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Green Hydrogen:ग्रीन हाइड्रोजन क्या है? भारत में 35 इंजन इस तकनीक से होंगे तैयार, हर ट्रेन की कीमत करोड़ों में
Tue, 02 Sep 2025 09:20 PM IST
अमर शर्मा
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अमर शर्मा
Updated Tue, 02 Sep 2025 09:20 PM IST
सार
भारतीय रेलवे ने हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेन का सफल ट्रायल किया। अब 35 ग्रीन हाइड्रोजन ट्रेनें तैयार होंगी, जिनकी लागत होगी ₹80 करोड़ प्रति ट्रेन। जानें क्या हैं इसके फायदे और पहला रूट।
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Hydrogen Train
- फोटो : AdobeStock
विस्तार
भारत में पहली बार भारतीय रेलवे ने हाइड्रोजन से चलने वाले ट्रेन कोच का सफल ट्रायल किया है। यह तकनीक आने वाले समय में रेलवे के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है। दुनिया धीरे-धीरे कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में बढ़ रही है और इस कदम से भारत भी बड़ा योगदान देगा।
भारतीय रेलवे का लक्ष्य है कि 2070 तक अपने पूरे नेटवर्क को नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन वाला बनाया जाए। अभी ज्यादातर डीजल-इलेक्ट्रिक इंजन इस्तेमाल हो रहे हैं। लेकिन हाइड्रोजन ट्रेन इस दिशा में एक अहम विकल्प साबित हो सकती है।
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भारतीय रेलवे का लक्ष्य है कि 2070 तक अपने पूरे नेटवर्क को नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन वाला बनाया जाए। अभी ज्यादातर डीजल-इलेक्ट्रिक इंजन इस्तेमाल हो रहे हैं। लेकिन हाइड्रोजन ट्रेन इस दिशा में एक अहम विकल्प साबित हो सकती है।
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ग्रीन और सस्टेनेबल ट्रांसपोर्ट का विकल्प
हाइड्रोजन ट्रेन की सबसे बड़ी खासियत है कि यह बिजली से चलती है, लेकिन इसकी पावर ट्रेन के भीतर ही बनती है। जहां सामान्य इलेक्ट्रिक ट्रेन ऊपर से तारों से बिजली लेती है, वहीं हाइड्रोजन ट्रेन में हाइड्रोजन फ्यूल सेल टेक्नॉलजी का इस्तेमाल होता है।
इस तकनीक में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रतिक्रिया से ऊर्जा पैदा होती है और इसका एकमात्र बायप्रोडक्ट होता है - पानी का वाष्प। यानी इसमें कार्बन उत्सर्जन बिल्कुल भी नहीं होता।
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हाइड्रोजन ट्रेन की सबसे बड़ी खासियत है कि यह बिजली से चलती है, लेकिन इसकी पावर ट्रेन के भीतर ही बनती है। जहां सामान्य इलेक्ट्रिक ट्रेन ऊपर से तारों से बिजली लेती है, वहीं हाइड्रोजन ट्रेन में हाइड्रोजन फ्यूल सेल टेक्नॉलजी का इस्तेमाल होता है।
इस तकनीक में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रतिक्रिया से ऊर्जा पैदा होती है और इसका एकमात्र बायप्रोडक्ट होता है - पानी का वाष्प। यानी इसमें कार्बन उत्सर्जन बिल्कुल भी नहीं होता।
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इस बिजली को ट्रेन की बैटरियों में स्टोर किया जाता है, जिससे ट्रेन को तेज गति और चढ़ाई चढ़ने में मदद मिलती है। साथ ही इसमें रेजेनरेटिव ब्रेकिंग तकनीक होती है, जो ब्रेक लगाने पर बनी ऊर्जा को दोबारा बैटरी में जमा कर देती है।
ग्रीन हाइड्रोजन, जो पानी के इलेक्ट्रोलिसिस से रिन्यूएबल एनर्जी की मदद से बनती है, इस तकनीक का मूल है। यही इसे पूरी तरह पर्यावरण-हितैषी बनाता है।
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ग्रीन हाइड्रोजन, जो पानी के इलेक्ट्रोलिसिस से रिन्यूएबल एनर्जी की मदद से बनती है, इस तकनीक का मूल है। यही इसे पूरी तरह पर्यावरण-हितैषी बनाता है।
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हाइड्रोजन ट्रेनों के फायदे
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- हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेन से धुआं या प्रदूषण नहीं निकलता, जिससे वायु और ध्वनि प्रदूषण दोनों कम होते हैं।
- यह ट्रेनें इलेक्ट्रिक और नॉन-इलेक्ट्रिक दोनों रूट्स पर चल सकती हैं, यानी इन्हें उन रास्तों पर भी चलाना आसान है जहां बिजली की तारें बिछाना मुश्किल या महंगा है।
- इन ट्रेनों को सिर्फ 20-25 मिनट में फिर से फ्यूल भरा जा सकता है, जो इन्हें और भी सुविधाजनक बनाता है।
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लागत और प्लान
भारतीय रेलवे हर साल भारी मात्रा में डीजल इस्तेमाल करता है। ऐसे में हाइड्रोजन ट्रेन से कार्बन उत्सर्जन कम होगा और ईंधन की बचत भी होगी।
हाल ही में चेन्नई में 1200 HP हाइड्रोजन ट्रेन कोच का सफल ट्रायल हुआ। रेलवे मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि रेलवे अब 35 हाइड्रोजन ट्रेनें लॉन्च करेगा, जिन पर प्रति ट्रेन लगभग 80 करोड़ रुपये खर्च आएगा। इसके अलावा हर रूट पर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए लगभग 70 करोड़ रुपये खर्च होंगे।
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भारतीय रेलवे हर साल भारी मात्रा में डीजल इस्तेमाल करता है। ऐसे में हाइड्रोजन ट्रेन से कार्बन उत्सर्जन कम होगा और ईंधन की बचत भी होगी।
हाल ही में चेन्नई में 1200 HP हाइड्रोजन ट्रेन कोच का सफल ट्रायल हुआ। रेलवे मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि रेलवे अब 35 हाइड्रोजन ट्रेनें लॉन्च करेगा, जिन पर प्रति ट्रेन लगभग 80 करोड़ रुपये खर्च आएगा। इसके अलावा हर रूट पर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए लगभग 70 करोड़ रुपये खर्च होंगे।
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पहला रूट: जींद-सोनीपत
हाइड्रोजन ट्रेन का पहला रूट जींद- सोनीपत कॉरिडोर (नॉर्दर्न रेलवे) चुना गया है। यह 356 किलोमीटर लंबा रूट है, जिस पर रोजाना दो बार ट्रेनों का आवागमन होगा। इससे ट्रेनों की परफॉर्मेंस, एफिशियंसी और फ्यूल इकॉनमी का डाटा इकट्ठा किया जाएगा।
इन ट्रेनों की इंजीनियरिंग और फिटिंग का काम चेन्नई स्थित इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) और मेधा सर्वो ड्राइव्स द्वारा किया जाएगा। हर ट्रेन में दोनों सिरों पर हाइड्रोजन इंजन होंगे और बीच में 8 कोच होंगे, जिनमें एक बार में 2,600 यात्री सफर कर सकेंगे।
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हाइड्रोजन ट्रेन का पहला रूट जींद- सोनीपत कॉरिडोर (नॉर्दर्न रेलवे) चुना गया है। यह 356 किलोमीटर लंबा रूट है, जिस पर रोजाना दो बार ट्रेनों का आवागमन होगा। इससे ट्रेनों की परफॉर्मेंस, एफिशियंसी और फ्यूल इकॉनमी का डाटा इकट्ठा किया जाएगा।
इन ट्रेनों की इंजीनियरिंग और फिटिंग का काम चेन्नई स्थित इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) और मेधा सर्वो ड्राइव्स द्वारा किया जाएगा। हर ट्रेन में दोनों सिरों पर हाइड्रोजन इंजन होंगे और बीच में 8 कोच होंगे, जिनमें एक बार में 2,600 यात्री सफर कर सकेंगे।
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