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महामारी के दौर में साजिशों के किस्से क्यों हो जाते हैं मशहूर? सदियों पुराना है इतिहास

Sat, 30 May 2020 01:12 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सोनू शर्मा Updated Sat, 30 May 2020 01:12 PM IST
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why Tales of conspiracies become famous in times of epidemic
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

कोविड-19 की महामारी फैलने के साथ-साथ इससे जुड़ी साजिशों के किस्से भी पूरी दुनिया में तेजी से फैले। इसमें सोशल मीडिया से लेकर सियासी नेताओं तक का भरपूर योगदान रहा। सोशल मीडिया पर साजिश का ये किस्सा फैला कि कोरोना वायरस के प्रकोप के पीछे 5G तकनीक है। तो, चीन और अमेरिका ने एक दूसरे पर ये इल्जाम लगाया कि ये वायरस लैब में जैविक हथियार के तौर पर बनाया गया है। साजिशों के ऐसे किस्से हर आपदा के साथ फैलते हैं और ये सिलसिला बहुत पुराना है। किसी बीमारी के फैलने से लेकर, दुश्मन के हमले तक, लोगों को साजिशों के तार नजर आने लगते हैं। 

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इतिहास क्या बताता है?

ईसा से 331 साल पहले रोम में अचानक बहुत से अमीर लोगों की रहस्यमय तरीके से मौत होने लगी। ये सिलसिला बढ़ा तो एक दासी ने आकर जांच करने वालों से दावा किया कि कुछ बड़े घरों की महिलाएं इसके पीछे हैं, जो एक काढ़ा तैयार कर रही हैं। इसे ही पीकर मर्दों की मौत हो रही है।
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जब इन महिलाओं से पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि वो तो दवा तैयार कर रही थीं। कुछ महिलाओं को ये दवा पिलाई गई, तो उनकी मौत हो गई। इससे उस दासी की साजिश वाली कहानी को और बल मिला। हालांकि, सदियों बाद आज जब इस किस्से का बारीकी से विश्लेषण किया जाता है, तो पता ये लगता है कि रोम के वो रईस शायद प्लेग से मर रहे थे। 
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हिंसक घटनाओं की खबरें

मगर, लोगों को उस बीमारी की ठीक समझ नहीं थी, तो ठीकरा उन महिलाओं पर फोड़ दिया गया, जिनसे उस दौर का रोमन समाज डरता था। साजिशों के साथ यही मसला है। लोग सहजता से बिना तर्क वितर्क किए उस पर भरोसा कर लेते हैं। जैसे कि कोविड-19 की महामारी के पीछे 5G तकनीक का हाथ होने की साजिश का दावा। 

ब्रिटेन में इस अफवाह के फैलने के बाद कई टेलीफोन लाइनों और संचार के इंजीनियरों पर हमले हुए। अमेरिका से भी ऐसी ही हिंसक घटनाओं की खबरें आईं। जबकि, इन बातों का हकीकत से कोई वास्ता नहीं था। सवाल ये है कि आखिर साजिशों के ऐसे किस्से मशहूर क्यों हो जाते हैं? जनता को इनमें क्या दिखता है कि वो ऐसे बेबुनियाद दावों पर भरोसा कर लेते हैं? और, क्या हम साजिशों के इन किस्सों से कोई सबक सीख सकते हैं?  

एक विलेन की तलाश

साजिश के किसी भी किस्से के मशहूर होने की पहली शर्त यही है। खलनायक ऐसा होना चाहिए जिस पर सहजता से विश्वास हो जाए। कोरोना वायरस को लेकर जो भी अफवाहें फैलीं, उनके पीछे जो विलेन बताए गए, उन्हें लेकर पहले से ही अविश्वास का माहौल था। नतीजा ये कि साजिशों के किस्से मशहूर होने में देर नहीं लगी। 

साझा चिंताएं

केंट यूनिवर्सिटी की सामाजिक मनोविज्ञानिक कैरेन डगलस कहती हैं, 'पूरी दुनिया में लोग ऐसी साजिशों पर सहज ही भरोसा कर लेते हैं, जो सांस्कृतिक और एतिहासिक घटनाओं से जुड़े होते हैं। जो खास जगहों पर हुई होती हैं, जिनमें धार्मिक अल्पसंख्यक, अमीर लोग, दुश्मन देश और रहस्यमय तकनीकें शामिल होती हैं।' 

हर समाज में अपनी चिंताएं होती हैं। लोगों की सनक होती है। साजिशों के जो किस्से कामयाब होते हैं, वो इनका लाभ उठाते हैं। जैसे कि, भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ माहौल, जो तमाम पूर्वाग्रहों के कारण पैदा हुआ है। या फिर, अमेरिका में नस्लवादी सोच के चलते अक्सर गोरे और अश्वेत लोगों के बीच साजिशों के किस्से पनपते हैं।  

कबीलावाद

कैरेन डगलस कहती हैं, 'अक्सर आप देखते हैं कि किसी देश के खास समूह या लैंगिक समुदाय के लोगों को निशाना बनाकर साजिशों के किस्से मशहूर किए जाते हैं। इस बात के कई सबूत मिलते हैं कि लोग अक्सर अपने पूर्वाग्रहों के हिसाब से साजिशों की बात को सही मानने लगते हैं।' 

अनिश्चितता का माहौल

कैरेन डगलस कहती हैं कि जब भी अनिश्चितता का माहौल होता है, या संकट आता है, तो लोग साजिशों की कहानियों पर ज्यादा यकीन करने लगते हैं। जैसे कि कोविड-19 को लेकर फैली अफवाह कि इसके पीछे 5G तकनीक है। अभी ये संकट गहराया ही नहीं था कि 5G तकनीक को निशाना बनाकर किस्से गढ़ लिए गए। इसकी दो वजहें थीं। पहली तो ये कि नई तकनीक को लेकर तरह-तरह की आशंकाएं पहले से ही थीं। और दूसरी बात इसके पीछे चीन की नीयत पर भी बहुत से लोगों को शक था। 

नतीजा ये कि वायरस से तेजी से साजिश का ये किस्सा फैल गया। किसी भी साजिश के दावे के पीछे एक अच्छी कहानी के सारे किरदार होने जरूरी हैं। एक डराने वाला खलनायक, नैतिक सबक और तार्किक प्लॉट। अक्सर, लोग अपनी धार्मिक आस्थाओं के कारण भी साजिशों के ऐसे दावों पर सहजता से भरोसा कर लेते हैं।  

जानकारी का अभाव

किसी आपदा के समय सरकार या भरोसेमंद संस्था की ओर से जानकारी की कमी भी साजिश के दावों को बढ़ावा देती है। आज, बहुत सी संस्थाओं पर जनता का भरोसा कम हो गया है। ऐसे में सोशल मीडिया पर साजिश का कोई भी दावा बड़ी तेजी से लोकप्रिय हो जाता है। फिर उसे झुठलाने में बरसों लग जाते हैं। 

बदनीयती वाली साजिश

कई बार सियासी लीडर, अपने हित साधने के लिए साजिशों के किस्से को बढ़ावा देते हैं। साल 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में हिलेरी क्लिंटन के एक सहयोगी पर बच्चों का सेक्स रैकेट चलाने के आरोप लगे थे। दावा किया गया था कि ये सेक्स रैकेट पिज्जा की एक दुकान के बेसमेंट में चल रहा था। सच ये था कि पिज्जा की इस दुकान के नीचे कोई बेसमेंट तक नहीं था। फिर भी, हिलेरी क्लिंटन को बदनाम करने वाली ये साजिश महीनों तक हवा में तैरती रही। 

डार्टमाउथ कॉलेज, न्यू हैम्पशायर के राजनीति विज्ञानी रसेल म्योरहेड को एक अलग चिंता सता रही है। वो कहते हैं कि पहले साजिशों के ये किस्से कमजोर तबके का हथियार हुआ करते थे, जो अमीरों और ताकतवर लोगों को निशाना बनाने के काम आते थे।  

ट्रंप इसकी बड़ी मिसाल हैं...

मगर, अब षडयंत्रों की ऐसी कहानियों को बड़े बड़े नेता बढ़ावा देते हैं, ताकि अपने राजनीतिक हित साध सकें। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप इसकी बड़ी मिसाल हैं, जो अपने विरोधियों पर बेलगाम होकर इल्जाम लगाते हैं। रसेल म्योरहेड का कहना है कि आने वाले समय में अगर राजनेताओं का यही रवैया रहा, तो आम जनता को इसके बहुत बुरे नतीजे भुगतने होंगे। 

साजिशों के ऐसे किस्सों से बचने के लिए हमें क्या करना चाहिए?

रसेल म्योरहेड कहते हैं, 'आज सरकारों से, संस्थाओं पर से और विशेषज्ञों पर से लोगों का भरोसा उठ चुका है। वो लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी यकीन नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में जरूरत ऐसी संस्थाओं और व्यवस्थाओं में फिर से यकीन जगाने की है।' 

कैरेन डगलस कहती हैं, 'तमाम रिसर्च से ये बात साबित होती है कि हम साजिशों के युग में जी रहे हैं। मगर इसके कोई पक्के सबूत हमारे पास नहीं हैं।' ऐसे में कब, कहां और कैसे, किस नई साजिश की कहानी का जन्म होगा, किसी को नहीं पता। 

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