'बेटी की मौत ने हजारों 'बेटियों' की जिंदगी रौशन करने का दिया हौसला'
जब आप अपने किसी खास व्यक्ति को हमेशा के लिए खो देते हैं, तो कई बार जीवन आसान नहीं रह जाता। आप के जेहन में रह-रहकर उसकी याद आती है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। एक बीमारी के कारण मेरी बेटी धनेश्वरी पिछले साल गुजर गई। मुझे अपनी बेटी से बहुत लगाव था। मैं बता नहीं सकता कि उसे खोना मेरे लिए कितना पीड़ादायक रहा! अपनी बेटी के भविष्य के लिए मैंने कई योजनाएं बना रखी थीं।
वे सारी योजनाएं एक झटके में बिखर गईं। मैं कर्नाटक के कलबुर्गी शहर में रहता हूं। मैं शहर के मकतमपुरा में एमपीएचएस सरकारी हाई स्कूल में एक क्लर्क हूं। बेटी की मौत के बाद जब मैं ड्यूटी करने स्कूल जाता, तो मुझे वहां पढ़ने वाली हर बच्ची में धनेश्वरी का अक्स नजर आता। किसी काम से जब कोई बच्ची मेरे पास आती, तो मुझे यही लगता कि मेरे सामने मेरी बेटी खड़ी है। मेरे स्कूल में पढ़ने वाली कई लड़कियां ऐसी हैं, जो बेहद गरीब परिवारों से आती हैं।
क्लर्क होने के नाते मुझे अच्छी तरह से पता है कि कौन कब फीस जमा करता है। सरकारी स्कूल की कम फीस होने के बावजूद कई लड़कियां समय पर फीस नहीं जमा कर पाती हैं। फीस की वजह से इनकी पढ़ाई प्रभावित होती है। मैंने इन लड़कियों की मदद करने की सोची। मैंने जरूरतमंद बच्चियों की पहचान की और अपनी बेटी की स्मृति में इन गरीब लड़कियों की साल भर की फीस जमा करने का फैसला लिया। इ
स साल से मैंने स्कूल में पढ़ाई करने वाली गरीब लड़कियों की फीस चुकानी शुरू कर दी है। इस वर्ष मैंने पैंतालीस गरीब लड़कियों की स्कूल फीस जमा की है, जिसका खर्च करीब दस हजार रुपये आाया है। हालांकि जितनी मेरी आय है, उतने में यह काम कर पाना मुश्किल है। लेकिन मैंने इन बच्चियों को अपना मानकर इनकी मदद की है, क्योंकि अपनों की जिम्मेदारी उठाने में हिसाब नहीं लगाया जाता।
मैंने जिन लड़कियों की मदद की है, उन्हें मेरी बेटी के बारे में पता है। ये लड़कियां धनेश्वरी की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करती हैं। यह देखना मेरे लिए बेहद संतुष्टिदायक होता है। अपनी पत्नी के प्रति अपार प्रेम दर्शाने वाले दशरथ मांझी की तरह मैं पहाड़ नहीं खोद सकता, न ही मेरी औकात ताजमहल जैसी इमारत बनवाने की है। मैं अपनी बेटी धनेश्वरी की याद में जो सबसे बेहतर काम कर सकता था, वह कर रहा हूं।
यदि मेरी बेटी जीवित होती, तो उसके मन में अपनी जिंदगी को लेकर कुछ न कुछ अरमान पल रहे होते। और पिता होने के नाते मैं उसकी मदद कर रहा होता। अब जबकि वह इस दुनिया में नहीं है, मैं दर्जनों बेटियों की ख्वाहिशों को पूरा करने में मदद कर रहा हूं। उम्मीद है कि पढ़-लिखकर ये लड़कियां अपनी जिंदगी में वह सब कुछ हासिल कर लेंगी, जो मेरी अभागी बेटी हासिल नहीं कर पाई। भले ही बेटी की मौत के बाद ही सही, मैंने जरूरतमंदों के लिए कुछ करने का सुख पाया है। मैं यही चाहता हूं कि दूसरे लोग भी अपने आसपास मौजूद किसी भी तरह के वंचितों की हरसंभव मदद करें, ताकि ऐसे लोग अमूल्य जीवन पाकर भी मात्र किसी अभाव के कारण अपनी सांसों की गिनती पूरी न कर लें!
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।