अंटार्कटिका दुनिया का ऐसा गैर आबाद हिस्सा है, जहां बर्फ ही बर्फ है। यहां सूरज की रोशनी ना के बराबर पहुंचती है, लेकिन रिसर्च बताती हैं कि अंटार्कटिका हमेशा से ऐसा नहीं था। एक दौर था, जब यहां घने जंगल थे। उन जंगलों में बड़े-बड़े डायनासोर घूमा करते थे। इस बात से साफ जाहिर है कि यहां इतनी गर्मी रहती थी जो डायनासोर के जिंदा रहने के लिए जरूरी थी। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि यहां के जंगल साफ हो गए और तमाम डायनासोर खत्म हो गए। इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हमें धरती के इतिहास के पन्ने पलटने होंगे।
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अंटार्कटिका
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बताया जाता है कि अब से करीब 145 से 66 लाख साल पहले तक यहां बर्फ नाम के लिए भी नहीं थी। हालांकि इतने वर्ष पहले की बात सुनने में अटपटी लगती है लेकिन शोधकर्ताओं को यहां बर्फ में दबे डायनासोर के जो जीवाश्म मिले हैं, वो इसी दौर की तरफ इशारा करते हैं। यही वो दौर था, जब तमाम डायनासोर खत्म हो गए। बताया जाता है इस दौर में एक उल्कापिंड धरती से टकराया था और उसने सब कुछ तहस-नहस कर दिया। भू-विज्ञान में इसे क्रिटेशियस महायुग कहते हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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ये वो दौर था जब धरती से बड़े से बड़े जानवर विलुप्त हो गए। पहाड़ों की बर्फ पिघल कर समंदर में आ गई। समंदर का जलस्तर और दायरा अपनी इंतिहा तक बढ़ गए। दावा तो ये भी है कि हिंद महासागर का निर्माण इसी दौर में हुआ था। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों पर शोधकर्ताओं को ऐसे पेड़ और रेंग कर चलने वाले जानवरों के जीवाश्म मिले हैं, जिनके जिंदा रहने के लिए सूरज की गर्मी जरूरी है। विज्ञान की भाषा में इन्हें कोल्ड ब्लडेड रेप्टाइल्स यानी सर्द खून वाले जीव कहा जाता है। इनका शरीर भले ही बाहर के तापमान के अनुसार अपने शरीर का तापमान संतुलित कर लेता है, लेकिन इन्हें सूरज की रोशनी और गर्मी चाहिए। आज भी हम तमाम तरह के रेंगने वाले जानवरों को धूप सेंकते देखते हैं। इसी बुनियाद पर कहा जाता है कि कभी यहां सूरज की पर्याप्त रोशनी रही होगी।
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अंटार्कटिका
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रिसर्च करने वालों ने उस दौर की आबो-हवा का अंदाजा लगाने के लिए महासागर में रहने वाले जीवों के जीवाश्मों के खोल पर भी अध्ययन किया। इसके जरिए उन्होंने पता लगाने की कोशिश की कि किस समय अंतराल पर धरती और समंदर के तापमान में कितना बदलाव आया। कितने जानवर उस बदलाव के हिसाब से खुद को ढाल सके।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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समुद्र पर की जा रही रिसर्च को फोरामिनिफेरा कहा जाता है। डॉ.ब्रायन ह्यूबर का कहना है कि इस रिसर्च में समुद्र की गहराई और ऊपरी सतह पर रहने वाले जीव-जंतुओं और समुद्र के तापमान पर रिसर्च की जाती है और इस रिसर्च में बहुत दिलचस्प बातें सामने आई हैं। दरअसल समुद्र पर की गई रिसर्च से ही धरती की जलवायु बनने की सही तस्वीर उभर कर सामने आती है।