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लचित बोरफुकन: मुगलों को हराने वाला वो वीर योद्धा, जिसे कहते हैं पूर्वोत्तर का 'शिवाजी'

Fri, 05 Jun 2020 10:51 AM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सोनू शर्मा Updated Fri, 05 Jun 2020 10:51 AM IST
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Lachit Borphukan The Hero of Saraighat Battle
ब्रह्मपुत्र नदी के ऊपर बनी वीर लचित बोरफुकन की मूर्ति - फोटो : Social media

लचित बोरफुकन, जिन्हें 'चाउ लासित फुकनलुंग' नाम से भी जाना जाता है, 17वीं शताब्दी के एक महान और वीर योद्धा थे। उनकी वीरता के कारण ही उन्हें पूर्वोत्तर भारत का वीर 'शिवाजी' कहा जाता है। उन्होंने मुगलों के खिलाफ जो निर्णायक लड़ाई लड़ी थी, उसके लिए उन्हें आज भी याद किया जाता है। वैसे तो इस महान योद्धा का कोई भी चित्र आज दुनिया में उपलब्ध नहीं है, लेकिन माना जाता है कि उनका मुख चौड़ा था, जो पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह दिखाई देता था। कोई भी उनके चेहरे की ओर आंख उठाकर नहीं देख सकता था। तो चलिए जान लेते हैं कि आखिर लचित बोरफुकन थे कौन और उन्हें क्यों इतना महान माना जाता है...

Lachit Borphukan The Hero of Saraighat Battle
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

दरअसल, लचित बोरफुकन असम के अहोम साम्राज्य के एक सेनापति थे। जहां बड़े से बड़े राजा भी मुगलों के सामने घुटने टेक देते थे, वही इस सेनापति ने 1667 ईस्वी में मुगल सम्राट औरंगजेब को चुनौती दे दी थी और न सिर्फ चुनौती बल्कि उसकी सेना को बुरी तरह हराया भी था। 

Lachit Borphukan The Hero of Saraighat Battle
अपने सैनिकों का हौसला बढ़ाते लचित बोरफुकन की मूर्ति - फोटो : Social media

1671 ईस्वी में मुगल साम्राज्य और अहोम साम्राज्य के बीच हुई उस लड़ाई को 'सराईघाट का युद्ध' कहा जाता है। यह लड़ाई इसलिए लड़ी गई थी, क्योंकि लचित ने मुगलों के कब्जे से गुवाहाटी को छुड़ा कर उसपर फिर से अपना अधिकार कर लिया था और उन्हें गुवाहाटी से बाहर धकेल दिया था। इसी गुवाहाटी को फिर से पाने के लिए मुगलों ने अहोम साम्राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था। उनकी सेना में 30,000 पैदल सैनिक, 15,000 तीरंदाज, 18,000 घुड़सवार, 5,000 बंदूकची और 1,000 से अधिक तोपों के अलावा नौकाओं का एक विशाल बेड़ा था, लेकिन इसके बावजूद लचित की रणनीति के आगे उनकी एक न चली और वो हार कर वापस लौट गए।  

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Lachit Borphukan The Hero of Saraighat Battle
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

कहते हैं कि लचित बोरफुकन ने सिर्फ यह सुनिश्चित करने के लिए कि असम यानी अहोम साम्राज्य सफलतापूर्वक मुगलों को हरा दे, अपने मामा का ही गला काट दिया था। इसके पीछे जो कहानी है, वो बेहद ही हैरान करने वाली है। माना जाता है कि लचित ने अपने सैनिकों को सिर्फ एक रात में एक दीवार बनाने का आदेश दिया था और इसे बनवाने का जिम्मा अपने मामा को दिया था। बीमार होने के बावजूद जब लचित उस जगह पर पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि सारे सैनिक हताशा और निराशा से भरे हुए हैं, क्योंकि उन्होंने पहले ही ये मान लिया था कि वो सूर्योदय से पहले दीवार का निर्माण नहीं कर पाएंगे।

यह देखकर लचित को अपने मामा पर बहुत गुस्सा आया कि वो काम करने के लिए अपने सैनिकों का उत्साह भी नहीं बढ़ा सके। इसी गुस्से में उन्होंने अपनी तलवार निकाली और एक झटके में ही अपने मामा का सिर धड़ से अलग कर दिया। बाद में उन्होंने खुद सैनिकों में इतना जोश भर दिया कि उन्होंने सूर्योदय से पहले ही दीवार खड़ी कर दी। एक सेनापति के तौर पर उन्होंने अपने सैनिकों में इसी उत्साह और जोश को बनाए रखा, जिसकी बदौलत उन्हें युद्ध में जीत हासिल हुई।   

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Lachit Borphukan The Hero of Saraighat Battle
लचित बोरफुकन की एक मूर्ति - फोटो : Social media

लचित बोरफुकन के पराक्रम और सराईघाट की लड़ाई में असमिया सेना की विजय को याद करते हुए पूरे असम में हर साल 24 नवंबर को लचित दिवस मनाया जाता है। लचित के नाम पर ही नेशनल डिफेंस एकेडमी (राष्ट्रीय रक्षा अकादमी) में बेस्ट कैडेट गोल्ड मेडल भी दिया जाता है, जिसे लचित मेडल कहा जाता है। 

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