नोटबंदी: क्या मोदी के करीब जाना चाहते हैं नीतीश
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बिहार की सत्ता में साझीदार तीनों दलों के - यानी जनता दल यूनाइटेड (जदयू), राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस के दबे हुए मनभेद कुछ मुद्दों पर मतभेदों की शक्ल में उभरने शुरू हो गए हैं। ताजा उदाहरण है 500 और 1000 के पुराने नोटों पर लगा बैन।
नोटबंदी के ज्वलंत मुद्दे पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का जो चौंकाने वाला समर्थन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिला है, उससे दरार के वही संकेत सुर्खियों में आ गए हैं।वैसे, अभी यह महज संकेत ही है। इससे नीतीश-लालू गठबंधन सरकार में टूट-फूट की कोई ठोस गुंजाइश तलाशने वालों को फिलहाल निराशा ही हाथ लगेगी।
कारण स्पष्ट है। दोनों नेता राजनीति के ऐसे कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं कि 'जहर के घूंट' पीकर बहुमत से मिली 'अमृत नुमा' सत्ता को इतनी जल्दी गंवा देने जैसी गलती करेंगे।लेकिन हां, निपट स्वार्थ जनित सियासत के इस दौर में अपनी महत्वाकांक्षा या राजभोग की लालसा पूरी करने के लिये आगे की रणनीति बनाने से भला ये भी क्यों चूकेंगे?
नीतीश कुमार को अगर लगता है कि उन्हें प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाने वाली दिशा में लालू यादव और मुलायम सिंह यादव की युगलबंदी बाधक बन सकती है, तो उस पर 'नोटबंदी' समर्थन का तीर चला देना उनकी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। यह भी हो सकता है कि नीतीश कुमार नोटबंदी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का साहसिक कदम बता कर इस तीर से कई शिकार करना चाह रहे हों।
नोटबंदी प्रधानमंत्री का 'मास्टर स्ट्रोक' मानता है जदयू
एक तरफ उन्होंने काले धन या काले धंधे से अलग रहने वाले नेताओं जैसी अपनी छवि दर्शाने की कोशिश की है। दूसरी तरफ उनका यह कदम भाजपा से तालमेल वाले उनके मृत रिश्ते के फिर से जिंदा होने जैसी संभावना या अटकल को हवा दे कर उन्हें फायदा पहुंचा सकता है। जाहिर है कि ये दोनों बातें राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा विरोधी कारगर मोर्चेबंदी के इच्छुक नेताओं को चिंता में डाल सकती हैं। इसलिये यह दबाव नीतीश कुमार की नेतृत्व-चाहत को पूरी करने के काम आ सकता है।
नोटबंदी के मुद्दे पर नीतीश कुमार के रुख को कांग्रेस ने भी पसंद नहीं किया है।पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और बिहार के शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी ने अपने आलाकमान का इशारा पाकर इस बाबत गठबंधन धर्म के संदर्भ में एक सख्त बयान देने की हिम्मत की। एक नजरिया और है, जो नोटबंदी के सवाल पर जदयू में दिख रहे अंतर्विरोध का विश्लेषण देता है।
अपने दल के कुछ बड़े नेताओं को नीतीश कुमार ने नोटबंदी के खिलाफ खुल कर सामने आयी विपक्षी पार्टियों के साथ भी खड़ा कर दिया है। तर्क यह दिया जा रहा है कि विमुद्रीकरण पर अमल में गड़बड़ी की वजह से परेशान हो रहे आम लोगों की आवाज संसद में और सड़क पर उठाने में जदयू विपक्ष के साथ है। यानी नीतीश कुमार प्रतिपक्षी गोलबंदी से खुद को अलग-थलग भी दिखाना नहीं चाहते।विरोधाभास देखिये कि इसी दल के राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश इस नोटबंदी को प्रधानमंत्री का 'मास्टर स्ट्रोक' मानते हैं। तो क्या समझा जाय कि नीतीश कुमार इस प्रकरण में अपने दोनों हाथों में लड्डू देख रहे हैं? मेरे ख्याल से इस खेल में विश्वसनीयता घटने का जोखिम भी है।
गठबंधन के दरकने या बिखरने की आशंका कम
लेकिन यह भी सच है कि बिहार में लागू शराबबंदी को नीतीश कुमार ने अपनी खास उपलब्धि के रूप में देश भर में प्रचारित-प्रसारित करने/कराने की जो मुहिम छेड़ी, वह इस राज्य की गठबंधन सरकार के सबसे बड़े साझीदार राष्ट्रीय जनता दल की चुभन बन गयी है। इस बीच कई और ऐसे सरकारी निर्णय और कार्यक्रम सामने आये, जो राजद की उपेक्षा या जदयू के वर्चस्व के संकेत दे गये। साथ ही कुछ काण्ड ऐसे भी हुए, जिनमें जदयू को बचा कर राजद की छवि खराब होने देने के प्रयास दिखे।
इन तमाम अंदरूनी तल्खियों के बावजूद राजद, जदयू और कांग्रेस के बीच अभी कोई ऐसी तकरार मुखर नहीं हुई है, जिससे गठबंधन के दरकने या बिखरने की आशंका हो। फिर भी इतना तो दिख ही जाता है कि नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के बीच की पुरानी कड़वाहटें रह-रह कर जोर मारने लगती हैं।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)