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भूख का कोई मजहब नहीं होता, देश में अलग-अलग आठ जगहों पर लंगर चला रहे हैं अजहर

Fri, 23 Mar 2018 01:43 PM IST
अजहर मक्सुसी
अजहर मक्सुसी Updated Fri, 23 Mar 2018 01:43 PM IST
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Azhar Maqsusi heart opens for poor people under the flyover in Hyderabad
Azhar Maqsusi

मेरी परवरिश हैदराबाद के एक पुराने इलाके में हुई है। 1984 में मैं करीब चार साल का था, जब मेरे वालिद ऊपर वाले को प्यारे हो गए थे। परिवार पालने के लिए मेरी मां को कई तरह की दिक्कतें हुईं। घर की जिम्मेदारियों का ही बोझ था कि पांचवीं जमात तक उर्दू पढ़ने के बाद मैं आगे स्कूल नहीं जा सका। वक्त के तकाजे को देखते हुए छोटी उम्र से ही मैं एक दर्जी की दुकान पर काम सीखने लगा।

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एक रुपये साठ पैसे में एक किलो चावल मिलने के उस दौर में मुझे पूरे दिन काम करने के बाद एक रुपये मेहनताना मिलता था। मैं काम सीख रहा था, सो यह कमाई भी मेरे लिए कम नहीं थी। जिस दुकान में मैं काम करता था, उसके मालिक किसी वजह से दुकान बंद करके दूसरी जगह जा रहे थे। मैंने वह दुकान अपने जिम्मे ले ली और अगले पांच साल तक दर्जी का काम करता रहा। फिर सस्ते रेडीमेड कपड़ों का दौर आया। मेरे जैसे कई दर्जियों का धंधा चौपट हो गया।
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नतीजतन सिलाई मशीन छोड़ किसी दूसरे काम की तलाश कांच के काम पर खत्म हुई। पर उस नाजुक काम में एक दिन मेरा हाथ कट गया, जिससे मेरा काफी खून बह गया। मेरी मां ही क्या, कोई भी मां अपने बेटे का बहता खून देखकर घबरा सकती है। मां की सलाह पर मैंने कांच का काम छोड़ प्लास्टर ऑफ पेरिस डिजाइन का काम शुरू किया। छह साल पहले की बात है, मैं सुबह अपनी बाइक से दुकान पर जा रहा था। रोजाना के रास्ते में ट्रैफिक जाम था, सो मैंने रास्ता बदल लिया।

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बचपन में मेरा भी भूख से अनचाहा वास्ता पड़ा था

Azhar Maqsusi heart opens for poor people under the flyover in Hyderabad

नए रास्ते में एक पुल था। पुल के नीचे मैंने एक औरत को देखा, जिसके पैर कटे हुए थे और उसकी हालत बहुत बुरी थी। मैं उसके पास गया, तो पता चला वह भूखी भी है। मैंने होटल से खाना खरीदकर उसे खिलाया। उस दिन मैं दुकान तो चला गया, लेकिन उस महिला का भूखा चेहरा मुझे बार-बार याद आता। दरअसल बचपन में मेरा भी भूख से अनचाहा वास्ता पड़ा है।

मैं घर लौटा और पूरी कहानी पत्नी तथा मां को बताई। पत्नी ने मेरी बेचैनी पढ़ ली। मां तो मुझे देख खुश हो रही थीं, क्योंकि मेरी बेचैनी पर उनकी सीखों का असर दिख रहा था। अगले दिन जब मैं घर से बाहर निकलने लगा, तो मेरी पत्नी ने मुझे पंद्रह लोगों का खाना पकड़ा दिया और कहा कि इसे उस पुल के नीचे जरूरतमंदों में बांट देना।

मेरे काम की यह शुरुआत थी, जो आज तक बदस्तूर जारी है। पंद्रह लोगों का पेट भरने से शुरू हुआ यह सफर आज डेढ़ सौ लोगों तक पहुंच गया है। लेकिन ईमानदारी से मैं यह नहीं चाहता कि यह संख्या और बढ़े, क्योंकि इसका मतलब यही होगा कि शहर में भूखे लोग बढ़ रहे हैं। सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके पिछले साल मैंने 'दो रोटी अभियान' चलाया था, जिसमें मैंने देश भर के लोगों से अपील की कि वे घर से दो रोटी ज्यादा लेकर निकलें और सिग्नल पर भीख मांगने वाले बच्चों को पैसे देने के बजाय रोटी दें। मेरी अपील को हजारों लोगों ने हाथों-हाथ लिया।

मैं कोई नकदी मदद नहीं लेता, जिससे कई लोग मुझे राशन दान देते हैं। जब दान में मिले राशन की अधिकता हो जाती है, तो मैं उसे दूसरे शहरों में चल रहे भंडारों में भेज देता हूं। इस तरह देश के अलग-अलग आठ जगहों पर लंगर का मेरा नेटवर्क तैयार हो चुका है। मैं मुल्क के उन सभी लोगों का शुक्रगुजार हूं, जिन्होंने मेरी ख्वाहिशों को अंजाम तक पहुंचाया है।

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