Air Pollution: बिहार के थर्मल पावर प्लांट पराली से 10 गुना अधिक प्रदूषण के लिए जिम्मेदार- CREA रिपोर्ट का दावा
Bihar Air Pollution: बिहार में वायु प्रदूषण के लिए थर्मल पावर प्लांट्स पराली से 10 गुना अधिक जिम्मेदार हैं। यह दावा CREA रिपोर्ट में किया गया। रिपोर्ट में 2015 के पर्यावरण मंत्रालय के मानकों का पालन न करने पर सवाल उठाया गया है। पढ़ें पूरी खबर...।
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बिहार में वायु प्रदूषण की समस्या केवल पराली जलाने तक सीमित नहीं है। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) की हालिया रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि राज्य के थर्मल पावर प्लांट पराली जलाने से 10 गुना अधिक सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) उत्सर्जित करते हैं। रिपोर्ट में चिंता जताई गई है कि किसी भी पावर प्लांट में फ्लू गैस डीसल्फराइजेशन (एफजीडी) सिस्टम नहीं लगा है, जो इस प्रदूषण को नियंत्रित करने में कारगर साबित हो सकता है।
साल भर का प्रदूषण फैलाते हैं थर्मल पावर प्लांट
रिपोर्ट के अनुसार, बिहार के छह प्रमुख थर्मल पावर प्लांट से हर साल 181 किलोटन सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जित होता है। इसके विपरीत, पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने से केवल 17.8 किलोटन उत्सर्जन होता है। पराली जलाने का प्रदूषण मौसमी होता है, लेकिन थर्मल पावर प्लांट पूरे वर्ष वायु प्रदूषण फैलाते रहते हैं।
एफजीडी सिस्टम से कितना बदलाव संभव?
एफजीडी (फ्लू गैस डीसल्फराइजेशन) सिस्टम सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन को 62 प्रतिशत तक कम कर सकता है। इस तकनीक के माध्यम से बिहार में सल्फर डाइऑक्साइड का उत्सर्जन 181 किलोटन से घटकर 68 किलोटन तक आ सकता है।
FGD लागू करने के बाद थर्मल पावर प्लांट के अनुसार संभावित SO₂ उत्सर्जन में कमी
पर्यावरण और स्वास्थ्य पर प्रभाव
सल्फर डाइऑक्साइड, वायुमंडल में सल्फेट कणों में परिवर्तित होकर पीएम 2.5 का मुख्य घटक बनता है, जो वायु गुणवत्ता को खराब करता है और स्वास्थ्य पर गंभीर असर डालता है। आईआईटी दिल्ली के अध्ययन के अनुसार, एफजीडी सिस्टम से 60-80 किमी के दायरे में सल्फर डाइऑक्साइड का स्तर 55 प्रतिशत और सल्फेट कणों का स्तर 30 प्रतिशत तक घटाया जा सकता है।
भारत: विश्व का सबसे बड़ा सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जक
2023 में भारत ने 6,807 किलोटन सल्फर डाइऑक्साइड का उत्सर्जन किया, जो तुर्की और इंडोनेशिया जैसे देशों से तीन गुना अधिक है। इसका बड़ा हिस्सा कोयला आधारित बिजली उत्पादन से आता है।
सीआरईए रिपोर्ट में 2015 के पर्यावरण मंत्रालय के मानकों का पालन न करने पर सवाल उठाया गया है। बार-बार राहत दिए जाने के कारण थर्मल पावर प्लांट्स एफजीडी सिस्टम लगाने में देरी कर रहे हैं। वहीं, किसानों पर पराली जलाने के लिए सख्त कार्रवाई की जाती है।
सीआरईए की सिफारिशें
1. समयसीमा तय करना- एफजीडी सिस्टम लगाने की सख्त समयसीमा।
2. दंडात्मक कार्रवाई- देरी के लिए जुर्माना।
3. पारदर्शिता- एफजीडी प्रगति पर नियमित जानकारी साझा करना।
4. थर्मल पावर प्लांट- वायु गुणवत्ता सुधारकर जनस्वास्थ्य पर खर्च कम करना।
बिहार के थर्मल पावर प्लांट वायु प्रदूषण के बड़े कारक हैं। एफजीडी सिस्टम जैसे तकनीकी उपायों को लागू कर न केवल प्रदूषण बल्कि इसके जनस्वास्थ्य पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को भी कम किया जा सकता है। समय रहते सख्त कदम उठाना पर्यावरण और लोगों दोनों के लिए आवश्यक है।