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बिहार की इन पांच सीटों से समझें एनडीए की जीत में नीतीश कुमार की 'सोशल इंजीनियरिंग' का रोल 

Thu, 23 May 2019 10:05 PM IST
Nilesh Kumar ऋषव मिश्रा कृष्णा
ऋषव मिश्रा कृष्णा Published by: Nilesh Kumar Updated Thu, 23 May 2019 10:05 PM IST
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Bihar Lok Sabha election 2019 counting result live updates Nitish Social engineering in NDA Victory
नरेंद्र मोदी-नीतीश कुमार (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

साल 2004 के संसदीय चुनाव के बाद बिहार की राजनीति में एक नए समीकरण का प्रादुर्भाव हुआ था। 2005 के विधानसभा चुनावों में भाजपा और जदयू ने गठबंधन कर एक नया नारा दिया था "नया बिहार और नीतीश कुमार"। विधानसभा चुनाव में पहली बार देखने को मिला था कि लालू यादव के माय(मुस्लिम-यादव) समीकरण को बिना छुए किस तरह राजद को सत्ता से बेदखल किया जा सकता है। 

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2005 के दूसरे विधानसभा चुनाव में "नीतीश कुमार नया बिहार" का नया समीकरण बिहार में हिट रहा और नीतीश कुमार सत्तासीन हुए। इसके बाद से बिहार में अभी तक इसी समीकरण के हिसाब से चुनाव हो रहे हैं और परिणाम भी सामने आ रहे हैं। साल 2014 का लोकसभा और 2015 का विधानसभा चुनाव इस समीकरण को व्यवहारिकता की कसौटी पर तौलने वाला चुनाव रहा। 
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2014 में बिहार में तीन प्रमुख दलों के उम्मीदवार अलग अलग चुनावी मैदान में थे। इसका फायदा उस समय भाजपा गठबंधन को मिला और अधिकांश सीटों पर भाजपा गठबंधन के उम्मीदवार जीते। साल 2015 के विधानसभा चुनाव में जदयू और राजद का गठबंधन हो गया और इस महागठबंधन ने विधानसभा के लिए अपना रास्ता खोज निकाला। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव उप मुख्यमंत्री बने। 
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नीतीश जिसके साथ, बिहार उसके साथ

साल 2004 के बाद बिहार में हुए चुनाव परिणाम को उदाहरण माना जाए तो निश्चित रूप से यह बात कही जा सकती है कि नीतीश कुमार और उनका दल जदयू अकेले भले ही प्रभावशाली ना हो लेकिन जदयू और नीतीश कुमार जिसके साथ होंगे बिहार उसके साथ होगा। नए समीकरण के बाद यह बात भी तय है कि बिहार में सबसे बड़ा दल राजद नहीं भाजपा है। वर्ष 2004 से लेकर अब तक के चुनावों के परिणाम को देखा जाय तो पता चलता है। यहां कोई भी करिश्माई नेतृत्व का लहर, इनर करंट, करंट काम नहीं करता है।

यहां चुनाव का आधार सोशल इंजीनियरिंग होता है और इस रास्ते सत्ता तक पहुंचने चाभी नीतीश कुमार के पास है। निश्चित रूप से विपक्ष को भाजपा और जदयू के इस मजबूत समीकरण को तोड़ने के लिये आत्ममंथन की आवश्यकता है। बिहार में नीतीश के अभेद्य चक्रव्यूह में फंसकर किस प्रकार महागठबंधन चारों खाने चित हो गया। 

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राजद नेता तेजस्वी यादव, बांका सांसद जयप्रकाश नारायण यादव और भागलपुर सांसद बुलो मंडल - फोटो : Collected from Social Media

भागलपुर में नीतीश ने खेला मंडल कार्ड

बात भागलपुर लोकसभा क्षेत्र की करें तो यहां से वर्ष 2014 में भाजपा के राष्ट्रीय स्तर की पहचान रखने वाले नेता शाहनवाज हुसैन, राजद के शैलेश कुमार उर्फ बुलो मंडल से मामूली मतों के अंतर से चुनाव हार गये थे। वर्ष 2019 के चुनाव में भागलपुर से शाहनवाज का पत्ता कट गया और इस सीट को जदयू की झोली में डालकर नाथनगर से जदयू विधायक रहे अजय मंडल पर दांव खेला गया। कयास लगाया जा रहा था कि टिकट काटने से नाखुश भाजपा कार्यकर्ता और शहनवाज हुसैन के समर्थक ही अजय मंडल के मनसूबों पर पानी फेर देंगे, लेकिन सामाजिक समीकरण कुछ ऐसा तैयार हुआ कि अजय मंडल बड़े अंतर से चुनाव जीत गए। 

यहां पर नीतीश कुमार ने मंडल कार्ड खेला। भागलपुर लोकसभा में मंडल यानी गंगोत्र जाति के मतदाताओं की संख्या लगभग चार लाख के करीब है। इस जाति से और भी विधायक होने के बावजूद राजद में बड़ा ओहदा मिलने के कारण बुलो मंडल सर्वमान्य नेता माने जाते थे। जब गंगोता जाति के एक मुश्त वोट के साथ राजद का माय समीकरण से जुड़ा तो वर्ष 2014 में बुलो मंडल चुनाव जीत गए। लेकिन इस बार नीतीश कुमार ने मंडल कार्ड फेंक कर गंगोता मतों के ध्रुवीकरण को पूरी तरह से तबाह कर दिया। लिहाजा अजय मंडल विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अच्छे मतों के अंतर से चुनाव जीतने में सफल रहे।

मधेपूरा में पप्पू तो 'पप्पू' ही निकले

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पप्पू यादव-शरद यादव - फोटो : Amar Ujala

साल 2019 के चुनाव परिणाम यह बता रहे हैं कि बिहार और खासकर कोसी क्षेत्र की राजनीति में पप्पू इतने प्रभावशाली सिद्ध नहीं हुए जितना वे खुद बयां कर रहे थे। वर्ष 2015 के विधानसभा चुनावों में भी पप्पू यादव की पार्टी ने सभी जगहों पर अपना उम्मीदवार उतारा था, लेकिन सभी जगहों पर पप्पू यादव के उम्मीदवार निर्दलीय उम्मीदवार से भी बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाए थे। वर्ष 2014 के चुनाव में कोसी क्षेत्र का महत्वपूर्ण लोकसभा क्षेत्र मधेपुरा से पप्पू यादव राजद के टिकट पर चुनावी मैदान में उतारे गए थे। उन्होंने राजद से बगावत कर दी थी। 

साल 2014 के चुनाव में जदयू से शरद यादव, भाजपा से विजय कुशवाहा के चुनावी मैदान में रहते हुए भी राजद उम्मीदवार राजीव रंजन उर्फ पप्पू यादव ने लोकसभा तक का रास्ता तय कर लिया था, लेकिन इस बार पप्पू यादव को लालटेन का साथ नहीं था। इस बार राजद से शरद यादव चुनावी मैदान में थे तो जदयू से दिनेश चंद्र यादव चुनावी मैदान में उतारे गए थे।

मधेपुरा यादव बहुल इलाका रहा है। वर्ष 2014 में पप्पू यादव, यादव मतों को गोलबंद करने में कुछ हद तक कामयाब रहे लेकिन इस बार तीनों पार्टियों से यादव उम्मीदवार चुनावी मैदान में रहने के कारण यादव मतों का ध्रुवीकरण किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में नहीं हो पाया और पप्पू को राजद के वोटरों का साथ नहीं मिला। शायद राजद के वोटरों को पप्पू के बगावती तेवर पसंद नहीं आए तो दूसरी तरफ नीतीश कुमार का यादव कार्ड यहां भी कामयाब रहा। 

बांका में यादव कार्ड से तोड़ा राजद का माय समीकरण

बांका में भी कमोबेश ऐसा ही हुआ, इस सीट से भी हमेशा भाजपा चुनाव लड़ती आ रही थी, लेकिन इस बार यह सीट जदयू की झोली में चला गया और गिरधारी यादव को मैदान में उतारा गया। मालूम हो कि बांका से लोकप्रिय नेता दिग्विजय सिंह सांसद हुआ करते थे उनकी मृत्यु के बाद पिछली बार भाजपा ने उनकी पत्नी पुतुल देवी को टिकट दिया था।

वर्ष 2014 में राजद का माय समीकरण इस कदर प्रभावी हुआ कि पुतुल देवी चुनाव में दिग्विजय सिंह के सहानुभूति का वोट भी लाभ नहीं ले सकीं और चुनाव हार गई। संभवतः बांका में नीतीश कुमार की मंशा यह थी कि यहां पर राजद के माय समीकरण को तोड़ा जाए, चुनाव परिणाम बताते हैं कि वे इसमे सफल भी हुए। नीतीश कुमार ने यहां पर यादव कार्ड फेंका। परिणाम यह हुआ कि पुतुल देवी के बतौर निर्दलीय उम्मीदवार चुनावी मैदान में रहने के बाद भी गिरधारी यादव ने बाजी मार ली। 

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दुलाल चंद्र-तारिक अनवर - फोटो : Social Media

कटिहार में तारिक की लोकप्रियता पर भारी नीतीश का दांव

कटिहार की बात करें तो यहां तारिक अनवर काफी लोकप्रिय नेता माने जाते हैं। चुनाव घोषित होने से पूर्व चुनावी पंडितों का मानना था कि यहां से कोई भी प्रत्याशी रहे तारिक अनवर तो जीतेंगे ही। लेकिन नीतीश कुमार ने यहां भी तारिक अनवर का तो खोज निकाला। यहां से दुलाल चंद्र गोस्वामी को चुनावी मैदान में उतारा गया। यह वही दुलाल चंद्र गोस्वामी है जिन्होंने भाजपा से टिकट ना मिलने के बाद निर्दलीय दांव खेला था और बलरामपुर विधानसभा सीट पर कब्जा जमा लिया था। बाद में इन्होंने एनडीए को समर्थन किया और नीतीश सरकार में मंत्री भी बनाए गए। 

शुद्ध रूप से भाजपा की विचारधारा से ताल्लुक रखने वाले दुलाल गोस्वामी जदयू के वोटरों का ध्रुवीकरण और भाजपा का वोट अपने पक्ष में शिफ्ट कराने में कामयाब रहे और चुनाव जीत गए। पूर्णिया लोकसभा से नीतीश कुमार का लव कुश समीकरण पहले से व्यावहारिकता की कसौटी पर खरा है इसलिए इस बार भी संतोष कुशवाहा ने आसानी से लोकसभा तक का रास्ता तय कर लिया।

खगड़िया में निषाद नेता की राजनीति भी कर दी फेल

खगड़िया लोकसभा चुनाव के पूर्व यह कयास लगाया जा रहा था कि खगड़िया से वीआईपी पार्टी सुप्रीमो और महागठबंधन के उम्मीदवार मुकेश सहनी चुनाव जीत रहे हैं। यह भी कहा जा रहा था कि सन ऑफ मल्लाह मुकेश साहनी के जीत के बाद ही बिहार की राजनीति में निषाद जाति का एक नया नेता खड़ा होगा। यह सीट लोजपा के खाते में गयी थी यहां लोजपा ने मुस्लिम प्रत्यशी को मैदान में उतारा। 

लिहाज राजद का माय समीकरण यहां आकर नहीं ले सका और परिणाम है कि लोजपा उम्मीदवार महबूब अली कैशर सांसद चुने गए। कहा जाता है कि वर्ष 2014 के बाद से मुकेश सहनी जदयू और भाजपा के गलियारों से गुजरते हुए राजद तक पहुंचे थे। मुकेश साहनी के नाम पर ना तो स्वजातीय मतों का ध्रुवीकरण हुआ और ना ही राजद के वोट को शिफ्ट करा पाए।

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