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परिंदों को समझता हूं, उनसे बातें करता हूं
पन्नालाल महतो
Updated Thu, 03 May 2018 04:05 PM IST
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पन्नालाल महतो
- फोटो : फाइल फोटो
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उन्हें भूख लगी है, मुझे पता चल जाता है। वे किस मनोदशा में हैं, मुझे दिख जाता है। उन्हें क्या चाहिए, मुझे यह भी मालूम होता है। उनकी भाषा में भले शब्द न हो, लेकिन उनसे बात करना मेरे लिए कोई मुश्किल काम नहीं है। मैं उन्हें समझता हूं और वे मुझे। यह रिश्ता है मेरे और जंगली परिंदों के बीच।
लोग मुझे बर्डमैन कहते हैं, क्योंकि मैं चिड़ियों से बातचीत कर सकता हूं। मैं झारखंड के रामगढ़ जिले के सरइयां कुंदरू गांव में रहता हूं। पिछले कई वर्षों से मैं जंगल के अपने विभिन्न किस्म के दोस्तों के साथ जीवन बिता रहा हूं। मुझे पक्षियों से बात करने में बहुत आनंद आता है। अब इसे मेरा शौक कहें या आदत, लेकिन मेरी पहचान यही है।
दरअसल बचपन से मैं इसी माहौल में बड़ा हुआ हूं। मैं एक ऐसे परिवार से ताल्लुक रखता हूं, जहां तोता और तीतर जैसे पंक्षी पालने की परंपरा रही है। बचपन से ही मैंने अपने घर में पक्षियों की आदतों को बहुत करीब से समझा है। और समझने की इसी प्रक्रिया में मेरी दिलचस्पी घर के बाहर दूसरे पक्षियों तक जा पहुंची। न सिर्फ दिलचस्पी, बल्कि इन सुंदर प्राणियों के साथ जीवन बिताने के लिए मैंने हाई स्कूल के बाद पढ़ाई छोड़ दी। हालांकि जहां मैं रहता हूं, वहां इतनी पढ़ाई भी कम नहीं मानी जाती। मैं लगातार विभिन्न पक्षियों को देखता, उनकी हरकतों का सूक्ष्म अध्ययन करता।
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नतीजा यह निकला कि बहुत जल्द ही मैं इन परिंदों का व्यवहार समझने वाला विशेषज्ञ बन गया। बीतते वक्त के साथ पक्षी मेरी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गए। पंखों वाले अपने कुछ खास दोस्तों से मिलना-जुलना मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। उन्हीं के साथ खाना-पीना भी होने लगा। एक वक्त ऐसा आ गया कि मैं कौआ, कोयल, कबूतर, तोता जैसे चालीस प्रजाति के पक्षियों से सीधी बातचीत करने लगा।
इस सबके बावजूद मैंने पक्षियों के बारे में सीखना-समझना जारी रखा। आसपास कहीं भी पक्षी संरक्षण से जुड़ा कोई कार्यक्रम या सेमिनार की खबर होती, तो मैं वहां जरूर जाता। इससे यह फायदा हुआ कि स्कूल-कॉलेजों में मैं खुद कार्यशालाएं आयोजित करने लगा। दूसरों को पक्षियों के व्यवहार से जुड़ी कई बातें बताने के साथ मैं उनसे पक्षी संरक्षण की भी अपील करने लगा। इसके बाद तो वन विभाग वाले भी मेरी मदद लेने लगे। उन्हें पक्षियों से जुड़ी कोई भी समस्या होती है, तो वे मुझे याद करते हैं।
मैं हमेशा अपने साथ एक बैग लेकर चलता हूं, जिसमें पक्षियों से जुड़ी कुछ दवाइयां होती हैं। कहीं भी कोई पक्षी मुझे घायल दिखता है, तो मैं उसका उपचार करता हूं। मैं अपनी मासिक आय का एक निश्चित हिस्सा परिंदों के लिए खर्च करता हूं। मैं ज्यादातर हरे रंग के कपड़े पहनना पसंद करता हूं, क्योंकि इस रंग से पक्षियों को प्यार होता है।
इतना सब के करने के बाद भी मुझे लगता है कि मुझे पक्षियों की दुनिया और बेहतर तरीके से समझनी है, जिसके लिए शायद मेरा पूरा जीवन ही कम पड़ जाए। लेकिन मैं पूरा प्रयास करूंगा कि पक्षियों से न सिर्फ मेरे संबंधों में मजबूती आए, बल्कि दूसरे लोग भी इसके लिए जागरूक हों। आज पक्षियों की कई प्रजातियां खतरे में हैं, जिन्हें सरकारी मदद के साथ आम लोगों की परवाह की जरूरत है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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लोग मुझे बर्डमैन कहते हैं, क्योंकि मैं चिड़ियों से बातचीत कर सकता हूं। मैं झारखंड के रामगढ़ जिले के सरइयां कुंदरू गांव में रहता हूं। पिछले कई वर्षों से मैं जंगल के अपने विभिन्न किस्म के दोस्तों के साथ जीवन बिता रहा हूं। मुझे पक्षियों से बात करने में बहुत आनंद आता है। अब इसे मेरा शौक कहें या आदत, लेकिन मेरी पहचान यही है।
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दरअसल बचपन से मैं इसी माहौल में बड़ा हुआ हूं। मैं एक ऐसे परिवार से ताल्लुक रखता हूं, जहां तोता और तीतर जैसे पंक्षी पालने की परंपरा रही है। बचपन से ही मैंने अपने घर में पक्षियों की आदतों को बहुत करीब से समझा है। और समझने की इसी प्रक्रिया में मेरी दिलचस्पी घर के बाहर दूसरे पक्षियों तक जा पहुंची। न सिर्फ दिलचस्पी, बल्कि इन सुंदर प्राणियों के साथ जीवन बिताने के लिए मैंने हाई स्कूल के बाद पढ़ाई छोड़ दी। हालांकि जहां मैं रहता हूं, वहां इतनी पढ़ाई भी कम नहीं मानी जाती। मैं लगातार विभिन्न पक्षियों को देखता, उनकी हरकतों का सूक्ष्म अध्ययन करता।
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नतीजा यह निकला कि बहुत जल्द ही मैं इन परिंदों का व्यवहार समझने वाला विशेषज्ञ बन गया। बीतते वक्त के साथ पक्षी मेरी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गए। पंखों वाले अपने कुछ खास दोस्तों से मिलना-जुलना मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। उन्हीं के साथ खाना-पीना भी होने लगा। एक वक्त ऐसा आ गया कि मैं कौआ, कोयल, कबूतर, तोता जैसे चालीस प्रजाति के पक्षियों से सीधी बातचीत करने लगा।
इस सबके बावजूद मैंने पक्षियों के बारे में सीखना-समझना जारी रखा। आसपास कहीं भी पक्षी संरक्षण से जुड़ा कोई कार्यक्रम या सेमिनार की खबर होती, तो मैं वहां जरूर जाता। इससे यह फायदा हुआ कि स्कूल-कॉलेजों में मैं खुद कार्यशालाएं आयोजित करने लगा। दूसरों को पक्षियों के व्यवहार से जुड़ी कई बातें बताने के साथ मैं उनसे पक्षी संरक्षण की भी अपील करने लगा। इसके बाद तो वन विभाग वाले भी मेरी मदद लेने लगे। उन्हें पक्षियों से जुड़ी कोई भी समस्या होती है, तो वे मुझे याद करते हैं।
मैं हमेशा अपने साथ एक बैग लेकर चलता हूं, जिसमें पक्षियों से जुड़ी कुछ दवाइयां होती हैं। कहीं भी कोई पक्षी मुझे घायल दिखता है, तो मैं उसका उपचार करता हूं। मैं अपनी मासिक आय का एक निश्चित हिस्सा परिंदों के लिए खर्च करता हूं। मैं ज्यादातर हरे रंग के कपड़े पहनना पसंद करता हूं, क्योंकि इस रंग से पक्षियों को प्यार होता है।
इतना सब के करने के बाद भी मुझे लगता है कि मुझे पक्षियों की दुनिया और बेहतर तरीके से समझनी है, जिसके लिए शायद मेरा पूरा जीवन ही कम पड़ जाए। लेकिन मैं पूरा प्रयास करूंगा कि पक्षियों से न सिर्फ मेरे संबंधों में मजबूती आए, बल्कि दूसरे लोग भी इसके लिए जागरूक हों। आज पक्षियों की कई प्रजातियां खतरे में हैं, जिन्हें सरकारी मदद के साथ आम लोगों की परवाह की जरूरत है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।