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एक जिंदगी ऐसी भी: लोहे के फेफड़ों में अलेक्जेंडर की दुनिया

Thu, 22 Sep 2022 12:19 PM IST
प्रकाश चंद जोशी फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: प्रकाश चंद जोशी Updated Thu, 22 Sep 2022 12:19 PM IST
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Paul Alexander the man in the iron lung
जब पॉल 6 साल के थे, तो उनकी गर्दन के नीचे के शरीर ने काम करना बंद कर दिया - फोटो : Social Media

हिंदी फिल्म का वो डायलॉग याद आता है, जिसमें मशहूर अभिनेता स्वर्गीय राजेश खन्ना कहते हैं कि 'बाबू मोशाय जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं...' भले ही ये फिल्म का डायलॉग है लेकिन असल जिंदगी में इसे एक शख्स अपनाता हुआ नजर आ रहा है और इनका नाम है पॉल अलेक्जेंडर।

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पॉल लकवे की बीमारी से ग्रसित हैं और अब उनकी उम्र 75 साल से ज्यादा है। दरअसल, जब पॉल 6 साल के थे, तो उनकी गर्दन के नीचे के शरीर ने काम करना बंद कर दिया यानी उनके शरीर को लकवा मार चुका था। अगर ये स्थिति आपकी या हमारी हो जाए, तो शायद हम जीने की उम्मीद छोड़ दें, शायद घर वाले अपने कदम पीछे खींच लें और भी बहुत कुछ... लेकिन पॉल की जिंदगी में ऐसा कुछ नहीं हुआ क्योंकि उनका हौसला और उनकी मां की उम्मीद इन सब बातों पर भारी पड़ती हुई नजर आई।

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बात कुछ ऐसी है

साल 1946 में अमेरिका में जन्मे पॉल जब 6 साल के थे यानी बात साल 1952 की है। द गार्जियन में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई महीने की एक शाम थी, और टेक्सास के डेलास में पॉल अपने दोस्तों संग खेल रहे थे। जैसे- आप और हम बचपन में खेला करते थे।

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इस दौरान पॉल की गर्दन में चोट लगी और फिर वो अपने फैमिली डॉक्टर के पास गए। लेकिन शरीर में असहनीय दर्द हो रहा था और फिर फैमिली डॉक्टर ने उन्हें अस्पताल जाने को कहा। वहां डॉक्टर ने पाया कि पॉल के फेफड़ों में जमाव हो रहा है और उन्हें सांस लेने में भी कठिनाई हो रही है।

शरीर को लकवा मार चुका था और अब वो हिल भी नहीं सकते थे। ऐसे में डॉक्टर ने मामले की गंभीरता को समझते हुए पॉल को अपातकालीन ट्रेकियोटॉमी कर उनके लंग्स क्लियर किए।

Paul Alexander the man in the iron lung
पॉल अपनी जिंदगी पर एक किताब भी लिख चुके हैं - फोटो : Tiwtter/@guidodeckstein

3 दिन बाद आया होश

वहीं, पॉल को 3 दिन बाद होश आया और उन्होंने देखा की वो एक लोहे की मशीन में हैं, जिसे मेडिकल भाषा में आयरन लंग्स मशीन कहते हैं।

क्या है ये मशीन?

बात अब इस आयरन लंग्स मशीन की कर लेते हैं। आम भाषा में कहें तो लगवाग्रस्त मरीजों के लिए ये मशीन किसी वरदान से कम नहीं है, लेकिन इसमें रहना ही अपने आप में बड़ी बात है जो हर मरीज नहीं कर पाता है। ये मशीन मरीज के फेफड़ों में ऑक्सीजन भरने का काम करती है, जिससे वो जिंदा रह पाता है।

अब वकील हैं पॉल

कहते हैं अगर काम के लिए आपका जुनून है, तो फिर उस काम का होना तय है। ऐसा ही कुछ पॉल के साथ हुआ। दरअसल, पॉल कुछ करना चाहते थे इसलिए उन्होंने विश्वविद्यालय में दाखिला लेने की सोची, लेकिन उनके दाखिले को बार-बार रिजेक्ट कर दिया जाता था। फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और पहले डलास में दक्षिणी मेथोडिस्ट विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और फिर ऑस्टिन में टेक्सास विश्वविद्यालय में लॉ स्कूल में प्रवेश ले लिया। यही नहीं, उन्होंने पॉल डलास और फोर्ट वर्थ में एक वकील के तौर पर काम भी किया।

लिख चुके हैं बुक

पॉल अपनी जिंदगी पर एक किताब भी लिख चुके हैं, जिसका नाम 'My Life in an Iron Lung' है। किताब लिखने के पीछे की कहानी के बारे में पॉल कहते हैं कि जिंदगी कैसी भी हो, लेकिन बड़ी चुनौतियों का सामना करके ही आप मंजिल हासिल कर सकते हैं।

अब ऐसी है जिंदगी

पॉल कहते हैं कि लोग उन्हें पसंद नहीं करते, लेकिन वो कभी हारना नहीं चाहते। वे रोजाना सुबह आपकी और हमारी तरह मुंह धोते हैं, ब्रश करते हैं और नाश्ता करके किताबें भी पढ़ते हैं।

पॉल अलेक्जेंडर की ये कहानी ये बताती है कि जिंदगी में लाख कठिनाइयां हों, लाख मुसीबतें हों, लेकिन आपको अपना रास्ता बनाकर आगे बढ़ना चाहिए और देखिएगा यकीनन मंजिल पर आप खुद-ब-खुद पहुंच जाएंगे।

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