूट बंद: उड़ान योजना के तहत वाणिज्यिक व्यवहार्यता और सरकारी सब्सिडी खत्म होने के कारण 100 से अधिक उड़ान मार्ग हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं।
फ्लीट ग्राउंडिंग ने दिग्गज एयरलाइनों को कैसे झकझोरा?
भारतीय उड्डयन क्षेत्र की सुस्ती के पीछे वैश्विक आपूर्ति शृंखला की विफलताएं और प्रैट एंड व्हिटनी (P&W) इंजन संकट एक मुख्य कारण हैं:
- इंडिगो: जब बाजार का लीडर संघर्ष करता है, तो पूरी इंडस्ट्री की सेहत का अंदाजा लग जाता है। जेफरीज और गोल्डमैन सैक्स जैसी ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म्स का अनुमान है कि फॉरेक्स (विदेशी मुद्रा) नुकसान से पहले, दूसरी तिमाही में इंडिगो को लगभग 695 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हो सकता है। इसके ऊपर लगभग 1,000 करोड़ रुपये का फॉरेक्स नुकसान (रुपये की गिरावट व क्रूड खर्च से) अलग से होने की आशंका है। यात्रियों की कमी के कारण विमानों में सीटें खाली जा रही हैं, लेकिन एयरलाइंस की फिक्स्ड कॉस्ट (जैसे लीज रेंट, कर्मचारियों का वेतन) में कोई कमी नहीं आई है। बाजार में लगभग 50% हिस्सेदारी रखने वाली इंडिगो के P&W इंजनों में गड़बड़ी के कारण दरारें आने की समस्या पैदा हुई। इसके परिणामस्वरूप जनवरी 2025 तक इंडिगो के बेड़े के 60 से 70 विमान पूरी तरह से ग्राउंडेड हो गए थे।
- एअर इंडिया और स्पाइसजेट: संकट केवल इंडिगो तक सीमित नहीं है। टाटा समूह के हाथों में जाने के बावजूद एअर इंडिया अभी भी अपनी फ्लीट के नवीनीकरण और पुरानी ऑपरेशनल समस्याओं से जूझ रही है। वहीं, स्पाइसजेट की स्थिति किसी से छिपी नहीं है; वित्तीय संकट, कानूनी विवादों और फंड की कमी के कारण इसके कई विमान ग्राउंडेड (खड़े) हैं। एअर इंडिया को आक्रामक विस्तार के बीच क्रू की कमी और मुंबई एयरपोर्ट के टी1 पुनर्विकास के कारण उड़ानों में कटौती का सामना करना पड़ रहा है। वहीं, स्पाइसजेट की बाजार हिस्सेदारी अगस्त 2026 तक घटकर मात्र 1.2% रह गई है और इसकी क्षमता में 45.2% की भारी गिरावट आई है, जिससे यह डीजीसीए की कड़ी निगरानी में है।
- गो फर्स्ट का दिवालियापन: गो फर्स्ट जैसी एयरलाइन P&W इंजनों की विफलता और बैकअप क्लेम की कमी के चलते दिवालिया होकर बंद हो गई।
महंगे एटीएफ और भारी-भरकम वैट ने कैसे बिगाड़ा गणित?
एयरलाइंस के कुल परिचालन खर्च का 30% से 40% हिस्सा अकेले एविएशन टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ) और लीज भुगतान में चला जाता है।
- जीएसटी से बाहर एटीएफ: एटीएफ पर जीएसटी लागू न होने के कारण एयरलाइनों को केंद्र की एक्साइज ड्यूटी के साथ-साथ राज्यों का अलग-अलग वैट चुकाना पड़ता है। तेलंगाना में वैट दर 35.20%, आंध्र प्रदेश में 31% और मध्य प्रदेश में 29% तक है, हालांकि दिल्ली और महाराष्ट्र ने इसे घटकर 7% किया है।
- टैक्स का भारी बोझ: 2014 से 2026 के बीच भारतीय एयरलाइनों ने ईंधन करों के रूप में करीब 1.62 लाख करोड़ रुपये चुकाए हैं, जिस पर उन्हें इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) का भी लाभ नहीं मिलता।
- भू-राजनीतिक दबाव: पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण लंबे हवाई मार्गों से ईंधन खपत बढ़ी है और डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने से विदेशी मुद्रा देनदारियां भारी पड़ रही हैं।
नीतिगत कमियां और बुनियादी ढांचे का अभाव संकट को कितना बढ़ा रहा?
उद्योग की इस बदहाली के पीछे विनियामक और ढांचागत कमियां भी जिम्मेदार हैं:
- विदेशों पर निर्भरता: भारत में विश्व स्तरीय एमआरओ सुविधाओं का अभाव है, जिसके कारण 85% मेंटेनेंस वर्क सिंगापुर और पोलैंड जैसे देशों में आउटसोर्स किया जाता है। खराब इंजनों की मरम्मत कर वापस आने में चार महीने तक का समय लग जाता है।
- पायलटों की भारी कमी: 2024 से 2026 के बीच उद्योग को 7,000 नए पायलटों की आवश्यकता थी, जबकि डीजीसीए ने 2020 से 2024 के दौरान केवल 5,700 वाणिज्यिक पायलट लाइसेंस (सीपीएल) जारी किए।
- सुरक्षा बनाम मुनाफा: डीजीसीए के नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अधीन होने से 'रेगुलेटरी कैप्चर' की स्थिति बनती है, जहां पायलटों के विश्राम (एफडीटीएल) जैसे सुरक्षा नियमों को लागू करने में लचीलापन दिखाया जाता है।
पश्चिम एशिया का संकट ने कैसे किया आग में घी डालने का काम?
इस आंतरिक संकट के बीच पश्चिम एशिया में चल रहा तनाव आग में घी डालने का काम कर रहा है। इस्राइल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल देखा जा रहा है। किसी भी एयरलाइन के कुल खर्च का लगभग 40-50% हिस्सा एविएशन टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ) पर जाता है। भारत में एटीएफ पर टैक्स का बोझ पहले से ही दुनिया में सबसे ज्यादा है। क्रूड महंगा होने का सीधा असर एयरलाइंस के मार्जिन पर पड़ेगा, जिससे उनके लिए मुनाफा कमाना लगभग असंभव हो जाएगा।
क्या नए सुधारों से बदल सकेगी बदलेगी तस्वीर?
सरकार ने 90 साल पुराने एयरक्राफ्ट एक्ट, 1934 को निरस्त कर नया 'भारतीय वायुयान अधिनियम, 2024' लागू किया है। इसके तहत सुरक्षा नियमों के उल्लंघन पर एक करोड़ रुपये तक का जुर्माना, सिंगल-विंडो क्लीयरेंस और पारदर्शी अपीलीय व्यवस्था का प्रावधान किया गया है। भारतीय उड्डयन क्षेत्र में अगर समय रहते करों को तार्किक बनाने, एटीएफ को जीएसटी के दायरे में लाने, स्वदेशी मेंटेनेंस (एमआरओ) ढांचे को मजबूत करने और डीजीसीए को पूरी तरह स्वायत्त बनाने पर ध्यान नहीं दिया गया, तो एयरलाइंस वित्तीय तबाही के इस चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पाएंगी।
भारत के एविएशन सेक्टर में अवसर की कमी नहीं हैं, लेकिन मौजूदा हालात बताते हैं कि केवल नए एयरपोर्ट बनाने या विमानों का बड़ा ऑर्डर देने से सफलता नहीं मिलेगी। जब तक सरकार टैक्स नीतियों को तर्कसंगत नहीं बनाती और एयरलाइंस अपने ऑपरेशनल खर्चों को नियंत्रित नहीं करतीं, तब तक भारतीय आसमान में उड़ने वाली कंपनियों के लिए 'प्रॉफिटेबिलिटी' (मुनाफा) एक दूर का सपना ही बनी रहेगी।