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Bihar: दिव्यांग किशोर 10 साल से पेंशन से वंचित, सिस्टम पर उठे सवाल; प्रमाण पत्र के बावजूद नहीं मिला लाभ
Fri, 13 Feb 2026 04:57 PM IST
पटना ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रोहतास
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रोहतास
Published by: पटना ब्यूरो
Updated Fri, 13 Feb 2026 04:57 PM IST
सार
हैरानी की बात यह है कि एक ओर जहाँ सरकार दिव्यांगों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए योजनाएं लाने करने का दावा करती है, वहीं सुधीर को अबतक बुनियादी दिव्यांगता पेंशन तक नसीब नहीं हुई है। आज भी वे अधिकारियों से आस लगाए घूम रहे हैं।
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पिता के कंधे पर दिव्यांग पुत्र
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
रोहतास जिले में सुशासन और समाजिक उत्थान के दावों के बीच शुक्रवार को एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो सरकारी सिस्टम की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करती है। दरअसल रोहतास जिले के दरिगांव थाना क्षेत्र अंतर्गत मलांव गांव में एक जन्मजात दिव्यांग सुधीर शर्मा पिछले एक दशक से सरकारी उपेक्षा का शिकार हैं। दिव्यांगता प्रमाण पत्र होने के बावजूद भी 15 वर्षीय सुधीर को आज तक न तो पेंशन मिली और न ही कोई सहायक उपकरण।
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जनप्रतिनिधियों एवं दफ्तरों से मिला सिर्फ आश्वासन
दरिगांव थाना क्षेत्र के मलांव निवासी संतोष शर्मा के पुत्र सुधीर शर्मा जन्म से हीं दिव्यांग हैं। पिता ने सुधीर के लिए करीब 10 साल पहले हीं आवश्यक दस्तावेज और दिव्यांगता प्रमाण पत्र बनवा लिया था, लेकिन वे पिछले 10 वर्षों से जनप्रतिनिधियों से लेकर सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। पिता का आरोप है कि उन्होंने जनप्रतिनिधियों से लेकर अधिकारियों तक कई बार गुहार लगाई, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ आश्वासन मिला।
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ना पेंशन, ना सहायक उपकरण
हैरानी की बात यह है कि एक ओर जहाँ सरकार दिव्यांगों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए योजनाएं लाने करने का दावा करती है, वहीं सुधीर को अबतक बुनियादी दिव्यांगता पेंशन तक नसीब नहीं हुई। सहायक उपकरण के अभाव में पिता चलने फिरने में असमर्थ अपने दिव्यांग पुत्र सुधीर को कंधे पर ढोते हुए दफ्तरों के चक्कर काटते हैं। फर्नीचर कारीगर संतोष शर्मा का कहना है कि आर्थिक तंगी के कारण वे खुद भी बेटे के लिए कुछ नहीं कर पा रहे हैं।
विभाग की कार्यशैली पर सवाल
दरअसल मामला समाज कल्याण विभाग की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। बड़ा सवाल है कि दिव्यांगता प्रमाण पत्र बनने के 10 वर्ष बाद भी आखिर क्यों और किन परिस्थितियों में सुधीर को योजनाओं के लाभ से वंचित रखा गया। हालांकि पीड़ित परिवार को अब भी उम्मीद है कि शायद इस बार उनकी आवाज अधिकारियों तक पहुंचेगी और सुधीर को उसका हक मिलेगा। जिसको लेकर शुक्रवार को भी वे अपने दिव्यांग पुत्र को कंधे पर लेकर सदर अस्पताल में चक्कर काटते नजर आए।