फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Bashindey ›   Garvita Gulhati-18 year old Indian nominated to be Global Change maker

'जल है तो कल है की थीम दुनिया को चाहती हूं समझाना'

Wed, 22 Aug 2018 03:21 PM IST
गर्विता गुलाटी
गर्विता गुलाटी Updated Wed, 22 Aug 2018 03:21 PM IST
विज्ञापन
Garvita Gulhati-18 year old Indian nominated to be Global Change maker
गर्विता गुलाटी

किसी आशावादी इंसान को जो गिलास आधा भरा नजर आता है, निराशावादी व्यक्ति को वही गिलास आधा खाली दिखाई देगा। लेकिन मेरे जैसे को गिलास में सिर्फ पानी दिखता है, जिसे बर्बाद होने से बचाना है। मुझे याद है जब मैं छठी कक्षा में थी, मैंने एक समाचार पत्र में एक कार्टून देखा था। उस कार्टून में दिखाया गया था कि एक बस ड्राइवर कुछ पर्यटकों को एक स्मारक दिखा रहा है। वह स्मारक एक पेड़ था, जिसे देखने वालों की पीठ पर कोई सामान्य बैग नहीं, बल्कि ऑक्सीजन बैग लटके हुए थे। उस कार्टून का असर लंबे समय तक मेरे दिलो-दिमाग पर रहा। मैं कह सकती हूं कि पहली दफा पर्यावरण संरक्षण के बारे में मैंने तभी सोचा था।

विज्ञापन


मैं बंगलूरू में रहती हूं और मेरी उम्र अठारह साल है। कुछ समय पहले से मैं पानी बचाने के लिए लोगों के बीच 'व्हाय वेस्ट' नाम से एक विशेष जागरूकता अभियान चला रही हूं। इस पहल के जरिये मैं लोगों से अपील करती हूं कि वे अपने स्तर पर पानी की बर्बादी रोकें। तीन साल पहले की बात है, मैंने एक बड़ी कंपनी के सीईओ का प्रेजेंटेशन देखा। उसमें बताया गया था कि विभिन्न रेस्टोरेंट में प्रति वर्ष लगभग डेढ़ करोड़ लीटर साफ पीने का पानी यों ही बर्बाद हो जाता है।
विज्ञापन


इन जगहों पर लोग पीने के लिए पूरा गिलास पानी लेते हैं और अमूमन आधा गिलास पानी छोड़ देते हैं। इस सच्चाई को जानने के बाद ही मैंने इस दिशा में काम करने का मन बना लिया। मैंने सोच लिया कि मैं लोगों को इस बाबत जागरूक करूंगी कि वे अनजाने में ही सही, देश के अमूल्य संसाधनों को बेवजह बर्बाद कर रहे हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

दरअसल जब हम समाज में किसी भी तरह का बदलाव लाने के बारे में सोचते हैं, तब हम इंतजार नहीं कर सकते। हमें पहला कदम खुद बढ़ाना होता है, बाकियों के साथ आने की उम्मीद तभी की जा सकती है।

सबसे पहले मैंने शहर के उन इलाकों को चिह्नित किया, जहां काम करने की अधिकतम संभावनाएं थीं। बड़े-बड़े रेस्टोरेंट और खाने की दुकानों की सूची बनाई, क्योंकि जहां ज्यादा ग्राहक, पानी की बर्बादी भी वहीं ज्यादा। मुझे पता है कि इस मामले में रेस्टोरेंट मालिकों से बड़ी भूमिका आम लोगों की है। रेस्टोरेंट्स में पानी बर्बाद करने पर कोई मनाही नहीं होती। मेरे अभियान की शुरुआत में रेस्टोरेंट मालिकों ने अच्छी प्रतिक्रिया नहीं दी। उन्हें सही नहीं लगता था कि कोई आकर उनके ग्राहकों की आदत बदलने की कोशिश करे। लेकिन मैं अपने काम में जुटी रही। यही कारण है कि पिछले दो वर्षों की मेरी तपस्या के बाद आज दर्जनों रेस्टोरेंट मालिक हमारी मुहिम के साथ हैं।

मैं अपने दोस्तों के साथ मिलकर लोगों की दिमागी धारणाएं बदलने के लिए काम कर रही हूं। हमें कई अन्य संस्थाओं का समर्थन मिला है, जिनके साथ मिलकर हम दूसरे शहरों तक अपना अभियान पहुंचा चुके हैं। विभिन्न कॉलेज-स्कूलों पर आधारित मैंने दो अन्य सामाजिक समूह भी बनाए हैं, जिनके नाम हैं-चेंजमेकर्स सोसाइटी और लीड यंग। मैं कई स्कूलों में जाकर बच्चों को भी पानी बचाने की नई-नई तरकीबें सिखाती हूं। मुझे पता है कि कुछ भी अचानक नहीं बदलेगा, लेकिन यह भी पता है कि लगातार कोशिशों से बड़ा से बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed