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दिल्ली के 1600 साल पुराने लौह स्तंभ का रहस्य, आज तक नहीं जान पाया कोई

Tue, 02 Jun 2020 04:56 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सोनू शर्मा Updated Tue, 02 Jun 2020 04:56 PM IST
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Mystery of Iron pillar of delhi near Qutub minar
दिल्ली का लौह स्तंभ - फोटो : Social media

दिल्ली का एतिहासिक कुतुब मीनार तो आपने देखा ही होगा, जिसे ईंट से बनी दुनिया की सबसे ऊंची मीनार माना जाता है। इसी कुतुब मीनार के पास ही एक विशाल स्तंभ भी है, जिसे 'लौह स्तंभ' कहा जाता है। इसके बारे में बहुत कम ही लोग जानते होंगे, लेकिन इसका इतिहास बहुत पुराना है और यह स्तंभ रहस्यों से भरा हुआ भी है। माना जाता है कि यह स्तंभ 1600 साल से भी पुराना है। इसकी सबसे बड़ी खासियत ये है कि यह शुद्ध लोहे से बना हुआ है और सदियों से खुले आसमान के नीचे खड़ा है, लेकिन आजतक इसपर कभी जंग नहीं लगा। यह अपने आप में एक बहुत बड़ा रहस्य है। 

Mystery of Iron pillar of delhi near Qutub minar
दिल्ली का लौह स्तंभ - फोटो : Social media

माना जाता है कि इस लौह स्तंभ का निर्माण राजा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य (राज 375-412) ने कराया है और इसका पता उसपर लिखे लेख से चलता है, जो गुप्त शैली का है। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इसका निर्माण उससे बहुत पहले किया गया था, संभवत: 912 ईसा पूर्व में। इसके अलावा कुछ इतिहासकार तो यह भी मानते हैं कि यह स्तंभ सम्राट अशोक का है, जो उन्होंने अपने दादा चंद्रगुप्त मौर्य की याद में बनवाया था। 

Mystery of Iron pillar of delhi near Qutub minar
दिल्ली के लौह स्तंभ पर लिखी प्राचीन शैली - फोटो : Social media

इस स्तंभ पर संस्कृत में जो लेख खुदा हुआ है, उसके मुताबिक इसे ध्वज स्तंभ के रूप में खड़ा किया गया था। माना जाता है कि मथुरा में विष्णु पहाड़ी पर निर्मित भगवान विष्णु के मंदिर के सामने इसे खड़ा किया गया था, जिसे 1050 ईस्वी में तोमर वंश के राजा और दिल्ली के संस्थापक अनंगपाल ने दिल्ली लाया।   

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Mystery of Iron pillar of delhi near Qutub minar
दिल्ली का लौह स्तंभ - फोटो : Social media

शुद्ध लोहे से बने इस स्तंभ की ऊंचाई सात मीटर से भी ज्यादा है जबकि वजन 6000 किलो से भी अधिक है। रासायनिक परीक्षण से पता चला है कि इस स्तंभ का निर्माण गर्म लोहे के 20-30 किलो के कई टुकड़ों को जोड़ कर किया गया है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि करीब 1600 साल पहले गर्म लोहे के टुकड़ों को जोड़ने की तकनीक क्या इतनी विकसित थी, क्योंकि उन टुकड़ों को इस तरीके से जोड़ा गया है कि पूरे स्तंभ में एक भी जोड़ दिखाई नहीं देता। यह सच में एक बड़ा रहस्य है।  

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दिल्ली का लौह स्तंभ - फोटो : Social media

इस लौह स्तंभ में सबसे आश्चर्य की बात है इसमें जंग का न लगना। माना जाता है कि स्तंभ को बनाते समय इसमें फास्फोरस की मात्रा अधिक मिलाई गई थी, इसीलिए इसमें आज तक जंग नहीं लगा। दरअसल, फास्फोरस से जंग लगी वस्तुओं को साफ किया जाता है, क्योंकि जंग इसमें घुल जाता है। लेकिन सोचने की बात ये है कि फास्फोरस की खोज तो 1669 ईस्वी में हैम्बुर्ग के व्यापारी हेनिंग ब्रांड ने की थी जबकि स्तंभ का निर्माण उससे करीब 1200 साल पहले किया गया था। तो क्या उस समय के लोगों को फास्फोरस के बारे में पता था? अगर हां, तो इसके बारे में इतिहास की किसी भी किताब में कोई जिक्र क्यों नहीं मिलता? ये सारे सवाल स्तंभ के रहस्य को और गहरा देते हैं।

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