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जनता परिवारः बनने से पहले टूटने की कगार पर क्यों?

Tue, 26 May 2015 08:17 AM IST
Updated Tue, 26 May 2015 08:17 AM IST
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Bihar: why janta pariwar in trouble before bihar election

मोदी सरकार के खिलाफ जोर-शोर से शुरू हुआ तीसरे मोर्चे का दूसरा प्रयोग 'जनता परिवार' अपने पहले ही मोर्चे पर फेल होता दिख रहा है। अपने असली इत्मिहान बिहार चुनाव से पहले ही जनता परिवार के सभी घटक दलों में एक दूसरे के प्रति अविश्वास और निजी महत्वाकाक्षाएं सतह पर आती दिख रही हैं।

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आपसी खींचतान का आलम ये है कि विलय की घोषणा के डेढ़ महीने बाद भी अभी तक न नए दल का निशान तय हो पाया है न ही नाम। आलम ये है कि जहां बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जल्द से जल्द विलय की प्रक्रिया पूरी करने के लिए जोर दे रहे हैं वहीं लालू यादव और मुलायम सिंह इस पर ठंडा रुख अपनाए हुए हैं।
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दो दिन पहले दिल्ली में हुई 'महत्वपूर्ण' बैठक भी इसी हीला-हवाली की भेंट चढ़ गई। ऐसे में बिहार में चुनाव से पहले तैयार होने वाले बड़े मोर्चे पर भी ग्रहण लगता दिख रहा है। असल में केवल मोदी विरोध के नाम पर जल्दबाजी और अति उत्साह में जन्म लेने वाले महाविलय में अब कई पेंच फंसते नजर आ रहे हैं।
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जल्दबाजी में हुई घोषणा, अब तौल रहा नफा नुकसान

Bihar: why janta pariwar in trouble before bihar election

जनता परिवार की घोषणा के बाद अब हर कोई अपने अपने नफे नुकसान तौलने में लगा है। जनता परिवार के सबसे बड़े घटक दल समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह को बेशक सर्वसम्मति से नए परिवार का मुखिया चुन लिया गया हो लेकिन सबसे ज्यादा दिक्‍कत भी उन्हीं के 'परिवार' की ओर से हैं।

असल में जनता परिवार में शामिल समाजवादी पार्टी ही अकेली ऐसी पार्टी है जिसका अन्य दलों के मुकाबले सबसे ज्यादा जनाधार है। पार्टी के विधायकों और सांसदों की संख्या भी सबसे ज्यादा है। ऐसे में अगर सपा का विलय जनता परिवार में होता है तो उसका अपना अस्तित्व खत्म हो जाएगा।

इसके अलावा समजावादी पार्टी पर जिस तरह से मुलायम परिवार का कब्जा है वो हनक नए दल में रह पाना संभव नहीं है। एक दिक्‍कत ये भी है कि भविष्य में कभी दल का विभाजन हुआ तो भी पार्टी को सबसे ज्यादा नुकसान उड़ाना पड़ सकता है। दूसरी दिक्‍कत घटक के दूसरे बड़े दल राजद सुप्रीमो लालू यादव को है।

बीच दौराहे पर फंस गए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार

Bihar: why janta pariwar in trouble before bihar election

मोदी विरोध के नाम पर बेशक वो अपने कभी धुर विरोधी रहे नीतीश कुमार के साथ आ गए हों लेकिन अपनी ही पार्टी में उन्हें नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री के तौर पर स्‍वीकार करना मुश्किल है।

कभी बिहार की राजनीति के किंगमेकर कहे गए लालू की हरसंभव कवायद यही रहेगी की वो ज्यादा से ज्यादा सीटों पर अपने उम्‍मीदवार खड़े कर सकें ताकि चुनाव बाद जीतकर आने पर मोलभाव करने में किसी तरह की दिक्‍कत न हो। और यह जनता परिवार के विलय में होना मुश्किल है।

ऐसे में उनका सारा जोर गठबंधन के साथ चुनाव लड़ने पर है। दूसरी ओर नीतीश की दिक्‍कत ये है कि अगर चुनाव विलय के बजाय गठबंधन पर हुआ तो उन्हें लालू के लिए अच्छी खासी सीटें छोड़नी पड़ सकती हैं, जबकि मुलायम की सपा, कांग्रेस और अन्य छोटे छोटे दल भी अपना हिस्सा मांगकर उनकी भागीदारी कम कर सकते हैं।

इसलिए वो जल्द से जल्द विलय की प्रक्रिया को पूरा होते देखना चाहते हैं, लेकिन हाल फिलहाल की परिस्थितियों में यह मुमकिन होता नहीं दिख रहा है।

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