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क्या तुर्की को नाटो से निकालने की तैयारी है? अमेरिका ने लगाए हैं प्रतिबंध
Fri, 18 Dec 2020 06:54 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, अंकारा
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, अंकारा
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Fri, 18 Dec 2020 06:54 PM IST
सार
जुलाई 2019 में अमेरिका ने तुर्की को अपने एफ-35 जेट प्रोग्राम से बाहर कर दिया था। ये कदम भी तुर्की के रूस से हथियार खरीदने के फैसले के खिलाफ उठाया गया था...
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recep tayyip erdogan
- फोटो : Reuters
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विस्तार
क्या तुर्की के लिए उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) में बने रहना लगातार मुश्किल होता जा रहा है? यूरोप और अमेरिका के कूटनीतिक हलकों में ये सवाल इन दिनों चर्चा में है। इसी हफ्ते अमेरिका ने तुर्की पर प्रतिबंध लगा दिए।
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ये प्रतिबंध उस कानून के तहत लगाए गए, जो अमेरिका अपने ‘शत्रु’ देशों पर लागू करता है। तुर्की पर काउंटरिंग अमेरिका’ज एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शंस एक्ट (कास्टा) लागू करने का मतलब यह समझा जा रहा है कि अमेरिका नाटो के ही एक सदस्य देश को अब मित्र श्रेणी में नहीं रखता। जबकि इस सैनिक गठबंधन का नेता अमेरिका ही है।
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डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ये प्रतिबंध तुर्की के रूस से एस-400 वायु रक्षा प्रणाली खरीदने के फैसले के खिलाफ लगाए हैं। अमेरिका का कहना है कि ये रक्षा प्रणाली नाटो के उपकरणों से मेल नहीं खाती और यह इससे संधि में शामिल देशों के लिए खतरा पैदा हो सकता है। पाबंदियां तुर्की के रक्षा उद्योग प्रमुख, सैन्य खरीद एजेंसी, इस एजेंसी के प्रमुख और तीन दूसरे वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ लगाई गई हैं।
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इसके पहले जुलाई 2019 में अमेरिका ने तुर्की को अपने एफ-35 जेट प्रोग्राम से बाहर कर दिया था। ये कदम भी तुर्की के रूस से हथियार खरीदने के फैसले के खिलाफ उठाया गया था। गौरतलब है कि पहले तुर्की एफ-35 प्रोग्राम का अभिन्न हिस्सा था।
ये पहला मौका है जब अमेरिका ने अपने एक सहयोगी देश के खिलाफ ऐसे कदम उठाए है। इसीलिए नाटो में तुर्की के भविष्य को लेकर अनिश्चय पैदा हुआ है। पश्चिमी विश्लेषकों का कहना है कि नाटो का गठन ही सोवियत संघ का मुकाबला करने के लिए हुआ था। आज भी रूस को घेर कर रखना इसका प्रमुख मकसद है। इसलिए तुर्की के रूस से संबंध गहराने पर समस्याएं खड़ी होना लाजिमी हैं। ये अनुमान लगाए गए हैं कि पश्चिमी खेमे में पैदा हुई यह खाई रूस के लिए खुशखबरी होगी। अगर नाटो टूट जाए, तो रूस के लिए इससे अच्छी बात शायद ही कोई और हो सकती है।
फिलहाल नाटो के पूरी तरह बिखर जाने की संभावना न्यूनतम मानी जा रही है। फिर भी अगर तुर्की इससे अलग होता है, उसे इस संधि संगठन के लिए तगड़ा झटका माना जाएगा। खासकर यह देखते हुए कि अमेरिका के बाद नाटो को सबसे ज्यादा संख्या में सैनिक तुर्की ही उपलब्ध कराता है। तुर्की 1952 में नाटो में शामिल हुआ था। तब उसे आशंका थी कि सोवियत संघ उस पर हमला कर सकता है।
लेकिन अब हालात बदल गए हैं। इसलिए यह असंभव नहीं है कि अमेरिका के बढ़ते तबाव के बीच वह इस संधि को अलविदा कह दे। नाटो में इसके पहले सिर्फ एक ऐसा मौका 1967 में आया था, जब फ्रांस नाटो के कमांड स्ट्रक्चर से अलग हो गया था, हालांकि 2009 में वह फिर इसमें शामिल हो गया।
हाल के वर्षों में तुर्की के फ्रांस, ग्रीस और कई अरब देशों के साथ तनाव बढ़ा है। जिन अरब देशों से उसका तनाव बढ़ा है, लगभग वे सभी अमेरिका के पाले में हैं। दूसरी तरफ ग्रीस के साथ उसके टकराव में रूस ने तुर्की का समर्थन किया। इसीलिए हाल में अजरबैजान और आर्मीनिया की लड़ाई के दौरान तुर्की ने रूस के प्रति नरम रुख बनाए रखा। जबकि इस लड़ाई जहां तुर्की ने पाकिस्तान के साथ मिलकर अजरबैजान की खुलकर मदद की, वहीं रूस आर्मीनिया के पक्ष में था।
यह चर्चा भी है कि निकट भविष्य में चीन तुर्की के पक्ष में खड़ा हो सकता है। तुर्की के पाकिस्तान से बेहतर रिश्ते हैं, जिसके चीन से भी मधुर संबंध हैं। चर्चा है कि पाकिस्तान दोनों देशों के बीच मध्यस्थता कर रहा है। वैसे भी मौजूदा समय में चीन उन सभी देशों के साथ खड़ा हो रहा है, जिनके अमेरिका से संबंध बिगड़ रहे हैं। रूस के साथ भी चीन के अच्छे रिश्ते हैं। इसलिए आने वाले दिनों में एक ऐसी नई धुरी बन सकती है, जिससे तुर्की का नाटो में बने रहना और मुश्किल हो जाए।