उत्तराखंड: पार्टी नेताओं का दावा- राज्य में नया इतिहास रच सकती है भाजपा, कई समीकरणों से पार्टी की दावेदारी मजबूत
उत्तराखंड के गठन के समय से ही हर बार सरकारें बदलती रही हैं। लेकिन भाजपा नेताओं का दावा है कि इस बार वे दोबारा सरकार बनाकर नया इतिहास रचेंगे। पार्टी का दावा है कि राज्य की जनता उसके साथ है और इस चुनाव में पार्टी पिछली बार से ज्यादा सीटें हासिल करेगी...
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देवभूमि उत्तराखंड के गठन के बाद हुए पहले विधानसभा चुनाव से लेकर अब तक हर चुनाव में सरकारें बदलती रही हैं। जनता ने एक बार भाजपा तो दूसरी बार कांग्रेस को सरकार बनाने का अवसर दिया है। लेकिन भाजपा का दावा है कि इस बार सारे समीकरण उसके पक्ष में हैं और वह दोबारा जनता का विश्वास हासिल कर एक नया इतिहास रचेगी। पुष्कर सिंह धामी की मौजूदा सरकार के कामकाज, केंद्र की योजनाएं, विपक्ष की कमजोर तैयारी और नया इतिहास रचने के जोश से लबरेज कार्यकर्ताओं के दम पर पार्टी को लगता है कि वह जनता का विश्वास फिर से हासिल करने में कामयाब रहेगी।
भाजपा के पक्ष में हैं ये समीकरण
उत्तराखंड के युवाओं को देश की सेना में सेवा के लिए जाना जाता है। कहा जाता है कि यहां के हर दूसरे घर का एक जवान भारतीय सेना में काम करता है। केंद्र सरकार ने भारतीय सेना के जवानों के लिए जो काम किए हैं, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके बीच अपनी जो छवि बनाई है, माना जा रहा है कि भाजपा को उसका बड़ा लाभ मिल सकता है। सेना के रिटायर्ड जवानों के लिए 40 साल से रूकी ओआरओपी (वन रैंक वन पेंशन) योजना को स्वीकृति देकर केंद्र सरकार ने उन्हें बड़ा उपहार दिया है।
केंद्र और उत्तराखंड सरकार ने राज्य के बुनियादी ढांचे में बड़ा निवेश किया है। राज्य में मेडिकल कॉलेज से लेकर सड़कों तक में बड़ा निवेश किया गया है। राज्य के हिंदू धर्म गुरूओं को अपने साथ साधकर भाजपा ने बड़ा दांव खेला है। अयोध्या में राममंदिर के निर्माण के बारे में भाजपा नेता यहां खुलकर चर्चा करने लगे हैं। पार्टी को इसका लाभ मिल सकता है।
कोरोना काल में भी पार्टी का दावा है कि उसने हर एक गरीब परिवार तक पहुंचने और लोगों का इलाज कराने की सुविधा उपलब्ध कराई है। यही कारण है कि चार महीने के बीच तीन-तीन मुख्यमंत्री बदलने के बाद भी उत्तराखंड में भाजपा सरकार के विरुद्ध कोई जनाक्रोश नहीं है।
विपक्ष की कमजोर तैयारी
उत्तराखंड में कांग्रेस इस समय हरीश रावत के भरोसे चल रही है। वे अकेले सक्रिय और जनाधार वाले नेता हैं, लेकिन उनका साथ देने के लिए उनके पास कोई बड़ा नेता मौजूद नहीं है। पार्टी के बड़े नेताओं विजय बहुगुणा और सतपाल महाराज ने पहले ही पार्टी का साथ छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया है। ऐसे में अकेले हरीश रावत कांग्रेस की चुनावी गाड़ी कितना आगे तक खींच पाएंगे, इसे लेकर अभी से अटकलबाजी शुरू हो गई है। अगर चुनावी तैयारी में विपक्ष कमजोर पड़ता है तो इसका सीधा लाभ भाजपा को मिल सकता है।पर चुनौती भी कम नहीं
हालांकि, उत्तराखंड में भाजपा को वाक ओवर मिलने जैसी स्थिति भी नहीं है। विपक्ष की दावेदारी के बीच उसकी भी अपनी चुनौतियां हैं जिससे पार्टी को पार पाना होगा। पार्टी में मुख्यमंत्री बनने के दावेदारों की कमी नहीं है। राज्य से लेकर दिल्ली तक कई नेता मुख्यमंत्री बनने का सपना पाले हुए हैं और इनकी आपसी तनातनी भाजपा को नुकसान पहुंचा सकती है। इसके अलावा चार महीने के बीच तीन-तीन मुख्यमंत्री बदलने से भी अच्छा संकेत नहीं गया है। माना जा रहा है कि चुनाव में भाजपा को इसका नुकसान हो सकता है।हालांकि, भाजपा नेता इससे इनकार करते हैं। उत्तराखंड भाजपा के एक शीर्ष नेता ने अमर उजाला को बताया कि सच्चाई यह है कि पार्टी के पास बड़े जनाधार वाले नेताओं की कमी है। यहां पार्टी का कोई एक नेता इस कद का नहीं है जो यह दावा कर सके कि वह अपने दम पर पार्टी के लिए दस सीटें भी जीतकर ला सकता है। भाजपा का वोट राष्ट्रीय सोच की विचारधारा के कारण आता है। केंद्रीय नेता इसके केंद्र में बने रहते हैं।
सैद्धांतिक तौर पर किसी पार्टी के पास बड़े जनाधार वाले नेता का न होना, उसके लिए नुकसान का सौदा है। लेकिन भाजपा को इसका उत्तराखंड में लाभ यह मिला है कि कोई नेता पार्टी से बगावत करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। पार्टी ने तीन-तीन मुख्यमंत्री बदल दिए, लेकिन इसके विरोध में कोई आवाज नहीं उठी। चुनाव में भी भाजपा को इसी रणनीति का लाभ मिल सकता है।
एक अन्य नेता के मुताबिक, आम आदमी पार्टी राज्य में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रही है। वह यहां पर प्रमुख रूप से दलित और मुस्लिम वोटरों को लुभाने की कोशिश कर रही है। पार्टी यह मानकर चल रही है कि अगर आम आदमी पार्टी थोड़ा भी बेहतर प्रदर्शन करती है तो यह जितना भी वोट काटेगी, वह कांग्रेस का ही वोट बैंक होगा। पार्टी को लग रहा है कि इस स्थिति में कांग्रेस कमजोर होगी और इसका लाभ उसे मिल सकता है।
ये है सरकार पलटने का इतिहास
लंबे संघर्ष के बाद उत्तराखंड की स्थापना नौ नवंबर 2000 को की गई थी। पहली गठित अंतरिम विधानसभा में नित्यानंद स्वामी को उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनाया गया था। बाद में यह जिम्मेदारी भगत सिंह कोश्यारी को दी गई थी। वर्ष 2002 में उत्तराखंड का पहला विधानसभा चुनाव हुआ। पहले चुनाव में कांग्रेस को सफलता मिली। उसे 70 सीटों वाली विधानसभा में 36 सीटें मिली थीं। उसके नेता नारायण दत्त तिवारी राज्य के पहले चुने हुए मुख्यमंत्री बने। वे अब तक अपना कार्यकाल पूरा करने वाले इकलौते मुख्यमंत्री हैं।
वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में सत्ता पलट गई। भाजपा को पूर्ण बहुमत से केवल एक सीट कम यानी 35 सीटें मिलीं। उसने उत्तराखंड क्रांति दल और निर्दलीयों के समर्थन से सरकार बनाई। भुवन चंद्र खंडूरी राज्य के मुख्यमंत्री बने। पिछले चुनाव में सरकार बनाने वाली कांग्रेस को केवल 21 सीटें मिलीं और उसे विपक्ष में बैठना पड़ा। बसपा को आठ सीटें मिलना उत्तराखंड में पार्टी के लिए नई संभावना खोलने वाला था।
वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में सत्ता एक बार फिर पलट गई। विपक्ष में रही कांग्रेस सबसे ज्यादा 32 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी। उसने भी निर्दलीयों, बसपा और अन्य के साथ मिलकर सरकार बनाई और विजय बहुगुणा उसके मुख्यमंत्री बने। कांग्रेस से केवल एक सीट कम यानी 31 सीट लाने वाली भाजपा को विपक्ष में बैठना पड़ा। इस चुनाव में कांग्रेस को 14,36,042 या 33.79 फीसदी वोट मिले थे। वहीं भाजपा को 14,08,341 या 33.13 प्रतिशत वोट मिले थे।
वर्ष 2017 के पिछले विधानसभा चुनाव में भी उत्तराखंड की सरकार बदलने का सिलसिला जारी रहा। इस बार यहां भाजपा को 57 सीटों पर रिकॉर्ड जीत हासिल हुई तो कांग्रेस को केवल 11 सीटों से संतोष करना पड़ा। इस चुनाव में विशेष बात यह रही कि भाजपा ने 46.5 मत प्रतिशत पर पहुंच गई। तो पिछले चुनावों में राजनीति में एक नई आशा बनकर उभर रही बसपा का यहां से सफाया हो गया। हालांकि, बसपा ने इसके बाद भी सात प्रतिशत वोट हासिल कर अपनी उम्मीदें बरकरार रखी हैं।