NHAI: सुरंग इंजीनियरिंग-हाईवे सुरक्षा को मजबूत करने के लिए एनएचएआई और नॉर्वेजियन संस्थान के बीच समझौता
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने देश के हाईवे और सुरंग निर्माण को अधिक सुरक्षित और विश्व स्तरीय बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। भारत में कठिन और भूगर्भीय रूप से संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए NHAI ने नॉर्वे के प्रतिष्ठित संस्थान 'एनजीआई' (NGI) के साथ एक 5 साल का समझौता किया है, जिसके तहत अत्याधुनिक तकनीकों और भूस्खलन जैसी आपदाओं से बचाने वाले अर्ली वॉर्निंग सिस्टम पर मिलकर काम किया जाएगा।
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विस्तार
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) (एनएचएआई) ने भारत में राष्ट्रीय राजमार्ग बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए सुरंग इंजीनियरिंग, ढलान स्थिरता विश्लेषण और राजमार्ग सुरक्षा में तकनीकी विशेषज्ञता को मजबूत करने के लिए नॉर्वेजियन जियोटेक्निकल इंस्टीट्यूट (NGI) के साथ एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं।
इस समझौते का मुख्य उद्देश्य क्या है?
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार, ओस्लो (Oslo) में हाल ही में हस्ताक्षरित इस समझौते के निम्नलिखित मुख्य उद्देश्य हैं:
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अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञता का लाभ: इस साझेदारी का लक्ष्य महत्वपूर्ण राजमार्ग बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के नियोजन (प्लानिंग), डिजाइन, मूल्यांकन और निगरानी का समर्थन करने के लिए एडवांस्ड अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञता को भारत लाना है।
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चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों पर ध्यान: यह सहयोग विशेष रूप से भूगर्भीय रूप से संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर केंद्रित होगा।
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वैश्विक मानकों का विकास: यह गठबंधन भू-तकनीकी इंजीनियरिंग और प्राकृतिक आपदा न्यूनीकरण में एनजीआई की विशेषज्ञता का लाभ उठाकर वैश्विक मानकों के अनुरूप भारत के राष्ट्रीय राजमार्गों को विकसित करने और बनाए रखने के प्रति एनएचएआई की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
एनएचएआई और एनजीआई के बीच तकनीकी क्षमताएं कैसे मजबूत होंगी?
मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि एनएचएआई और एनजीआई के बीच यह सहयोग सुरक्षित, टिकाऊ और विश्व स्तरीय राष्ट्रीय राजमार्ग बुनियादी ढांचे के विकास में तकनीकी क्षमताओं को सुदृढ़ करेगा। इस समझौते के तहत एनजीआई निम्नलिखित परामर्श सेवाएं प्रदान करेगा:
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सुरंग परियोजनाओं के लिए साइट वर्गीकरण करना।
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व्यवहार्यता अध्ययन और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करना।
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संचालित हो रही सुरंगों का संरचनात्मक मूल्यांकन और सुरक्षा ऑडिट करना।
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एडवांस्ड ढलान स्थिरता मूल्यांकन प्रदान करना।
प्राकृतिक खतरों और भूस्खलन से निपटने के लिए क्या तकनीक अपनाई जाएगी?
बुनियादी ढांचे की सुरक्षा में सुधार और भूस्खलन व प्राकृतिक आपदाओं से जुड़े जोखिमों को कम करने के लिए आधुनिक तकनीकों का सहारा लिया जाएगा:
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इनसार डेटा का विश्लेषण: ढलानों के लिए इनसार (InSAR) डेटा का विश्लेषण और व्याख्या की जाएगी।
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अर्ली वॉर्निंग सिस्टम: पहाड़ी और संवेदनशील क्षेत्रों में ढलानों की निगरानी के साथ-साथ प्राकृतिक खतरों से पहले सचेत करने वाले अर्ली वॉर्निंग सिस्टम (Early warning systems) विकसित किए जाएंगे।
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संस्थागत क्षमता निर्माण: सुरंग निर्माण, ढलान स्थिरता विश्लेषण और ढलानों की निगरानी के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की सहायता करने के साथ-साथ संस्थागत क्षमता निर्माण पर जोर दिया जाएगा।
अनुसंधान, विकास और प्रशिक्षण को लेकर क्या योजनाएं हैं?
परामर्श सहायता के अलावा, दोनों संगठन अनुसंधान और विकास पहलों पर भी मिलकर काम करेंगे:
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संयुक्त कार्यक्रम: संयुक्त कार्यशालाओं, सेमिनारों और तकनीकी प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से प्राकृतिक खतरों को कम करने से संबंधित अनुसंधान और विकास पहलों पर सहयोग किया जाएगा।
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तकनीकी साहित्य का प्रकाशन: दोनों देश मिलकर इस क्षेत्र से जुड़े विशेष तकनीकी साहित्य का प्रकाशन भी करेंगे।
इस समझौते की अवधि और संचालन की शर्तें क्या हैं?
इस रणनीतिक साझेदारी के संचालन और समय-सीमा को लेकर नियम तय किए गए हैं:
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परियोजना-दर-परियोजना आधार: यह व्यवस्था गैर-विशेष रहेगी और परियोजना-दर-परियोजना के आधार पर संचालित होगी। इससे दोनों संगठनों को आवश्यकता पड़ने पर अन्य संस्थाओं के साथ स्वतंत्र रूप से सहयोग करने का लचीलापन मिलेगा।
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5 साल की वैधता: दोनों संस्थानों के बीच हस्ताक्षरित यह समझौता ज्ञापन पांच वर्षों के लिए वैध रहेगा।
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द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ावा: मंत्रालय के अनुसार, यह साझेदारी बुनियादी ढांचा विकास, टिकाऊ इंजीनियरिंग प्रथाओं और प्रौद्योगिकी के आदान-प्रदान में भारत और नॉर्वे के बीच बढ़ते सहयोग को दर्शाती है। साथ ही दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक संस्थागत सहयोग को बढ़ावा देती है।
एनएचएआई और नॉर्वेजियन जियोटेक्निकल इंस्टीट्यूट (NGI) का यह पांच साल का करार भारत के पर्वतीय और कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में हाई-वे तथा सुरंग निर्माण को अधिक सुरक्षित और आधुनिक बनाने में मील का पत्थर साबित होगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर की तकनीकों और अर्ली वॉर्निंग सिस्टम के आने से भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय जान-माल के नुकसान को न्यूनतम करने में बड़ी मदद मिलेगी।