अंतरिक्ष की सैर का सपना तो हम में से बहुत से लोग देखते हैं, लेकिन अंतरिक्ष यात्री बनना आसान नहीं है। इसके लिए आम से खास बनना पड़ता है। मसलन आप में तुरंत फैसला करने की काबिलियत होनी चाहिए। आपकी सेहत आम लोगों के मुकाबले ज्यादा बेहतर होनी चाहिए। दबाव होने के बावजूद आपका जहनी सुकून डगमगाना नहीं चाहिए। एक अंतरिक्ष यात्री बनने के लिए ये चंद बुनियादी बातें हैं जिन्हें 'द राइट स्टफ' कहा जाता है।
आखिर कैसे बनते हैं अंतरिक्ष यात्री, कौन-कौन सी काबिलियत का होना जरूरी?
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आम तौर से अंतरिक्ष यात्री एयरफोर्स के बेहतरीन पायलट होते हैं। 1950 में नासा ने भी अपना पहला अंतरिक्ष यात्री एयरफोर्स के पायलट को ही चुना था। यही काम सोवियत संघ ने भी किया था। फर्क सिर्फ इतना था कि सोवियत संघ ने इस क्षेत्र में महिलाओं को भी शामिल कर लिया था। साथ ही लंबाई की बंदिश लगा दी। यानी किसी भी अंतरिक्ष यात्री की लंबाई पांच फीट छह इंच से ज्यादा नहीं हो सकती थी।
करीब 60 साल से रिसर्च के लिए इंसान अंतरिक्ष में जा रहे हैं, लेकिन वहां जाने के लिए शर्तें आज भी वही हैं। मिसाल के लिए 2009 में यूरोपियन स्पेस एजेंसी ने अपने यहां छह अंतरिक्ष यात्री भर्ती किए। इनमें से तीन फौज के पायलट हैं। एक पेशेवर पायलट है। एक स्काई डाइवर है, जबकि एक पर्वतारोही है। कोशिश यही रहती है कि बेहतरीन लोगों को ही अंतरिक्ष में भेजा जाए, लेकिन आम इंसान का अंतरिक्ष में रह पाना आसान नहीं होता है।
जमीन पर हम ऑक्सीजन के गिलाफ में रहते हैं। इसके बिना इंसानी वजूद की कल्पना नहीं की जा सकती, लेकिन धरती से दूर अंतरिक्ष में रहने वाले बनावटी सांसों के सहारे जीते हैं। उन्हें ब्रह्मांड में मौजूद रेडिएशन झेलना पड़ता है। इसका सीधा असर उनकी सेहत पर पड़ता है। शरीर कमजोर पड़ने लगता है। हर समय मतली महसूस होती रहती है। आंखें कमजोर हो जाती हैं। कमजोरी इतनी बढ़ जाती है कि बीमारियों से लड़ने की क़ुव्वत नहीं रहती।
अंतरिक्ष यात्री ल्यूका परमितानो इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में करीब साढ़े पांच महीने रहे। वो कहते हैं कि जैसे-जैसे दिन गुजरते जाते हैं, आपकी टांगें खुद आपको ही कमजोर और पतली महसूस होने लगती हैं। चेहरा गोल होने लगता है। वापस धरती पर आने के बाद भी नॉर्मल होने में काफी समय लग जाता है। अंतरिक्ष में शुरुआत के दिनों में एक ही दिशा में चलना पड़ता है। छह महीने बाद आप धीरे-धीरे दूसरी दिशाओं में घूमना शुरू कर देते हैं। स्पेस स्टेशन की जगह को पहचानना शुरू करते हैं। जीरो गुरुत्वाकर्षण की वजह से अंतरिक्ष यात्री हवा में ही झूलते रहते हैं। लिहाजा आपकी टांगों का कोई काम नहीं रहता। अंतरिक्ष में बहुत लंबे समय तक टिक पाना आसान नहीं है।