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कितना सोना उगलेगी दरवेशपुरा की मिट्टी?

Thu, 13 Feb 2014 02:05 PM IST
Updated Thu, 13 Feb 2014 02:05 PM IST
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आलू की फ़सल तैयार होकर खेतों से हमारी-आपकी थाली में पहुंचने लगी है। ऐसे ही तैयार फ़सल का मुआयना करने फ़रवरी के दूसरे सप्ताह में आंध्र प्रदेश से किसानों और कृषि विशेषज्ञों का एक दल बिहार के दरवेशपुरा गांव का दौरा करने वाला है। आप के ज़ेहन में यह सवाल आ रहा होगा कि आलू उपजाने वाले भारत के हज़ारों गांवों में से इस टीम ने दरवेशपुरा को ही क्यों चुना?

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इसके बाद से ही यह गांव लगातार चर्चा में है और ख़बरनवीसों के साथ-साथ दूसरे लोगों को आर्कषित करता रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि दरवेशपुरा ‘विश्व रिकॉर्डधारी’ गांव है। बिहार सरकार के दावे के मुताबिक़ 2011 में नालंदा ज़िले के दरवेशपुरा गांव के एक नौजवान किसान सुमंत कुमार ने धान उत्पादन और 2012 में उसी गांव के एक दूसरे किसान नीतीश कुमार ने आलू उत्पादन में ‘विश्व रिकॉर्ड’ बनाया था।
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ऐसे में बीबीसी भी एक बार फिर दरवेशपुरा यह देखने-समझने पहुंची कि विश्व रिकॉर्ड की उपलब्धि के बाद दरवेशपुरा और उसके आस-पास के इलाक़ो में क्या कुछ बदला है? रिकॉर्ड बनाने वाले किसान अब क्या कर रहे हैं?

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दस इंच का मिर्च

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राष्ट्रीय राजमार्ग 31 पर पावापुरी मोड़ से नीचे उतरने के बाद दरवेशपुरा गांव जाने का रास्ता जैन धर्मावलंबियों की आस्था के केंद्र और प्रसिद्ध पर्यटन स्थल जल मंदिर से होकर गुज़रता है।

पता पूछते हुए दरवेशपुरा पहुंचने पर सबसे पहले सुमंत कुमार के घर पहुंचे। सुमंत आस-पास ही कहीं गए हुए थे। ऐसे में बात-चीत का सिलसिला शुरू करते हुए मैंने सुमंत के पिता रामानुज प्रवीण से कहा कि उनका गांव तो अब बहुत मशहूर हो गया है।

इस पर उन्होंने बताया कि ‘विश्व रिकॉर्ड’ बनाने के पहले से ही यह गांव अपने आलू की चमक और बड़े-बड़े तरबूज़ों के कारण पूरे इलाक़े में मशहूर रहा है। 1964 में गांव के ही राजेंद्र सिंह ने जब दस इंच का मिर्च उगाया था तो तब भी उनका गांव बहुत चर्चित हुआ था।

बदलाव के दौर से गुजर रहा है गांव

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‘विश्व रिकॉर्ड’ बनाने के बाद गांव कई बदलावों का गवाह बन रहा है। गांव में एक बार फिर से बिजली के बल्ब टिमटिमाने लगे हैं तो सकरी नदी पर प्रस्तावित पुल भी रिकॉर्ड के बहाने जल्दी पूरा हो गया है।

खेती की बात करें तो गांव में पहले के मुक़ाबले ज्यादा संख्या में किसान सिस्टम ऑफ़ राइस इंटिफ़िकेशन पद्धति यानि कि श्रीविधि से खेती करने लगे हैं।

जैसा कि किसान रवींद्र राम ने बताया कि उन्होंने भी अब सुमंत, नीतीश और दूसरे किसानों से प्रेरित होकर श्रीविधि से धान की खेती शुरू की है। रवींद्र के अनुसार इस विधि से खेती करने पर लागत पहले के मुक़ाबले लगभग आधा आती है और मौसम का साथ मिला तो उपज दोगुने से थोड़ा कम मिल जाता है।

सुमंत कुमार इस बदलाव को आंकड़ों में कुछ इस तरह बताते हैं। उनके अनुसार 2010 में तीन किसानों ने इस विधि से धान की खेती शुरु की थी। 2011 में जिस साल रिकॉर्ड बना उस साल तेरह किसानों ने इस विधि को अपनाया था और अब ऐसे किसानों की संख्या बीस पार कर गई है।

दरवेशपुरा के आस-पास के गांवों में भी अब किसान इस विधि को अपना रहे हैं। बग़ल के सैदी, सलिलचक जैसे गावों में भी कई किसानों ने बताया कि वे अब इस तकनीक का प्रयोग खेती में कर रहे हैं।

किसान न सिर्फ़ धान की खेती में इस तकनीक का प्रयोग कर रहे हैं बल्कि गेहूं, आलू अदि की खेती में भी वे इसे अपना रहे हैं।

नीतीश कुमार इसकी वजह यह बताते हें कि इलाक़े की ज़मीन पर पानी नहीं ठहरता है और श्रीविधि के लिए ऐसी ही ज़मीन चाहिए।

हालांकि वे श्रीविधि की सीमा की ओर इशारा करते हुए यह भी बताते हैं कि इसके लिए बड़े पैमाने पर मज़दूर और ऐसा नहीं होने पर मशीनों की ज़रूरत पड़ती है। उनके अनुसार फ़िलहाल क्षेत्र में दोनों की ही कम उलबध्ता के कारण बड़ी संख्या में किसान इस विधि को नहीं अपना पा रहे हैं।

आलू में प्रयोग

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नालंदा के दरवेशपुरा के किसानों ने पिछले सालों में फसल उत्पादन में 'रिकॉर्ड' क़ायम किया है। इस बार अधिक ठंड और बारिश के कारण गांव में आलू की फ़सल बड़े पैमाने पर ख़राब हुई है। पिछता आलू यानी की देर से रोपे गए आलू की फ़सल इस वजह से ज़्यादा प्रभावित हुई गांव के किसानों का आकलन है कि इस बार उपज लगभग आधी ही रह पाएगी।

मौसम की मार झेलने के बावजूद किसान नीतीश कुमार ने फिर से आलू की पैदावार को रिकॉर्ड बनाने के लिए कृषि पदाधिकारियों को लिखा है।

साथ ही यहां के कुछ किसानों ने अब आलू की खेती में भी व्यापक स्तर पर मशीनों का प्रयोग शुरू किया है। जैसा कि सुमंत कुमार ने बताया कि उन्होंने इस बार आलू की रोपाई मशीन से ही की थी। साथ ही वे ख़ुद से भी कुछ प्रयोग करने लगे हैं।

सुमंत कुमार के अनुसार इस बार उन्होंने आलू के दो पंक्तियों को मिला कर क्यारियों के बीच दूरी बढ़ा दी है जिससे कि ज्यादा पौधे रोपे जा सके। वे आगे बताते हैं कि अगर यह प्रयोग सफल रहा तो वे अन्य फ़सलों में भी इसे अपनाएंगे।

दूसरी ओर पहली बार यहां के कुछ किसानों ने चिप्स बनाने वाली कंपनियों के लिए आलू की कांट्रेक्ट खेती शुरु की है। किसान अमरेंद्र कुमार ने छह कट्ठे में पेप्सिको कंपनी के लिए आलू लगाए हैं।

इस तरह की खेती के अनुभवों के बारे में वे यह बताते हैं कि फ़िलहाल तो पुराने आलू के मुक़ाबले खाद और दवा में ज़्यादा ख़र्च हुआ है, फ़सल के बारे में अगले कुछ दिनों में पता चलेगा क्योंकि यह आलू देर से तैयार होता है।

परेशानी भी बढ़ी

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शोहरत की क़ीमत भी चुकानी पड़ती है। ऐसा इन विश्व रिकॉर्डधारी किसानों के साथ भी हो रहा है। खेती-किसानी के बारे में बात करते हुए सुमंत कह बैठते हैं, "देखिए न, अब पिछले चार घंटे से आप के साथ हैं। अब आज का दिन तो समझिए बेकार गया।"

दरअसल सुमंत और नीतीश कुमार की परेशानी यह है कि इन्हें अक्सर गांव आने वालों के साथ समय बिताना पड़ता है या फिर गांव का प्रतिनिधत्व करने के लिए बाहर जाना पड़ता है। दोनों ही परिस्थितियों में अपना काम प्रभावित होता है।

लेकिन इस ‘परेशानी’ के फ़ायदे भी हैं। इसके बारे में नीतीश कुमार बताते हैं कि कर्नाटक के दौरे के दौरान जहां वे धान के 350 से अधिक बीजों से परिचित हुए, वहीं उत्तर प्रदेश के क़ायमगंज जाने पर ज़ीरो बजट फ़ार्मिंग के बारे में सीखा।

दुनिया भर में शोहरत

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पहले सूखा और फिर पायलिन चक्रवात के कारण हुई ज़्यादा बारिश के कारण सुमंत इस बार धान उपज में अपने ‘विश्व रिकॉर्ड’ के आस-पास भी नहीं पहुंच सके। लेकिन इस बार उन्हें अपनी गेहूं की फ़सल देख कर ऐसा लग रहा है कि वे इसके उत्पादन में कोई रिकॉर्ड बनाएंगे।

अगर ऐसा हुआ तो ज़ाहिर है कि एक बार फिर दावों और प्रतिदावों का दौर शुरू होगा। लेकिन इनके बीच दरवेशपुरा से आशा की फूटी किरणें फ़सलों की उपज बढ़ाने का रास्ता बता रही हैं। किसानों में यह हौसला भर रही हैं कि खेती फिर से लाभदायक हो सकती है।

साथ ही यह भी कि खेती के ज़रिए भी दुनिया में मशहूर हुआ जा सकता है।

फ़सल उत्पादन का विश्व रिकॉर्ड

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सुमंत कुमार- प्रति हेक्टेयर 22।4 टन धान का उत्पादन (2011)

नीतीश कुमार- प्रति हेक्टेयर 72।9 टन आलू का उत्पादन (2012)

धान में पिछला विश्व रिकॉर्ड 19।4टन प्रति हेक्टेयर उपज के साथ चीन के कृषि वैज्ञानिक युआन लॉंगपिंग का था।

वहीं आलू में यह रिकॉर्ड नीदरलैंड के एक किसान का था जिन्होंने प्रति हेक्टेयर 53।5 टन आलू पैदा किया था।

गांव वालों के मुताबिक़ इसी गांव के राजेंद्र सिंह ने 1964 में दस इंच का मिर्च उगा कर रिकॉर्ड बनाया था।

दरवेशपुरा गांव बड़े-बड़े तरबूज़ों के लिए भी जाना जाता रहा है।

दरवेशपुरा में आख़िर ऐसा क्या है?

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दरवेशपुरा, बिहार के नालंदा ज़िले का एक गांव है जो पिछले साल अचानक तब सुर्ख़ियों में आया जब बिहार सरकार ने दावा किया कि उस गांव के दो किसान ने धान और आलू की पैदावार में विश्व रिकॉर्ड बनाया है।

इस ख़बर के आने के बाद उस समय भी बीबीसी ने गांव का दौरा किया था। हालांकि उन किसानों और बिहार सरकार के दावों पर कुछ लोगों ने शक भी जताया लेकिन उसके बाद से ही ये गांव दुनिया की नज़रों में आ गया।

हालांकि गांव वाले कहते हैं कि उनका गांव इससे पहले भी कई और पैदावार के लिए जाना जाता रहा है। एक बार फिर ये गांव सुर्ख़ियों में है और बीबीसी ने फिर इस गांव का दौरा कर सच जानने की कोशिश की है।

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