जानवरों को तो बहुत बार खिलाया, लेकिन किसी को ऐसे खाते हुए देखना पहली बार था। गिलहरी का अपने हाथों से बिस्किट को पकड़कर खाना ठीक वैसे ही लग रहा था जैसे कोई छोटा सा बच्चा बिस्किट के लिए रो रहा हो और उसके हाथ में एक बिस्किट दे दिया। फोटो भरतपुर के केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान की है। पूरा अभ्यारण अपने शौकिया फोटोग्राफर दोस्तों के साथ घूमने के बाद अंदर बने एक छोटे से स्टॉल पर पहुंचे और वहां से चाय-बिस्किट लिए। गिलहरियां बहुत थीं वहां पर, लेकिन किसी को भी हम इंसानों से डर नहीं था। भूखी भी थीं, उनकी नजरें हमारे बिस्किट्स पर थी...
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हम तीन दोस्तों में से एक ने उसे बिस्किट दिया और वो लेकर दूर भाग गयी। बाकी के हम दो कैमरा हाथ में लेकर देखते ही रह गए। जितनी देर में क्लिक करते वो हमारी नजरों से ओझल हो गई थी। शायद उस गिलहरी का पेट एक बिस्किट्स ने नहीं भरा। थोड़ी ही बाद वो हमारे आस पास मंडारने लगी। हम समझ गए...
हम दोनों ने अपना कैमरा तैयार कर लिया। आईएसओ सेट, अपरचर सेट। इस तरह की फोटो को लेने के लिए शटर स्पीड अधिक होनी चाहिए, अब हम तैयार हैं। हमारे तीसरे दोस्त ने एक बिस्किट निकाला और अब हम अपनी सीट से उठकर थोड़ा दूर चले गए, उसके पीछे-पीछे।
दोस्त ने गिलहरी को बिस्किट ऑफर किया। वह भी अपने कदम बिस्किट की ओर बढ़ाने लगी। उधर, गिलहरी के कदम आगे बढ़े और इधर हम दोनों के कैमरे हमारी आंखों के पास आने लगे। गिलहरी शायद बिस्किट हाथ से छुड़ाकर भागने को तैयार थी। उसका मुंह बिस्किट पर लगा और फिर भाग गई। बस इतना ही समय था हमारे पास इन फोटो को क्लिक करने के लिए।
हमने क्लिक भी किया, लेकिन फोटो धुंधली आई। हां, मेरे फोटोग्राफर दोस्त ने मुझसे थोड़ी बेहतर फोटो ली। अमित नाम है उसका, जो उस समय मुझे एक पेशेवर फोटोग्राफर भी तरह टिप्स दे रहा था।
हम असफल रहे। अब तीनों ने मिलकर गिलहरी को पास बुलाने की योजना बनाई। अब तक तो हम हमारी सारी थकान भूल चुके थे। टेबल पर पड़ी चाय भी अब तक तो ठंडी हो चुकी थी। अब हमारा लक्ष्य अभयारण्य को पूरा घूमना नहीं था, बल्कि इन फोटो को क्लिक करना था, जो आप देख रहे हैं।
प्लान के अनुसार तीसरा दोस्त बिस्किट निकाल तैयार था और हम दोनों अपने कैमरे के साथ थोड़ा दूर अलग-अलग एंगल पर खड़े थे। गिलहरी भी शातिर थी। वह दूर से ही हम पर नजरें रखे हुई थी। शायद वो भी हमारे इरादे जान गई और उसे पूरा करने के लिए वापस आ गई।
सर्तकता के साथ गिलहरी पास आ रही थी और हम भी धीरे -धीरे कैमरे को थोड़ा ऊपर ले रहे थे, लेकिन यहां गलती हो गई। वो ये कि मैनें अपना एक कदम आहिस्ते से आगे बढ़ा दिया।
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इतने में तो वो (गिलहरी) पेड़ों के ऊपर चली गई, लेकिन ज्यादा ऊपर नहीं, क्योंकि वो हमारे पास आना चाहती थी। हम तीनों उसी जगह वैसे के वैसे ही खड़े रहे। गिलहरी थोड़ी ही देर में वापस आई। हाथ से बिस्किट ले रही थी, अब हम भी उसके थोड़ा और करीब चले गए। वो असहज जरूर हुई, लेकिन भागी नहीं।
हमें भी फोटो क्लिक करने के लिए कुछ पल मिल गया। भले ही लम्हा कुछ सेकेंड का था, लेकिन उन चंद पलों में हमने कैमरे के लेंस से उसको जी भर निहारा। ये हम तीनों की जिंदगी का सबसे यादगार लम्हा था।