Guru Gochar 2025: कर्क राशि में गुुरु का गोचर बनेगा हंस महापुरुष राजयोग, इन राशियों को मिलेगी सफलता
Guru Gochar 2025: 19 अक्तूबर को गुरु अतिचारी होकर कर्क राशि में पहुंच जाएंगे। यानी गुरु तेज चाल से चलते हुए मिथुन से कर्क राशि में प्रवेश करेंगे। गुरु कर्क राशि में 11 नवंबर को वक्री हो जाएंगे। 5 दिसंबर को गुरु वक्री अवस्था में होकर मिथुन राशि में वापस लौट जाएंगे।
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Guru Gochar 2025: गुरु का गोचर वैसे तो 13 महीनों के अंतराल पर होता है लेकिन इस वर्ष गुरु अतिचारी होकर मिथुन राशि में गोचर हैं। गुरु का अतिचारी होने का मतलब गुरु अपनी सामान्य चाल से बहुत अधिक तेजी से चल रहे हैं। ऐसे में गुरु अब मिथुन से कर्क राशि में गोचर करने वाले हैं। कर्क राशि गुरु की उच्च की राशि होती है, जिससे हंस राजयोग का निर्माण हो रहा है। 19 अक्तूबर को गुरु अतिचारी होकर कर्क राशि में पहुंच जाएंगे। यानी गुरु तेज चाल से चलते हुए मिथुन से कर्क राशि में प्रवेश करेंगे। गुरु कर्क राशि में 11 नवंबर को वक्री हो जाएंगे। 5 दिसंबर को गुरु वक्री अवस्था में होकर मिथुन राशि में वापस लौट जाएंगे। गुरु के कर्क राशि में गोचर करने से कई राशि वालों को तरक्की, धन-दौलत और सुनहरा लाभ कमाने के मौके मिलेंगे। आइए जानते हैं गुरु के कर्क राशि में गोचर करने से मिथुन राशि वालों पर किस तरह का प्रभाव पड़ेगा।
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मिथुन राशि पर गुरु गोचर का प्रभाव
19 अक्तूबर गुरु के कर्क राशि में गोचर करने से यह आपकी राशि से दूसरे भाव में होने जा रहा है। कुंडली का दूसरा भाव धन और वाणी का होता है ऐसे में मिथुन राशि वालों को उनकी वाणी से मान-सम्मान की प्राप्ति होगी। नए-नए लोगों से अच्छे संबंध बनेंगे। इस दौरान आपको आर्थिक उन्नति के अच्छे योग बन रहे हैं। कार्यस्थल पर आपके काम की तारीफें होंगी। इस दौरान आपको जिस काम में सफलता नहीं मिल पा रही वह पूरी होगी। संतान सुख की प्राप्ति होगी जिससे आपकी इच्छाओं की पूर्ति होगीा। रिश्तों में मधुरता आएगी।
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वैदिक ज्योतिष में देवगुरु बृहस्पति का महत्व
- वैदिक ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति को गुरु का दर्जा प्राप्त है।
- गुरु धनु और मीन राशि के स्वामी होते हैं।
- कर्क राशि में गुरु उच्च के होते हैं जबकि मकर राशि में नीच के होते हैं।
- गुरु बृहस्पति को तीन विशेष द्दष्टियां प्राप्त है। पांचवी, सातवीं और नौवीं द्दष्टि।
- वैदिक ज्योतिष में गुरु बड़े भाई, शिक्षा, धन, संतान, ज्ञान और शिक्षा के कारक होते हैं।
- गुरु बृहस्पति पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रों के स्वामी होते हैं।
- जिन जातकों की कुंडली के पहले भाव यानी लग्न में गुरु स्वयं बैठ जाएं तो व्यक्ति बहुत ही भाग्यशाली और ज्ञानी होता है।
- कालपुरुष की कुंडली में गुरु नौवें और बारहवें भाव के स्वामी होते हैं और यह दूसरे, पांचवें, नौवें,दसवें और ग्यारहवें भाव के कारक होते है।
- गुरु के दूसरे भाव में यानी धन के भाव में होने पर जातक बहुत धनी और समृद्धिशाली रहता है।
-जब गुरु कुंडली के पांचवें भाव में होते हैं या फिर पाचवें भाव पर द्दष्टि डालते हैं तो जातक को उच्च शिक्षा और गुणी संतान की प्राप्ति होती है।
- नवम भाव में गुरु के होने पर व्यक्ति शिक्षा और ज्ञान में परांगत होता है। कुंडली का दशम भाव कार्यक्षेत्र, करियर या पेशे का होता है दशम में गुरु हो तो व्यक्ति समाज में खूब प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाला होता है।
- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली का ग्यारहवां भाव आय और लाभ का होता है। गुरु के इस भाव में होने पर जातक बहुत धन अर्जित करने में कामयाब होता है।
- गुरु के कमजोर होने पर जातक को लीवर, किडनी, मधुमेह, पीलिया, मोटापा और कैंसर जैसी बीमारी होने का खतरा रहता है।
- गुरु का रत्न पुखराज होता है। केले के वृक्ष को गुरु के रूप में पूजा जाता है। बृहस्पति गुरु पीले रंग का प्रतिनिधित्व करते हैं।