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एक भावुक कर देने वाली घटना से शुरु हुआ गरीब बच्चों को पढ़ाने का सिलसिला
राहुल यादव, अमर उजाला/जम्मू
Updated Sat, 04 Jun 2016 12:29 PM IST
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- फोटो : Amar Ujala
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अपने आस-पास में रहने वाले लोगों की सहायता के लिए जरुरी नहीं है कि जब आपके पास पैसे हो तभी आप किसी की मदद कर सकते हैं। अगर सच में आप कुछ करने की चाह रखते हैं तो इसके लिए सिर्फ इच्छाशक्ति की जरुरत होती है। जम्मू शहर की सैनिक कालोनी में रहने वालीं शमीम रिजवी इसकी एक बानगी हैं।
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शमीम रिजवी सैनिक कालोनी में रहने वाले मजदूरों के बच्चों को फ्री में पढ़ाती हैं। आपको बता दें कि इस इलाके में कई राज्यों से आए मजदूर रहते हैं। जो यहां पर कमाई के लिए भवन निर्माण जैसे कामों से जुड़े हुए हैं, बाहरी राज्यों से आए इन लोगों के बच्चे पढ़ाई-लिखाई से मरहूम हैं।
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शमीम रिजवी दो साल पहले ही जम्मू में रहने आई हैं। उनके पति राशिद अली जम्मू केंद्रीय विवि में साहयक प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हैं। आसपास के बच्चों को पढ़ाने के पीछे एक बेहद ही भावुक कर देने वाली कहानी है।
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शमीम ने बताया कि एक दिन उन्हें अपने घर के बाहर एक बच्चे की तेज-तेज रोने की आवाज आई। जब उन्होंने बाहर आकर देखा तो एक बच्चा सड़क पर रो रहा था। पूछने पर पता चला कि बच्चा भूखा और उसकी बहन के पास खिलाने के लिए पैसे नहीं हैं। बच्चे के माता-पिता मजदूरी के लिए बाहर गए हुए थे। शमीम बच्चे को अपने घर ले आई और इसे खाने के लिए दिया। शमीम ने जब उस बच्चे की बहन से पूछा कि तुम लोग पढ़ने जाते हो? तो उसने बताया कि उनके पास पढ़ने के लिए पैसे नहीं है।
इसके बाद शमीम ने उस लड़की को खुद पढ़ाने के लिए कहा और साथ में खाने-पीने की चीजों का लालच भी दिया, जिससे वह रोज पढ़ने के लिए आए। दो बच्चों को पढ़ने से शुरु हुआ ये सिलसिला 30 बच्चों तक जा पहुंचा। जिससे वे अपनी पढ़ाई को ना छोड़ें। उन्होनें सभी बच्चों के लिए किताबों आदि का इंतजाम भी खुद से किया।
शमीम रिजवी इन बच्चों को लगातार पढ़ने के लिए प्ररित कर सकें इसके लिए वह सभी बच्चों को रोज खाने के चीजे देती हैं। बच्चों के साथ वे उनके त्यौहारों जैसे दीवालीॉ, क्रिसमस भी मनाती हैं। शमीम रिजवी ने बताया कि काम की तलाश में बच्चों के माता-पिता को अलग-अलग शहरों में जाने के चलते बच्चों को बीच में पढ़ाई छोड़ के जाना पड़ता है।