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Adani: 'संसाधनों को लूटने वाले देश ही अब कार्बन उत्सर्जन पर ज्ञान दे रहे', जानिए ऐसा क्यों बोले गौतम अदाणी
Tue, 09 Dec 2025 07:15 PM IST
कुमार विवेक
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: कुमार विवेक
Updated Tue, 09 Dec 2025 07:15 PM IST
सार
Adani: भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा बिजली उपभोक्ता देश है, लेकिन प्रति व्यक्ति आधार पर यह प्रति वर्ष 1,400 किलोवाट घंटे से भी कम बिजली की खपत करता है- जो वैश्विक औसत के आधे से भी कम है। यह आंकड़ा अमेरिका के दसवें हिस्से और यूरोप के पांचवें हिस्से के बराबर है। अदाणी समूह के मुखिया गौतम अदाणी ने धनबाद स्थित आईएसएम में यह बात कही। इस दौरान उन्होंने पश्चिमी देशों के बारे में और क्या कहा, आइए जानते हैं।
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गौतम अदाणी
- फोटो : PTI
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विस्तार
अदाणी समूह के प्रमुख गौतम अदाणी ने कार्बन उत्सर्जन पर दोहरे रवैये के लिए पश्चिमी देशों पर निशाना साधा है। गौतम अदाणी ने कहा है कि इतिहास के कुछ सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक देश अब अच्छी-अच्छी कहानियां बनाकर कहानियों के जरिए कार्बन कटौती पर व्याख्यान देते हैं। अदाणी ने इस स्थिति को 'नैरेटिव कोलोनाइजेशन' (कथात्मक उपनिवेशवाद) करार दिया और कहा कि इससे सावधान रहने की जरूरत है।
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आईआईटी (आईएसएम) धनबाद के शताब्दी समारोह में बोलते हुए उन्होंने कहा कि भारत को ऐसे समय में अपने विकास का रास्ता स्वयं तय करना होगा, जब वैश्विक गठबंधन टूट रहे हैं और दुनिया के प्रमुख देश मुख्य रूप से अपने हित में काम कर रहे हैं। अदाणी ने कहा, "भारत को बाहरी दबावों को अपनी विकास प्राथमिकताओं को आकार देने की अनुमति नहीं देनी चाहिए या अपने विकास पर अपराधबोध रखने का जोखिम नहीं उठाना चाहिए।" गौतम अदाणी ने कहा कि 21वीं सदी में संप्रभुता किसी देश की अपने प्राकृतिक संसाधनों और ऊर्जा प्रणालियों पर नियंत्रण पर आधारित होगी, और उन्होंने इन्हें आर्थिक स्वतंत्रता का दोहरा स्तंभ बताया।
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अदाणी ने कहा, "हम कथात्मक उपनिवेशीकरण के युग में रह रहे हैं, जहां वही राष्ट्र जिन्होंने संसाधनों को लूटा, महाद्वीपों को गुलाम बनाया और दो शताब्दियों तक जीवाश्म ईंधन जलाया, अब विदेशी राजधानियों में नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं। उनमें से कई अब भारत के विकास की गति और शैली को निर्धारित करना चाहते हैं। उन्होंने कहा, "यह एक विरोधाभास है कि जिन लोगों ने पृथ्वी को गर्म किया, वे अब यह नियम बनाना चाहते हैं कि पृथ्वी को कैसे ठंडा किया जाए। यह आधुनिक धारना है। इसलिए, यदि हमने अपने अपनी धारणाओं को नियंत्रित नहीं किया तो हमारी वृद्धि को आपराधिक घोषित कर दिया जाएगा, हमारी आकांक्षाओं को अवैध घोषित कर दिया जाएगा, और हमारे जीवन स्तर को बेहतर बनाने के अधिकार को दुनिया में अपराध के रूप में प्रदर्शित किया जाएगा।"
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अदाणी ने तर्क दिया कि ऐतिहासिक उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार देश अब विकासशील देशों के विकास को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन दुनिया में सबसे कम है। अदाणी ने कहा कि यह सच्चाई 2025 सीओपी-30 में सामने आई, जहां एक रिपोर्ट ने भारत की स्थिरता रैंकिंग को घटा दिया गया, यह तर्क देते हुए कि देश में कोयला-निकास के लिए समय-सीमा का अभाव है और कोयला ब्लॉकों की नीलामी जारी है।
अदाणी ने कहा कि भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा बिजली उपभोक्ता देश है, लेकिन प्रति व्यक्ति आधार पर यह प्रति वर्ष 1,400 किलोवाट घंटे से भी कम बिजली की खपत करता है- जो वैश्विक औसत के आधे से भी कम है। यह आंकड़ा अमेरिका के दसवें हिस्से और यूरोप के पांचवें हिस्से के बराबर है। कुल कार्बन डाई आक्साइड उत्सर्जन के मामले में भारत तीसरे स्थान पर है। लेकिन, प्रति व्यक्ति आधार पर इसके 1.4 अरब लोग 2 टन से कम कार्बन डाईआक्साइड उत्सर्जन करते हैं, जबकि अमेरिका में यह 14 टन, चीन में 9 टन और यूरोप में 6 टन है।
उन्होंने कहा, "200 वर्षों की औद्योगिक गतिविधि में भारत ने कुल वैश्विक उत्सर्जन में केवल 4 प्रतिशत का योगदान दिया है, जबकि यूरोप से 13 प्रतिशत, अमेरिका से 19 प्रतिशत और चीन से 20 प्रतिशत का योगदान है।" अदाणी ने भारत की कम प्रति व्यक्ति बिजली खपत और कार्बन उत्सर्जन का जिक्र करते हुए,अंतरराष्ट्रीय स्थिरता रैंकिंग की आलोचना की। उन्होंने कहा कि यह रैंकिंग विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को कोयले के निरंतर उपयोग के लिए दंडित करने जैसा है। अदाणी ने भारत को ऊर्जा की कमी को दूर करने के लिए बेस-लोड जीवाश्म क्षमता का विस्तार करना होगा, भले ही देश ऊर्जा के मामले में मानव इतिहास में सबसे तेज बदलावों की ओर बढ़ रहा हो। अदाणी ने कहा कि सहयोग वाले वैश्विक व्यापार और आपूर्ति शृंखलाओं का युग समाप्त हो रहा है।
अदाणी ने कहा, "हम सभी देख रहे हैं कि जो राष्ट्र कभी मजबूत गठबंधनों से बंधे थे, वे खुद को बचाने की आड़ में पीछे हट रहे हैं। रेयर अर्थ, सेमीकंडक्टर, टैरिफ और व्यापारि संधियों के टूटने की लड़ाइयां अब न्यू नॉर्मल हो गई है। यह अब कोई अपवाद नहीं रहा।" और इस माहौल में, नाटो, विश्व व्यापार संगठन और संयुक्त राष्ट्र जैसी सबसे प्रमुख वैश्विक संस्थाओं को भी अपने स्थापित ढांचों और सहभागिता के नियमों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि संप्रभुता को बाहरी प्रभाव और नियंत्रण के बिना स्वयं पर शासन करने की क्षमता के रूप में परिभाषित किया जाता है।