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रामायण: जब राजा दशरथ ने प्रभु श्रीराम को समझाया 'राजधर्म' का मतलब
Fri, 17 Apr 2020 07:12 AM IST
रुस्तम राणा
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: रुस्तम राणा
Updated Fri, 17 Apr 2020 07:12 AM IST
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रामायण का एक दृश्य
- फोटो : file photo
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रामायण में प्रभु श्रीराम का जीवन समस्त प्राणी मात्र के लिए एक आदर्श है। उनका जीवन हम सबके लिए एक प्रेरणास्रोत है, जो हमें यह सिखाता है व्यक्ति को किसी भी परिस्थिति में अपने कर्तव्यों का पालन करते रहना चाहिए। ऐसा ही एक कर्तव्य है 'राजधर्म'। राजधर्म शब्द का प्रयोग वर्तमान राजनीति में भी खूब होता है। राजधर्म का अर्थ है एक सत्ता या राजा का धर्म। रामायण में राजधर्म की व्याख्या बड़े ही सुंदर ढंग से की गई है। जो इस प्रकार है-
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अयोध्या में भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक होने वाला था। राज्याभिषेक के एक दिन पहले राजा दशरथ ने भगवान श्रीराम को राजधर्म का पाठ पढ़ाया था। राजा दशरथ ने श्रीराम से कहा, पुत्र राम, कल आपका राज्याभिषेक है। आपको राजमुकुट पहनाया जाएगा, परंतु यह याद रखना, जो राजमुकुट पहनता है वह स्वयं को अपने राज्य और अपनी प्रजा को सौंप देता है। एक राजा होने का अर्थ है सन्यासी हो जाना।
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अयोध्या नरेश ने आगे राजधर्म को समझाते हुए कहा, एक राजा का अपना कुछ नहीं होता है। सबकुछ राज्य का हो जाता है। बल्कि आवश्यकता पड़ने पर यदि राजा को अपने राज्य और प्रजा के हित के लिए अपनी स्त्री, संतान, मित्र यहां तक की प्राण भी त्यागने पड़े तो उसे संकोच नहीं करना चाहिए। क्योंकि राज्य ही उसका मित्र है और राज्य ही उसका परिवार है।
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जो राज्य की प्रजा के लिए अपना सबकुछ नहीं त्याग सकता उसे राजा बनकर अपनी प्रजा से कर लेने का भी कोई अधिकार नहीं है। राजा को अपने हर एक निर्णय से एक आदर्श और मर्यादा को स्थापित करना पड़ता है। क्योंकि जैसा राजा होता है प्रजा भी अपने राजा को देखकर उसका आचरण करती है। एक राजा की मूल शक्ति दंड नहीं है बल्कि न्याय है। न्याय जो पक्षपात से रहित हो।
राजा को राज्य का भगवान कहा गया है। क्योंकि राज्यवासियों का समस्त सुख-दुख और जीवन मरण उनके राजा के हाथों में होता है। इसलिए एक राजा के अंदर दया, क्षमा, उदारता एवं करुणा का भाव अवश्य होना चाहिए। वहीं युद्ध के समय राजा को अपनी सेना का नेतृत्व कर सबसे पहली पंक्ति में खड़ा होना चाहिए। क्योंकि जो राजा वीर नहीं होता, उसकी सेना भी उसका आदर नहीं करती है। एक राजा को ऋषियों, विचारकों और कवियों के आगे सदा नतमस्तक होना चाहिए। क्योंकि वे ही उसके सच्चे पद प्रदर्शक होते हैं।
एक राजा को अपने आलोचकों को भी संरक्षण देना चाहिए, ताकि वे उसकी कमियों को उसे बता सकें। राजा को अपने गुप्तचरों के माध्यम से अपने राज्य की पूर्ण खबर होनी चाहिए। अंत में राजा दशरथ ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम से कहा कि पुत्र राम मैं जानता हूं कि आप राजनीति के पूर्ण ज्ञाता हैं। परंतु एक जाने वाले राजा का ये कर्तव्य है कि वह आने वाले राजा को अपने अनुभवों को बताए। इस प्रकार राजा दशरथ ने भगवान श्रीराम को राजधर्म का पाठ पढ़ाया।