बेखबर अमेरिका, दुश्मन 'ड्रैगन': अफगानिस्तान और इराक में उलझा रह गया यूएस और चीन ने अपनी ताकत बढ़ा ली!
विश्लेषकों का कहना है कि लेकिन उसी साल 11 सितंबर को हुए अमेरिका पर अल-कायदा के आतंकवादी हमलों (9/11) ने अमेरिका का ध्यान चीन से हटा दिया। अमेरिका में सिंगापुर के पूर्व राजदूत किशोर महबूबानी ने टीवी चैनल एनबीसी से कहा- ‘यह चीन के लिए अमेरिका का एक अविश्वसनीय उपहार साबित हुआ। आतंक के खिलाफ युद्ध पर पूरा ध्यान केंद्रित करना अमेरिका की बड़ी गलती थी, क्योंकि उसके लिए असली चुनौती चीन से आने वाली थी।’
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चीन की परमाणु क्षमता वाली सुपरसोनिक मिसाइल के ताजा परीक्षण से अमेरिकी मीडिया में इस बात पर गंभीर चर्चा शुरू हो गई है कि चीन रक्षा मामलों में इतना आगे कैसे निकल गया। विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि ऐसा होने के संकेत अप्रैल 2001 में ही अमेरिका को मिल गए थे, जब अमेरिका के निगरानी विमान ईपी-3 को चीन के लड़ाकू विमानों ने घेर लिया था। तब चीनी विमानों ने अमेरिकी विमान को आपातकालीन स्थिति में उतरने के लिए मजबूर कर दिया था। तब तत्कालीन जॉर्ज बुश प्रशासन ने राय जताई थी कि चीन अमेरिका के अगले प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभर रहा है।
विश्लेषकों का कहना है कि लेकिन उसी साल 11 सितंबर को हुए अमेरिका पर अल-कायदा के आतंकवादी हमलों (9/11) ने अमेरिका का ध्यान चीन से हटा दिया। अमेरिका में सिंगापुर के पूर्व राजदूत किशोर महबूबानी ने टीवी चैनल एनबीसी से कहा- ‘यह चीन के लिए अमेरिका का एक अविश्वसनीय उपहार साबित हुआ। आतंक के खिलाफ युद्ध पर पूरा ध्यान केंद्रित करना अमेरिका की बड़ी गलती थी, क्योंकि उसके लिए असली चुनौती चीन से आने वाली थी।’
‘हैज चाइना वोन’ (क्या चीन जीत गया है) नाम की किताब के लेखक महबूबानी ने कहा कि अमेरिका युद्ध लड़ने में लगा रहा, जबकि चीन व्यापार में जुटा रहा। साल 2000 में उसका सकल घरेलू उत्पाद 1.2 ट्रिलियन डॉलर था, जो 2020 में 14.7 ट्रिलियन डॉलर हो गया।
थिंक टैंक फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज से जुड़े विशेषज्ञ क्रेग सिंगलटन ने एनबीसी से कहा- ‘9/11 के बाद चीन ने यह समझ लिया कि अब अमेरिका का रणनीतिक ध्यान पूर्वी चीन सागर से तीन हजार किलोमीटर दूर केंद्रित रहेगा। इस अवसर का लाभ उठा कर चीन ने अपनी सैनिक क्षमताएं बढ़ाईं, जिसका मकसद पूर्वी एशिया में अपनी ताकत बढ़ाना रहा है।’
थिंक टैंक सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के वरिष्ठ उपाध्यक्ष जेम्स लुइस ने राय जताई है कि 9/11 से चीन के रणनीतिक लक्ष्य पहले भी वही थे। लेकिन इस घटना से उसे अमेरिका से अपने अंतर को घटाने का मौका मिल गया। ब्राउन यूनिवर्सिटी के कॉस्ट ऑफ वॉर प्रोजेक्ट (युद्ध की लागत परियोजना) के मुताबिक अमेरिका ने अफगानिस्तान और इराक से युद्ध में लगभग आठ ट्रिलियन डॉलर खर्च किए। लुइस के मुताबिक अमेरिका चाहता तो इस रकम का इस्तेमाल अनुसंधान और विकास, अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर को आधुनिक बनाने और हाई टेक हथियार बनाने में कर सकता था।
जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ फॉरेन सर्विस में प्रोफेसर इवान मेडियॉर्स ने एनबीसी से कहा- ‘हमने उन्हें 20 साल दे दिए। अपनी आज की प्रमुख चुनौती पर गौर करें, तो साफ होता है कि इस अवधि में हमने अपनी सेना को अप्रासंगिक युद्ध में लगाए रखा।।’ इस बीच चीन ने जहाज नष्ट करने वाली मिसाइलें बनाईं और अपनी नौसेना का विस्तार किया। उधर अमेरिकी सेना पश्चिमी एशिया में एके-47 राइफलों से लड़ती रही और अमेरिकी वायु सेना ऐसी जगह कार्रवाइयां करती रहीं, जहां उसे कोई चुनौती नहीं थी।
मेडियॉर्स न ध्यान दिलाया है कि 9/11 के हमलों के बाद तत्कालीन बुश प्रशासन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन का समर्थन पाने की कोशिश में उसके प्रति अपनी नीति बदल दी। तब से अमेरिका ताइवान और मानवाधिकार के मुद्दों पर आंख मूंदे रहा। मेडियॉर्स ने कहा- ‘चीन से कैसी आर्थिक चुनौती पेश आने वाली है, यह समझने में लोगों को वक्त लगा।’