Kundli 1st house: जानिए कुंडली के पहले भाव का महत्व और फल
कुंडली के पहले भाव से मुख्य रूप से जातक के स्वभाव और उसके व्यक्तित्व के बारे में विचार किया जाता है, इसलिए इसे स्वयं का भाव कहा जाता है।
विस्तार
Kundli 1st house: ज्योतिष को वेदों की कहा गया है। भारतीय ज्योतिष विद्या का जन्म वेदों से हुआ है। हिंदू ज्योतिष शास्त्र की संबंध ऋग्वेद से है, इसलिए इसे वैदिक ज्योतिष कहा गया है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र में आकाश मंडल में मौजूद सभी ग्रहों, राशियों और नक्षत्रों की गणना करते हुए पृथ्वी पर रहने वाला लोगों पर इसका कैसा प्रभाव पड़ता है इसका विश्लेषण किया जाता है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जन्म कुंडली में कुल 12 भाव या घर होते हैं। कुंडली में मौजूद सभी 12 भावों का अलग-अलग विशेष महत्व होता है। इन सभी 12 भावों में पहले भाव विशेष महत्व होता है। कुंडली के पहले भाव को लग्न या तनु भाव भी कहा जाता है। लग्न भाव से किसी जातक के पूरे जीवन चक्र का विचार होता है। कुंडली के पहले भाव से व्यक्ति का व्यक्तित्व, स्वभाव, शारीरिक संचरना आदि बातों का विचार होता है।
लग्न का महत्व
वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब कोई व्यक्ति इस पृथ्वी पर जन्म लेता है तो आकाश मंडल में मौजूद राशि, नक्षत्र और ग्रहों की स्थितियों के अनुसार उसका प्रभाव उसके ऊपर पड़ता है। आसान शब्दों में कहें तो जातक के जन्म के समय आकाश मंडल के पूर्वी क्षितिज जो राशि उदय होती है, वहीं जातक की लग्न हो जाता है। इसी लग्न के आधार पर संपूर्ण कुंडली का निर्माण होता है। कुंडली के निर्माण में सभी 12 भावों में ग्रहों ,राशियों और नक्षत्रों की स्थिति से जातक के भाग्य का निर्धारण होता है। जातक के जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि में बैठा होता है उस राशि को जन्म राशि या चन्द्र लग्न के नाम से भी जाना जाता है। चंद्र लग्न से भी कुंडली का विश्लेषण किया जाता है।
कुंडली के पहले भाव का महत्व
- कुंडली के सभी 12 भावों में पहला भाव जिसे लग्न भाव कहते है उसका विशेष महत्व होता है। कुंडली के पहले भाव से मुख्य रूप से जातक के स्वभाव और उसके व्यक्तित्व के बारे में विचार किया जाता है, इसलिए इसे स्वयं का भाव कहा जाता है। उत्तर-कालामृत के अनुसार कुंडली का पहला भाव मुख्य रूप व्यक्ति के शरीर के अंग, सेहत और मान-सम्मान से समेत कई अन्य विषयों से संबंधित होता है।
- कालपुरुष की कुंडली के अनुसार पहले भाव का कारक सूर्य देव होते हैं। कुंडली के पहले भाव से व्यक्ति की शारीरिक संरचना, स्वभाव, रंग-रूप, बुद्धि, बचपन और आयु का विचार किया जाता है। कालपुरुष की कुंडली में मेष और स्वामी मंगल होते हैं। कुंडली के पहले भाव के स्वामी को लग्नेश कहा जाता है। कुंडली में जो ग्रह लग्नेश होता है वही संपूर्ण कुंडली का सबसे मजबूत ग्रह होता है, अगर लग्न भाव क स्वामी कोई क्रूर ग्रह भी तो वह भी अच्छा ही फल प्रदान करता है।
- कुंडली के पहले भाव से व्यक्ति की शारीरिक बनावट और संरचना के बारे में पता चलता है। अगर कुंडली के पहला भाव पर जल से संबंधित ग्रहों का प्रभाव होता है तो व्यक्ति मजबूत कद-काठी और मोटा होता है, लेकिन अगर दूसरे ग्रहों का संबंध लग्न भाव से होता है तो जातक दुबला होता है।
- लग्न से जातक के स्वभाव और विचार के बारे में भी बहुत कुछ जानकारियां प्राप्त होती है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली का चौथा भाव, चौथे भाव के स्वामी, चंद्रमा, लग्न और लग्न भाव के स्वामी ग्रह पर शुभ ग्रहों का प्रभाव रहता है तो व्यक्ति बहुत ही शांत और दयालु स्वभाव का होता है।
- कुंडली के पहले भाव से व्यक्ति की आयु और सेहत से संबंधित बातों का भी विचार किया जाता है। जब किसी कुंडली में लग्न, लग्न भाव का स्वामी, सूर्य, चंद्रमा, शनि और तीसरा, आठवां भाव और इसके स्वामी बली हो तो जातक का स्वास्थ्य उत्तम रहता है।
- कुंडली के पहले भाव से व्यक्ति के मान-सम्मान और सुख के बारे में पता चलता है। अगर लग्न, लग्न भाव के स्वामी, चंद्रमा, सूर्य, दशम भाव और इस भाव का स्वामी मजबूत होता है तो व्यक्ति को अपने जीवन में अच्छा खासा मान-सम्मान मिलता है।
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