रक्षाबंधन के त्योहार पर सिरमौर की ग्रामीण महिलाओं ने पारंपरिक राखी को पर्यावरण संरक्षण और आत्मनिर्भरता से जोड़कर एक नई मिसाल पेश की है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़े स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं बांस, प्राकृतिक सामग्री और औषधीय पौधों के बीजों से आकर्षक राखियां तैयार कर रही हैं। खास बात यह है कि इन राखियों को इस्तेमाल के बाद फेंकने के बजाय मिट्टी में डालने पर इनमें मौजूद बीज से पौधा उग सकता है। इन इको-फ्रेंडली राखियों को तैयार करने में प्लास्टिक और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। महिलाओं ने स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों और अपने पारंपरिक हुनर का इस्तेमाल करते हुए राखियों को नया रूप दिया है। इन राखियों की सबसे खास विशेषता इनमें शामिल बीज हैं। राखियों में तुलसी सहित औषधीय और फूलदार पौधों के बीजों को आकर्षक तरीके से लगाया गया है। रक्षाबंधन के बाद यदि राखी को मिट्टी में डाल दिया जाए और उसे नमी व बारिश का साथ मिले, तो उसमें मौजूद बीज अंकुरित होकर पौधे का रूप ले सकते हैं। इस तरह भाई की कलाई पर कुछ समय तक सजी राखी बाद में हरियाली बढ़ाने का माध्यम बन सकती है। महिलाओं की यह पहल त्योहार की परंपरा को पर्यावरण संरक्षण के संदेश से जोड़ रही है। बाजार में मिलने वाली कई राखियों में प्लास्टिक और दूसरी ऐसी सामग्री का इस्तेमाल होता है, जो इस्तेमाल के बाद कचरे का हिस्सा बन जाती है। इसके मुकाबले सिरमौर की महिलाओं ने प्राकृतिक सामग्री से राखियां तैयार करने का विकल्प अपनाया है। बांस और अन्य प्राकृतिक वस्तुओं को रचनात्मक ढंग से इस्तेमाल कर इन राखियों को आकर्षक बनाया गया है। इससे पारंपरिक शिल्प को बढ़ावा मिलने के साथ पर्यावरण के प्रति जागरूकता का संदेश भी लोगों तक पहुंच रहा है। स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर ग्रामीण महिलाएं अब अपने हुनर को केवल घरेलू काम तक सीमित नहीं रख रही हैं, बल्कि उसे बाजार में बिकने वाले उत्पादों में बदल रही हैं। इको-फ्रेंडली राखियों की मांग ने उन्हें अतिरिक्त आय अर्जित करने का अवसर दिया है। समूह की सदस्य बबिता कौशल और पूजा के अनुसार, इन राखियों को बनाने में महिलाओं की मेहनत और रचनात्मकता दोनों शामिल हैं। उनका कहना है कि प्राकृतिक सामग्री से तैयार राखियों को इस्तेमाल के बाद भी उपयोगी बनाए रखने का प्रयास किया गया है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और विभिन्न सरकारी योजनाओं के माध्यम से स्वयं सहायता समूहों को आगे बढ़ने के अवसर मिल रहे हैं। सिरमौर की महिलाएं इन्हीं अवसरों का लाभ उठाकर अपने पारंपरिक कौशल को छोटे व्यवसाय में बदल रही हैं। इको-फ्रेंडली राखियों की पहल से महिलाओं की आमदनी बढ़ाने के साथ उन्हें पहचान भी मिल रही है। साथ ही, यह प्रयोग लोगों को त्योहारों में पर्यावरण अनुकूल विकल्प अपनाने के लिए प्रेरित कर रहा है।सिरमौर की महिलाओं की यह पहल भाई-बहन के रिश्ते की मिठास के साथ हरियाली और महिला आत्मनिर्भरता का संदेश भी दे रही है।