Hezbollah: कौन है हसन नसरल्ला? कैसे तय किया गरीब शिया परिवार से हिज्बुल्ला प्रमुख तक का सफर, जानें
सैय्यद हसन नसरल्ला का जन्म 1960 में बेरुत में एक गरीब शिया परिवार में हुआ था। बचपन से ही धर्म के प्रति झुकाव रखने वाले हसन को 1975 में शुरू हुए लेबनानी गृहयुद्ध ने बहुत प्रभावित किया।
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इस्राइल और हिजबुल्ला के संघर्ष के बीच एक बड़ी खबर सामने आई है। हिजबुल्ला का प्रमुख हसन नसरल्ला मारा गया है। इस्राइली सेना ने इसकी पुष्टि कर दी है। इस्राइल की सेना आईडीएफ ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर साझा एक पोस्ट में लिखा है कि 'हसन नसरल्ला अब कभी दुनिया को आतंकित नहीं कर पाएगा'। आइए जानते हैं कि कौन हैं हसन नसरल्ला, जिनसे इस्राइली सेना परेशान थी।
बीते दिन इस्राइल ने लेबनान में मौजूद हिजबुल्ला के मुख्यालय पर बड़े पैमाने पर हमले किए। इस्राइली सेना ने मुख्यालय को निशाना बनाकर हिजबुल्ला के प्रमुख सैयद हसन नसरल्ला को मारने की कोशिश की थी और अब दावा है कि नसरल्ला की मौत हो गई है। हिजबुल्ला नेता हसन नसरल्ला पिछले तीन दशकों से लेबनानी सशस्त्र समूह का नेतृत्व कर रहा था, जिसने इसे दक्षिण एशिया के सबसे शक्तिशाली अर्धसैनिक समूहों में से एक बना दिया है।
गरीब परिवार में जन्मा नसरल्ला बना हिजबुल्ला प्रमुख
हसन नसरल्ला 1992 से हिजबुल्ला के प्रमुख हैं, जो लेबनान की मजबूत राजनीतिक और सैन्य ताकत है। हसन नसरल्ला को ना सिर्फ लेबनान बल्कि पश्चिम एशिया के प्रभावशाली लोगों में से एक माना जाता है। सैय्यद हसन नसरल्ला का जन्म 1960 में बेरूत के उत्तरी उपनगर शारशाबूक में एक शिया परिवार में हुआ, उसके पिता किराना दुकानदार थे। नसरल्ला बाद में दक्षिणी लेबनान आ गया। बचपन से ही धर्म के प्रति झुकाव रखने वाले हसन को 1975 में शुरू हुए लेबनानी गृहयुद्ध ने बहुत प्रभावित किया। उसने धर्मशास्त्र की पढ़ाई की और अमल आंदोलन में शामिल हो गया। वह 15 साल की उम्र में कुछ समय के लिए अमल संगठन में शामिल हो गया जो हिजबुल्ला के बनने से पहले शिया राजनीतिक और अर्धसैनिक संगठन था। उसके बाद नसरल्ला इराक के नजफ में एक मदरसा में पढ़ने चले गया, जहां से उन्हें 1978 में सद्दाम हुसैन की सत्ता ने अन्य लेबनानी छात्रों के साथ निष्कासित कर दिया गया।
1982 में लेबनान-इस्राइल संघर्ष के बाद हिजबुल्ला में शामिल हुआ
पहली बार इराक में नसरल्ला अपने गुरु प्रमुख मौलवी और हिजबुल्ला के सह-संस्थापक अब्बास अल-मुसावी से मिले। मुसावी के प्रभाव में आकर वे 1982 में लेबनान-इस्राइल संघर्ष के बाद हिजबुल्ला में शामिल हो गया, जब समूह अमल से अलग हो गया। हिजबुल्ला का गठन ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड के सदस्यों द्वारा किया गया था जो 1982 में लेबनान में इस्राइली सेना के साथ युद्ध करने के लिए आए थे। यह पहला समूह था जिसे ईरान ने समर्थन दिया। धीरे-धीरे हिजबुल्ला ईरान समर्थित गुटों और सरकारों के समूह का हिस्सा बन गया, जिसे 'प्रतिरोध की धुरी' के रूप में जाना जाता है। इसी दौरान नसरल्ला ने भी अपना एक आधार बनाया।
1992 में मुसावी की हत्या के बाद गुट का नेतृत्व संभाला
साल 1992 में इजरायली बलों ने हिजबुल्ला के उस वक्त के नेता सैय्यद अब्बास मुसावी की हत्या कर दी थी। इसके बाद हसन नसरल्ला ने इस गुट का नेतृत्व संभाला और हिजबुल्ला की सैन्य क्षमताओं और राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाया। लेबनान में 2018 के संसदीय चुनावों में हिजबुल्ला ने दमदार जीत दर्ज की थी। नसरल्ला के नेतृत्व में हिजबुल्लाह की राजनीतिक और सैन्य ताकत काफी बढ़ी है।
एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, साल 2014 के एक साक्षात्कार में नसरल्ला ने बताया था कि वे बंकर में नहीं रहते, लेकिन 'नियमित रूप से सोने के स्थान बदलने' की बात स्वीकार की थी।
इन देशों ने हिजबुल्ला को किया आतंकवादी संगठन घोषित
साल 2021 के एक भाषण में नसरल्ला ने दावा किया था कि हिजबुल्ला के पास एक लाख लड़ाके हैं, जो इसे विश्व स्तर पर सबसे शक्तिशाली गैर-राज्य सशस्त्र समूहों में से एक बनाता है। इस क्षेत्र में हिजबुल्ला को 'प्रतिरोध की धुरी' के रूप में जाना जाता है। हिजबुल्ला को अमेरिका, यूके, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, खाड़ी सहयोग परिषद और अधिकांश अरब लीग ने आतंकवादी संगठन घोषित किया है।
शिया समुदाय के बीच नसरल्ला काफी प्रसिद्ध
नसरल्ला का प्रभाव सैन्य संघर्ष से आगे तक है। उनके नेतृत्व में हिजबुल्ला लेबनानी राजनीति में एक प्रमुख खिलाड़ी बन गया है। 1992 से लेबनान के संसदीय चुनावों में समूह की भागीदारी के बाद से उसने अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत कर ली है। माना जाता है कि लेबनान के शिया समुदाय के बीच नसरल्ला को काफी माना जाता है।
इस्राइल से हिजबुल्ला लेता रहता है टक्कर
नसरल्ला ने खुद इस्राइल का बचपन से विरोध किया है और उसके नेतृत्व में हिजबुल्ला भी लगातार इस्राइल के साथ संघर्ष करता रहा है। इसमें कई बड़े टकराव भी शामिल है। इन संघर्षों के दौरान नसरल्ला की लोकप्रियता को उसके समर्थकों में बढ़ाया है, खासकर उन लोगों के बीच जो हिजबुल्ला को इस्राइली कब्जे के खिलाफ प्रतिरोध के प्रतीक की तरह देखते हैं।