कार कंपनियों की पार्किंग बयां कर रही है ऑटो सेक्टर की मंदी, गाड़ियों को ग्राहकों का इंतजार
दिल्ली से सटे गुरुग्राम के मारुति प्लांट से महज 500 मीटर दूर कंपनी का पार्किंग लॉट है और यहीं पर कार ढोने वाले सैकड़ों ट्रक खड़े हैं। दूर-दूर तक बेतरतीबी से खड़े इन ट्रकों को देखकर नहीं लगता कि उन्हें कार लेकर दूर गंतव्य तक जाना है।
यहां सन्नाटा पसरा है, गाड़ियों की आवाजाही बंद है, ट्रकों के ड्राइवर पेड़ के छाए में ताश के पत्तों में मशगूल हैं, कोई खाना बना रहा है तो कोई खुद की साफ सफाई में व्यस्त है।
ये नजारा ऑटो सेक्टर में सुस्ती की खबरों का प्रतिनिधित्व करता हुआ लगता है।
ट्रक ड्राइवर बताते हैं कि उनके पास काम नहीं है। ट्रक हफ्तों से खड़े हैं और अगले ऑर्डर के इंतजार में महीना तक गुजर जा रहा है।
एक ट्रक ड्राइवर बब्लू कुमार यादव ने बताया कि पहले हमें महीने में तीन से चार चक्कर का काम मिल जाता था, लेकिन अभी हालत ये है कि महीने में एक चक्कर का काम मिल जाए तो वो भी गनीमत है।
वे कहते हैं, "हमारी कोई तनख्वाह नहीं होती बल्कि किलोमीटर के हिसाब से पेमेंट मिलता है। इंतजार के दौरान हमें ट्रक मालिक खुराक के लिए 200 रुपया प्रतिदिन देते हैं। हमारी हालत बेरोजगार जैसी हो गई है।"
बिक्री में दसवें महीने भी गिरावट
अभी कुछ दिन पहले ही ट्रक ऑपरेटर एसोसिएशंस ने कहा था कि वे अपनी गाड़ियों की किस्तें नहीं चुका पा रहे हैं इसलिए उनकी ईएमआई को आगे बढ़ा दिया जाए। सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबिल मैन्युफैक्चरर्स (सियाम) के अनुसार, अगस्त महीने में वाहन बिक्री में लगातार 10वें महीने भारी गिरावट दर्ज की गई।अगस्त के महीने में मारुति और ट्योटा समेत देश के छह अग्रणी कार निर्माता कंपनियों के पैसेंजर कार की बिक्री में 34 प्रतिशत की गिरावट आई। ट्रकों की बिक्री को आर्थिक गतिविधियों के मुख्य संकेतकों में से एक माना जाता है। सियाम के डेटा के अनुसार, टाटा मोटर्स और महिंद्रा एंड महिंद्रा के ट्रकों की बिक्री में 40 प्रतिशत की गिरावट आई है। इन दोनों कंपनियों के कॉमर्शियल वाहनों की बाज़ार में दो तिहाई हिस्सेदारी है।
बिक्री में गिरावट का असर वाहन निर्माता कंपनियों के उत्पादन पर पड़ा है और वहां छंटनी और शटडाउन की खबरें भी लगातार आने लगी हैं। अभी मारुति ने 7 और 9 सितम्बर को दो दिन के लिए उत्पादन रोकने की घोषणा की। जबकि अग्रणी कामर्शिलय वाहन निर्माता कंपनी लेलैंड ने पांच दिन के शटडाउन की घोषणा की।
ऐसी ही घोषणाएं कई अन्य कंपनियों ने भी की हैं। साथ ही कंपनियां अपने कार्यक्षमता को भी घटा रही हैं, जो छंटनी के रूप में सामने आ रहा है। मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड के चेयरमैन आरसी भार्गव ने बीते सप्ताह ख़ुद स्वीकार किया था कि कंपनी ने 3000 टेंपरेरी वर्करों के कांट्रैक्ट का नवीनीकरण नहीं किया।
गुरुग्राम और मानेसर में मारुति कंपनी के तीन बड़े प्लांट हैं, इसके अलावा यहां दोपहिया वाहन निर्माता कंपनियां हीरो मोटो कॉर्प और होंडा हैं और ये इस औद्योगिक इलाके की रीढ़ हैं क्योंकि बहुत सी वेंडर कंपनियां इनके लिए ही उत्पादन करती हैं।
लाखों नौकरियां गईं
इसलिए ऑटो सेक्टर में सुस्ती का असर ऑटो कंपोनेंट मेकर एंड वेंडर कंपनियों पर सीधा पड़ा है और बड़े पैमाने पर नौकरियां गई हैं। सियाम का अनुमान है कि देशभर में कई वाहन शोरूम बंद होने से करीब 2 लाख नौकरियां गईं जबकि ऑटो कंपोनेंट निर्माता कंपनियों में 1 लाख लोग बेरोजगार हुए हैं।
इसके मुताबिक, अप्रैल 2019 से अबतक ऑटो सेक्टर में कुल 315 लाख लोगों की नौकरियां जा चुकी हैं। सियाम के अध्यक्ष राजन वढेरा का मानना है कि जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) की दरों में कटौती करके मांग को बढ़ाया जा सकता है। वे कहते हैं कि मौजूदा बिक्री के आंकड़े बताते हैं कि सरकार को जीएसटी के मामले पर विचार करने की ज़रूरत है। अभी जीएसटी की दर 28 प्रतिशत है, इसे 18 प्रतिशत तक लाया जा सकता है।
दो साल से आ रहे थे संकेत
जाने माने अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार का कहना है कि ऐसा नहीं है कि यह गिरावट एकाएक आई है। प्रो अरुण कुमार का कहना है कि बीते दो तीन सालों में अर्थव्यवस्था को तीन बड़े झटके लगे हैं- नोटबंदी, जीएसटी और गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं का संकट। इसकी वजह से बेरोज़गारी बढ़ी है।
उनका कहना है कि इन झटकों से पैदा हुए असंगठित क्षेत्र का संकट अब धीरे-धीरे संगठित क्षेत्र को भी अपनी गिरफ्त में ले रहा है। इसलिए ऑटो सेक्टर जैसे संगठित क्षेत्र में मौजूदा सुस्ती उतनी हैरान नहीं करती है। उनके मुताबिक, "सीएमआई के आंकड़े दिखाते हैं कि देश में कर्मचारियों की संख्या 45 करोड़ थी, जो घट कर 41 करोड़ हो गई है। यानी चार करोड़ रोजगार में कमी आई।
जमीनी हकीकत भी बताते हैं कि ऑटो सेक्टर में सुस्ती की शुरुआत बहुत पहले ही हो गई थी और इस प्रक्रिया में कई कंपनियों पर ताले तल गए, हजारों नौकरियां चली गईं। हरियाणा के गुरुग्राम, मानेसर, धारूहेड़ा, बावल औद्योगिक क्षेत्र में इसके संकेत पिछले दो साल में देखे जा सकते थे।
संजय कुमार हरियाणा के मानेसर में मारुति की वेंडर कंपनी बेलसोनिका में दो साल से काम कर रहे थे, जब बीते दिसंबर में काम न होने का हवाला देते हुए उनके साथ सैकड़ों मजदूरों को निकाल दिया गया।
पूरे औद्योगिक क्षेत्र की हालत खराब
वे कहते हैं कि आठ महीने पहले कंपनी ने ये कहकर हमें निकाल दिया कि काम नहीं है। तबसे हम नौकरी ढूंढ रहे हैं और जहां भी जाते हैं पता चलता है कि भर्तियां बंद हैं। बेलसोनिका एंप्लाईज यूनियन के वाइस प्रेसिडेंट अजीत सिंह ने बताया कि बीते दिसम्बर से मार्च तक कंपनी ने करीब 400 कैजुअल मजदूरों की छंटनी कर दी है। परमानेंट मजदूरों की शिफ्टें कम कर दी गई हैं। मजदूर घर बैठ रहे हैं। पूरे औद्योगिक क्षेत्र की हालत खराब है।
मारुति उद्योग कामगार यूनियन (एमयूकेयू) के महासचिव कुलदीप जांगू कहते हैं कि बिक्री और उत्पादन में कमी के कारण मारुति के तीनों प्लांटों में होने वाली सीजनल भर्तियों में 25 फीसदी की कमी आई है। शिफ्टे कम कर दी गई हैं। वे कहते हैं कि ये सुस्ती पिछले छह महीने से चल रही थी लेकिन अभी दो महीने में हालात काफी खराब हुए हैं।
जांगू के मुताबिक, पिछले दो साल में गुरुग्राम से लेकर धारूहेड़ा तक करीब एक दर्जन कंपनियां बंद हुई हैं, कई कंपनियों में छंटनी हुई और 20-20 साल काम करने वाले परमानेंट वर्करों की नौकरियां चली गईं।
शटडाउन, छंटनी, तालाबंदी- ग्राउंड रियलिटी
आईएमटी मानेसर में एक कंपनी थी एंड्योरेंस टेक्नोलाजीज, जो हीरो और होंडा जैसी दोपहिया वाहन कंपनियों के लिए ऑटो पार्ट्स बनाती थी। एंड्योरेंस कंपनी की ट्रेड यूनियन के ज्वाइंट सेक्रेटरी अमित सैनी बताते हैं कि कंपनी ने 21 दिसम्बर 2018 को शटडाउन कर दिया और एक जनवरी 2019 को लॉकआउट की घोषणा कर दी। 164 परमानेंट वर्कर एक झटके में सड़क पर आ गए। कंपनी ने सारे ठेका मजदूरों का कांट्रैक्ट खत्म कर दिया था।
धारूहेड़ा में ऑटो पार्ट्स बनाने वाली कंपनी है रिको। जून 2018 में कंपनी ने 104 परमानेंट मजदूरों की छंटनी कर दी। मानेसर में ओमैक्स, गुरुग्राम में नपीनो और बिनोला औद्योगिक क्षेत्र में आरजीपी मोल्ड्स कंपनियां पिछले दो सालों में बंद हो गईं। गुरुग्राम में मजदूरों के बीच काम करने वाले ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता श्यामबीर शुक्ला ने बताया कि इस इलाके में पिछले दो साल में आठ ऐसे बड़े प्लांट बंद हो गए, जिनमें 800 से अधिक मजदूर काम करते थे।
वे कहते हैं कि ऑटो पार्ट्स बनाने वाली कंपनी ओमैक्स के चार प्लांट पिछले साल बंद हो गए- धारूहेड़ा और मानेसर में ओमैक्स के दो प्लांट और स्पीडो मैक्स और ऑटो मैक्स। इन चारों प्लांटों में ही करीब 12 हजार वर्कर थे।
ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) की महासचिव अमरजीत कौर का कहना है कि नोटबंदी और जीएसटी की वजह से जो सुस्ती आई है, उन कारणों पर सरकार ध्यान नहीं दे रही है और ना ही सरकार के पास कोई ठोस नीति नहीं है।
भारी सुस्ती को देखते हुए केंद्र सरकार ने भी कुछ कदम उठाने की घोषणाएं की हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बीते महीने बीएस-4 वाहनों की खरीद पर अगले साल मार्च तक छूट, वाहन लोन को आसान करने और रजिस्ट्रेशन फीस में बढ़ोत्तरी को अगले साल जून तक टाल देने समेत कई घोषणाएं कीं।
लेकिन राजन वढेरा का कहना है कि इन उपायों से बहुत कम फ़र्क़ पड़ने वाला है क्योंकि डीलरों को कर्ज देने में अभी भी भरोसे की कमी है और ग्राहक भी हाथ बांध कर खर्च करने में यकीन कर रहे हैं।
ऑटो सेक्टर और पूरी अर्थव्यवस्था में सुस्ती का शोरगुल भले ही अभी होना शुरू हुआ हो लेकिन इसके प्रबल संकेत लगातार मिल रहे थे जब कंपनियों में छंटनी, लेऑफ और लॉकआउट की घटनाएं लगातार सामने आ रही थीं।
सरकार को क्या करना चाहिए?
वढेरा कहते हैं कि सरकार जिन पैकेज की घोषणा कर रही है वे देश के बड़े कार्पोरेट घरानों और विदेशी निवेशकों की मांग के हिसाब से कर रही है। लेकिन इससे बहुत फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि ये बड़े औद्योगिक घरानों को लाभ पहुंचाएगा। उनके मुताबिक चूंकि बुनियादी बदलाव सरकार नहीं कर रही है इसलिए ये सुस्ती लंबी खिंच सकती है। इसका दूसरा कारण ये भी है कि वैश्विक मंदी भी नियंत्रण में नहीं है और उसका भी असर होना स्वाभाविक है।
प्रोफेसर अरुण कुमार का भी कहना है कि सरकार ने पैकेज की जो घोषणा की है या भविष्य में करेगी वो संगठित क्षेत्र के लिए है जबकि ज़रूरत है कि असंगठित क्षेत्र को राहत देने की, क्योंकि संकट भी पहले वहीं शुरू हुआ था।
अभी हाल ही में चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही के आंकड़े आए जिसमें कहा गया था कि अर्थव्यवस्था की विकास दर गिरकर पांच प्रतिशत हो गई है। इसके बाद पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस आर्थिक सुस्ती को 'मैन मेड' गलती करार दिया और आर्थिक प्रगति पर चिंता जताई। कुछ अर्थशास्त्रियों का भी कहना है कि जितना दिख रहा है स्थिति उससे कहीं भयावह है। प्रोफेसर अरुण कुमार के अनुसार, अर्थव्यवस्था के ये आंकड़े संगठित क्षेत्र पर आधारित हैं, चूंकि असंगठित क्षेत्र के आंकड़े पांच साल में आते हैं इसलिए वास्तविक जीडीपी का आंकड़ा और भी नीचे हो सकता है।