ये 5 वजहें भाजपा को दिला सकती हैं बिहार में जीत
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बिहार चुनावों में पूरे दमखम के साथ उतरी भाजपा की जीत की राह इस बार कुछ आसान होती दिख रही है। खासकर पिछले कुछ समय में जिस तरह समीकरण बदले हैं उससे भाजपा के रणनीतिकारों के चेहरे पर चमक बढ़ती दिख रही है।
बिहार चुनावों में अचानक ओवैसी की एंट्री और समाजवादी मुखिया मुलायम सिंह का महागठबंधन से नाता तोड़ना भाजपा के लिए सोने पर सुहागे की तरह हो गया है। ऐसे में आइये एक बार निगाह डालते हैं उन पांच कारणों पर जो बिहार चुनावों में भाजपा गठबंधन को दिला सकते हैं विजय।
सत्ता विरोधी लहर
भाजपा के लिए सबसे मुफीद बात तो ये है कि उसका मुकाबला जिस गठबंधन से है पिछले 25 सालों से बिहार में उसी का राज है। ऐसे में भाजपा मानकर चल रही है कि उसे सत्ता विराधी लहर का फायदा मिल सकता है।
पिछले दस साल से नीतीश कुमार की जेडीयू सत्ता पर काबिज है तो उससे पहले 15 साल तक बिहार में लालू यादव का एकछत्र राज रहा। नतीजतन लोगों के दिल में अब सत्ता को लेकर विरोध के स्वर शुरू हो गया हैं। मौके की नजाकत को देखते हुए भाजपा भी इसे तूल देने में लगी है।
जातिगत समीकरणों का साथ
जातिगत समीकरणों की प्रयोगशाला बिहार में भाजपा पूरी तरह कास्ट को सामने रखकर चुनाव लड़ रही है। भाजपा के गठबंधन सहयोगियों पर निगाह डालें तो भी इसका अंदाजा हो जाता है।
एससी/एसटी वोटों के लिए भाजपा ने जहां पहले से ही लोक जनशक्ति पार्टी के रामविलास पासवान को अपने पाले में कर रखा था वहीं छह फीसदी मूसहर वोटों के लिए पूर्व मुख्मंत्री जीतन राम मांझी को अपने साथ कर भाजपा ने विरोधियों को कड़ी टक्कर देने की तैयारी शुरू कर दी है।
इसके अलावा कुशवाहा वोटों पर मजबूत पकड़ रखने वाले उपेन्द्र कुशवाहा और उनकी रालोसपा पहले से ही भाजपा के साथ हैं। जबकि पिछड़े वर्ग के लिए पूर्व उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी भाजपा के लिए मजबूत स्तंभ हो सकते हैं।
बेशक मुस्लिम वोटरों में भाजपा आज भी पहली पसंद न हो लेकिन पार्टी इन वोटों पर भी पूरी निगाहें गड़ाए हुए है यही कारण है कि जेडीयू से निकाले गए और कभी नीतीश के खास रहे साबिर अली को भाजपा ने अपने साथ जोड़ लिया है।
ओवैशी फैक्टर
बिहार में भाजपा को सबसे बड़ी राहत मिली है हैदाराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की एंट्री से। जिन्होंने बिहार में अपनी पार्टी एमआईएम को उतारने का ऐलान कर दिया है। ओवैसी बेशक फिलहाल सीमांचल की दो दर्जन सीटों पर ही अपने उम्मीदवार उतारेंगे लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि उनकी उपस्थिति बिहार में मुस्लिम वोटों को प्रभावित करेगी।
जिन मुस्लिम वोटों को राजद, जेडीयू और कांग्र्रेस पूरी तरह अपने खाते में मानकर चल रही थी अब उसमें बंटवारा होना तय है। दूसरी ओर जिस तरह ओवैसी अपने भाषण देते हैं उससे वोटों के ध्रुवीकरण से भी इंकार नहीं किया जा सकता। इसका फायदा भाजपा महाराष्ट्र चुनावों में उठा सकती है। ऐसे में अगर ओवैसी अपने पैर जमाने में कामयाब रहे तो साफ है वो विपक्षियों का खेल बिगाड़ सकते हैं।
लालू का जंगलराज
पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव बेशक एक दौर में मुस्लिम और पिछडों के सर्वमान्य नेता हुआ करते थे लेकिन बिहार में 15 साल के उनके शासन ने यहां हालातों को जिस तरह बदतर किया उसे लोगों ने जंगलराज की संज्ञा दे दी।
लालूराज में कानून व्यवस्था इस तरह बिगड़ी थी कि अपहरण को पूरी तरह उद्योग की शक्ल मिल गई थी। उस दौर में डकैती और हत्याएं तो आम बात थी। ऐसे में उसी लालू के साथ नीतीश इस बार फिर मैदान में है।
भाजपा अब लालू के बहाने ही लोगों को जंगलराज 2 का डर दिखा रही है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी आरजेडी की नई परिभाषा गढ़ते हुए इसे रोजाना जंगलराज का डर नाम दे दिया था।
सपा गठबंधन की जुदाई
हाल में महागठबंधन से जिस तरह समाजवादी पार्टी की विदाई हुई है उसने लालू-नीतीश की जोड़ी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। मुलायम सिंह ने राजनीतिक अपमान करने का आरोप लगाते हुए महागठबंधन से पल्ला झाड़कर छह दलों के साथ मिलकर तीसरा मोर्चा बना लिया है।
इससे महागठबंधन की ताकत भी कम हुई है। विपक्ष के किले में इस कदर सेंध लगती देख भाजपा की बांछे खिली हुई हैं। वैसे भी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की शुरूआत से चुनावी रणनीति विपक्ष में सेंध लगाकर उसमें फूट डालने की रहती है।
इसका सफल प्रयोग भाजपा हरियाणा और झारखंड के चुनावों में कर चुकी है जहां छितराए विपक्ष के सामने उसे अकेले दम विजय प्राप्त करने में कोई दिक्कत नहीं हुइ थी।