मप्र डायरी: 800 करोड़ की वसूली में 9 किलो सोना और मगरमच्छ, आखिर क्या हो रहा है प्रदेश में?
मध्यप्रदेश में सोने के भंडारों की खबर के बीच, काली कमाई के कई मामले सामने आए हैं। एक परिवहन विभाग के कांस्टेबल पर 800 करोड़ की अवैध वसूली का आरोप है, जिसकी जांच जारी है और वह दुबई भाग गया है। वहीं, एक पूर्व विधायक और भाजपा नेता के यहां 19 किलो सोना बरामद हुआ है।
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मध्यप्रदेश के सिंगरौली जिले में सोने के भंडार मिलने की तीन माह पहले आई खबर की खुशी पिघल भी न पाई थी कि राज्य के बाशिंदों को जंगलों और हवेलियों में मिले सोने के भंडारों ने चकित कर दिया। यूं टाइगर और चीता स्टेट कहे जाने वाले मध्यप्रदेश में देश की इकलौती हीरों की खदान भी है, लेकिन इस प्रदेश की धरती इस तरह दनादन सोना उगलेगी, यह सभी को हैरान करने वाला है।
ताजा धारावाहिक ट्रांसपोर्ट विभाग के पूर्व कॉन्स्टेबल का बीते माह जंगल में एक लावारिस कार में मिले 52 किलो सोने से शुरू हुआ तो इसी महीने एक पूर्व विधायक और बीड़ी निर्माता हरवंश सिंह राठौर सहित दो भाजपा नेताओं के यहां 19 किलो सोना जांच एजेंसियों ने बरामद किया। इनके साथ मिली नकदी तो अलग है ही। इतना ही नहीं राठौर के घर में पले दो मगरमच्छ भी मिले। बेशक मप्र की धरती शस्य श्यामला होने के साथ उपजाऊ भी है, लेकिन इस धरती से इस तरह इफरात में सोने की बारिश होने लगेगी, यह सोचकर ही हर मप्रवासी का मन हिलोरे लेने लगा है।
इससे यह भी पता चला कि राज्य में ट्रांसपोर्ट विभाग में लेन-देन का कारोबार किस ऊंचाई और गहराई तक चल रहा है। इतनी कार्रवाई के बाद भी जांच एजेंसियां अरबपति पूर्व कांस्टेबल सौरभ शर्मा को भारत नहीं ला पाई हैं। बताया जाता है कि वह तफरीह के लिए सपत्नीक दुबई गया था, सो अब तक नहीं लौटा। आरंभिक जानकारियों से पता चला है कि सौरभ ने ट्रांसपोर्ट बैरियरों, चेक पोस्टों व फ्लाइंग स्क्वाड से सात साल में 800 करोड़ की अवैध वसूली की, जिसका हिसाब उसकी डायरी में मौजूद है।
मप्र की यह ‘स्वर्णिम अपराध कथा’ अपने आप में कई रहस्य-रोमांच लिए हुए है। इसमें एक परिवहन विभाग के अदना सिपाही से लेकर ट्रांसपोर्ट कमिश्नर और कुछ मंत्री भी शामिल हैं। पैसे का खुला लेन-देन वहां स्थायी संस्कृति है। हाल में यह खुलासा भी हुआ कि प्रदेश के सभी अंतरराज्यीय बैरियरों को सरकार ने आधिकारिक रूप से भले बंद कर दिया हो, लेकिन उन्हीं बैरियर के पास विभाग के कर्मचारी और ठेकेदारों की अवैध वसूली बदस्तूर जारी है। जब यह मामला मीडिया में उछला तो ट्रांसपोर्ट कमिश्नर से लेकर कई और अधिकारी नप गए।
बीते साल अक्टूबर में आई एक खबर ने मप्रवासियों को गदगद कर दिया था कि प्रदेश के सिंगरौली और रीवा जिले में सोने के अथाह भंडार मिले हैं। इसे कर्नाटक के बाद देश में दूसरा सबसे बड़ा स्वर्ण भंडार बताया गया था। अगर ये सोना निकाला जाए तो देश में सालाना प्रति व्यक्ति आय की राज्यवार सूची में 25 वें स्थान पर पड़ा मप्र मालामाल हो जाएगा।
सूचना यह भी आई कि सोने के भंडारों पर बैठे सिंगरौली जिले में स्वर्ण खदानों की नीलामी प्रक्रिया भी चल रही है। सोने का सर्वे कर रही हरियाणा की कुंदन गोल्ड माइंस के अनुसार जिले की 149 हेक्टेयर भूमि कर सर्वे के बाद 7.29 मिलियन टन स्वर्ण अयस्क मिलने की आस बंधी है। अगर यह उम्मीद हकीकत में बदली तो मप्र के दिन फिर जाएंगे।
लेकिन इस खबर का क्लाइमेक्स पिछले साल दिसंबर में शुरू हुआ। भोपाल के पास मेंडोरी के जंगल में एक लावारिस कार बरामद हुई जिसमें 52 किलो सोना और 11 करोड़ कैश मिला। साथ में एक डायरी भी मिली, जिसमें किन-किन के नाम लिखे हैं, यह जानने और अपना नाम होने को नकारने की कोशिश तमाम नेता और अफसर कर रहे हैं। प्रदेश के पूर्व मंत्री और विधायक गोपाल भार्गव ने तो पहले ही कह दिया कि मुझे यकीन है, मेरा नाम डायरी में नहीं होगा। सरकार में परिवहन विभाग कामधेनु माना जाता है, जहां पैसे की हर स्तर पर वसूली और उसका शीर्ष स्तर पर पहुंचाना बरसों पुरानी रिवायत है, फिर चाहे सरकार किसी पार्टी की हो।
यही वजह है कि यह विभाग हथियाने मंत्री हर तरह का जोड़ तोड़ करते हैं। यानी विभाग का काम भले रूक जाए, लेकिन धन परिवहन का रथ कभी नहीं रूकता। परी कथा के नायक से लगने वाले सौरभ शर्मा की कहानी भी कुछ इसी तरह की है। जहां धनार्जन के आग्रही रसूखदारों ने पहले सौरभ की मदद की। बाद में सौरभ सभी को किनारे लगाकर खुद विभाग का अघोषित सरगना बन गया।
हालांकि यह बात सभी को पता थी, लेकिन अब कोई स्वीकार नहीं कर रहा। बताया जाता है कि सौरभ ग्वालियर के एक सरकारी डॉक्टर का बेटा है और उसे पिता के असामयिक निधन के बाद उसे अनुकंपा नियुक्ति मिली थी। उसकी मां उमा शर्मा कांग्रेस नेत्री हैं। ऐसी मां जिसने अपने बेटे से यह सवाल कभी नहीं किया कि इतनी काली कमाई कहां से आ रही है।
नियमानुसार सौरभ को अनुकंपा नियुक्ति स्वास्थ्य विभाग में ही मिलनी थी। लेकिन ग्वालियर क्षेत्र के एक पूर्व मंत्री और कांग्रेस नेता की मेहरबानी से उसकी तैनाती परिवहन विभाग में कांस्टेबल पद पर करवाई गई। दिमाग से तेज सौरभ ने शुरू में ही परिवहन विभाग में काली कमाई के गुर सीख लिए। सौरभ ने अपना एक वसूली गिरोह बना रखा था। इस अवैध आय से उसने बिजनेस पार्टनरों और रिश्तेदारो के नाम पर कई बेनामी सम्पत्तियां खरीद रखी थीं।
सौरभ की बेहिसाब कमाई का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उसके भोपाल स्थित आवास से चांदी की सिल्लियां मिलीं और उसकी पत्नी ने नवरात्रि में गरबा करने के लिए 17 लाख रू. का लहंगा खरीदा था। जब नकदी रखने और छिपाने की जगह नहीं बची तो सौरभ ने उसे सोने-चांदी में बदलने का सिलसिला शुरू किया।
कहा तो यह भी जाता है कि वह अफसर नेताओं को गिफ्ट के तौर पर भी सोना चांदी ही देता था। लेकिन इसी काले धंधों को उसके दोस्तों की ही नजर लग गई। किसी करीबी ने लोकायुक्त में शिकायत कर दी। लोकायुक्त ने जांच शुरू कर दी। फिर इनकम टैक्स, ईडी आदि एजेंसियों की एंट्री के बाद सौरभ पुराण अब हैरतनाक आख्यान में तब्दील हो चुका है। यहां तक कि कई लोगों को उसकी इस अकूत दौलत के बारे में जानकर ईर्ष्या होने लगी है।
9 दिन चले छापों में जांच एजेंसियों ने करीब 93 करोड़ की संपत्ति का पता लगाया। इस बीच राज्य के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच कर समुचित कार्रवाई की जाएगी। लेकिन सौरभ का परिवहन विभाग में आका कौन-कौन था, इसको लेकर सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी कांग्रेस में आरोप-प्रत्यारोप चल रहे हैं। आंच दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया तक जा पहुंची है, हालांकि सभी ने इस पूरे मामले में अपना हाथ होने का खंडन किया है।
सौरभ ने महज नौ साल में इतनी दौलत कैसे कूटी, कौन था उसका गॉडफादर, किन-किन लोगों ने इस बहती गंगा में हाथ धोए, इस गंगा का स्रोत कहां था, वसूली का पैसा किस किस की जेब में गया, उसे कैसे ठिकाने लगाया गया, सौरभ और उसका परिवार किस रईसी की जिंदगी जी रहा था, ऐसे कई सवालो के जवाब छन-छन कर सामने आ रहे हैं कि और लोगों को चौंका रहे हैं। यह चर्चा आम है कि जब एक सिपाही का यह जलवा है तो सिपहसालार का नूर क्या होगा?
सौरभ के बाद दूसरा स्वर्णिम धमाका सागर जिले के पूर्व भाजपा विधायक हरवंश सिंह राठौर व भाजपा के पूर्व पार्षद राजेश केसरवानी के यहां पड़े इनकम टैक्स छापों से हुआ। तीन दिन चली कार्रवाई में आईटी वालों ने 150 करोड़ से ज्यादा की टैक्स चोरी पकड़ी और दोनो के पास 200 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति का खुलासा किया। जिसमें 19 किलो सोना, 144 करोड़ के नकद लेन-देन और सात बेनामी लग्जरी कारें शामिल हैं। वैसे जानकारों का कहना है कि हरवंश सिंह राठौर के पास काफी पैतृक सम्पत्ति है। काफी बड़ा कारोबार है।
हरवंश सिंह व राजेश केसरवानी के भाजपा से जुड़े होने की जानकारी मिलने के बाद जांच एजेंसियों ने कार्रवाई धीमी कर दी। बहरहाल यह तो मानना पड़ेगा कि ‘बीमारू राज्य’ की श्रेणी से बाहर निकल चुका मप्र अब काली कमाई के स्वर्णिम मार्ग पर अग्रसर हो चुका है। यह सुनहरी कहानी अभी और नए मोड़ ले सकती है। आगे-आगे देखिए, सामने आता है क्या...!