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क्या धरती पर उगेगा दूसरा सूरज? चीन ने तैयार किया दुनिया का सबसे ताकतवर चुंबक; भारत कहां खड़ा है इस रेस में?
Wed, 29 Jul 2026 07:08 AM IST
प्रशांत तिवारी
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
Published by: प्रशांत तिवारी
Updated Wed, 29 Jul 2026 07:08 AM IST
सार
चीन ने परमाणु संलयन (फ्यूजन) के जरिए असीमित और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन की दिशा में बड़ी सफलता हासिल करते हुए 582 टन वजनी दुनिया का सबसे बड़ा सुपरकंडक्टिंग फ्यूजन चुंबक तैयार किया है। यह कृत्रिम सूर्य परियोजना का अहम हिस्सा है, जिससे 2030 तक बड़े पैमाने पर स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है।
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महाचुंबक
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
धरती को कृत्रिम सूर्य की रोशनी से चमकाने की चीन की कोशिशें फिर सुर्खियों में हैं। दरअसल, चीन ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए दुनिया का सबसे विशाल 582 टन वजनी चुंबक तैयार किया है। उसने दुनिया के सबसे बड़े सुपरकंडक्टिंग फ्यूजन मैग्नेट का सफल परीक्षण भी कर लिया है।
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क्या असीमित ऊर्जा पैदा करने में मदद करेगा यह विशाल चुंबक?
यह विशाल चुंबक परमाणु संलयन के माध्यम से असीमित ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए जरूरी प्रमुख घटक है। इसे तैयार करने के साथ चीन 2030 तक बड़े पैमाने पर संलयन ऊर्जा उत्पादन की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ गया है। इस चुंबक की भूमिका एक अत्यधिक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र तैयार करना है, जो प्लाज्मा (करीब 10 करोड़ डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने वाली अति-गर्म गैस) को रिएक्टर की दीवारों को छुए बिना उसके केंद्र में बनाए रखता है। इससे उत्पन्न होने वाली ऊर्जा बेहद अधिक और पूरी तरह कार्बन मुक्त होती है।
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क्या होगा इस चुंबक का आकार और कब तक पूरा होगा प्रोजेक्ट?
यह डी-आकार का सुपरकंडक्टिंग चुंबक 21 मीटर लंबा, 12 मीटर चौड़ा और 582 टन वजनी है। चीन को उम्मीद है कि उसका बर्निंग प्लाज्मा एक्सपेरिमेंटल रिएक्टर 2027 के अंत तक पूरा हो जाएगा, जिसके बाद संलयन ऊर्जा परियोजना को अगले चरण में ले जाया जाएगा।
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आखिर धरती का कृत्रिम सूरज कैसे काम करेगा?
यह परियोजना फ्यूजन यानी परमाणु संलयन तकनीक पर आधारित है, जिसमें हाइड्रोजन जैसे दो हल्के परमाणु आपस में मिलकर एक भारी परमाणु बनाते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान भारी मात्रा में ऊर्जा निकलती है। ठीक यही प्रक्रिया सूर्य के भीतर लगातार होती रहती है, जिससे उसका खौलता हुआ प्लाज्मा पृथ्वी तक रोशनी और गर्मी पहुंचाता है।
क्या भारत भी इस वैश्विक पहल का हिस्सा है?
संलयन ऊर्जा पर दुनिया का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट इंटरनेशनल थर्मोन्यूक्लियर एक्सपेरिमेंटल रिएक्टर (आईटीईआर) फ्रांस में चल रहा है। इसमें यूरोपीय संघ के अलावा भारत, चीन, रूस, जापान, अमेरिका और दक्षिण कोरिया शामिल हैं। इस परियोजना में रिएक्टर को सुरक्षित रखने के लिए इस्तेमाल होने वाला क्रायोस्टैट भारत ने तैयार किया है।
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तो फिर चीन की उपलब्धि की चर्चा क्यों हो रही है?
आईटीईआर दुनिया की सबसे बड़ी संलयन ऊर्जा परियोजना जरूर है, लेकिन उसका उद्देश्य केवल इस तकनीक का परीक्षण करना है, व्यावसायिक ऊर्जा उत्पादन नहीं। वहीं, चीन का नया सुपरकंडक्टिंग चुंबक आईटीईआर के लिए बनाए गए समकक्ष चुंबक की तुलना में आयतन में करीब 1.3 गुना बड़ा है। यही वजह है कि चीन की इस उपलब्धि को स्वच्छ और असीमित ऊर्जा की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।