बिहारः अपमान और प्रतिशोध की इस जंग में किसकी होगी जीत
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बिहार में विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण के लिए मतदान जारी है। 6 जिलों की 32 विधानसभा सीटों पर चले रहे मतदान में यूं तो हर सीट पर नेताओं के साथ साथ मतदाताओं की निगाहें भी लगी हुई हैं लेकिन जो सीट सबकी निगाहों के केन्द्र में है वो है इमामगंज सीट।
इस सीट को बिहार चुनावों की सबसे हॉट सीट और इस पर होने वाले मुकाबले को सबसे सुपरहिट मुकाबला माना जा रहा है। वजह है यहां होने वाली दो दिग्गजों राजनीतिक की जोरदार भिडंत।
जनता दल यूनाइटेड के उदय नारायण चौधरी पांच बार इस सीट से चुनाव जीत चुके हैं, पिछले चार बार से वो लगातार यहां अपना परचम फहरा रहे हैं। वह बिहार विधानसभा के निर्वतमान अध्यक्ष भी हैं। लेकिन राजनीतिक के मंझे खिलाड़ी माने जाने वाले उदय नारायण चौधरी इस बार अपनी सीट पर ही कांटे के मुकाबले में फंस गए हैं।
बदला लेने के लिए मांझी ने पूर्व स्पीकर के सामने ठोकी ताल
उनके सामने ताल ठोंके खड़े हैं पूर्व मुख्यमंत्री और बिहार की राजनीति में बड़ा नाम बन चुके जीतन राम मांझी। मांझी हालांकि अपनी पारंपरिक मखदूमपुर सीट से भी चुनाव लड़ रहे हैं लेकिन अपने राजनीतिक अपमान का बदला लेने के लिए उन्होंने उदय नारायण चौधरी के सामने भी पर्चा दाखिल कर दिया है।
मांझी उन्हें हराकर अपने उस अपमान का बदला लेना चाहते हैं जिसकी वजह से उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी थी। मांझी मानते हैं कि उन्हें मुख्यमंत्री के पद से बेदखल करने में स्पीकर रहे उदय नारायण चौधरी की बड़ी भूमिका रही है और उन्होंने पक्षपात कर मांझी को कुर्सी से बेदखल कर दिया।
चौधरी से मांझी इस कदर खुन्नस खास हुए हैं कि भाजपा के साथ सीटों का बंटवारा होने के बाद भी उन्होंने चौधरी के सामने लड़ने के लिए एक अतिरिक्त सीट मांगी और इमामगंज से पर्चा दाखिल कर दिया।
इमामगंज से कई बार विधायक रहे हैं चौधरी
मांझी के लिए राहत भरी बात ये भी हो सकती है कि झारखंड से लगते बिहार के इस नक्सल प्रभावित इलाके में महा दलित वोटरों की अच्छी खासी तादाद है। और मांझी पिछले कुछ समय में खुद को महादलितों का बड़ा नेता साबित कर चुके हैं।
हाल के दिनों में मांझी ने बिहार की राजनीति को जैसे अपने इर्द गिर्द केन्द्रीत किया और दलितों के एक बड़े नेता के तौर पर पहचान बनाई उससे उनकी हार जीत पर अब बिहार ही नहीं देशभर की निगाहें टिकी हुई हैं।
मांझी अगर यहां जीत दर्ज करते हैं तो उनका बदला तो पूरा होगा ही वो राज्य में एक बार फिर दलित राजनीति के केन्द्र बन जाएगा और हारने पर निश्चित रूप से उनका वजूद काफी कम हो जाएगा। वहीं अगर चौधरी हारते हैं तो इसका खामियाजा जेडीयू को उठाना पड़ सकता है जिसे एक बड़े दलित चेहरे से महरूम होना पड़ सकता है।