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नौकरी देने में भेदभाव के आरोप में अमेरिकी सरकार ने फेसबुक पर ठोका मुकदमा

Fri, 04 Dec 2020 04:31 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 04 Dec 2020 04:31 PM IST
सार

  • फेसबुक ने 2600 पदों पर अमेरिकी से ज्यादा विदेशी कर्मचारियों को दी प्राथमिकता
  • अमेरिकी न्याय विभाग का दावाः विदेशियों को नौकरी देना है जुर्म!

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US government sues Facebook for discrimination in hiring the US employees
Facebook - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

अमेरिका में न्याय विभाग की एक कार्रवाई से ये अहम सवाल उठा है कि क्या अमेरिका में दूसरे देशों के कर्मचारियों को नौकरी देना अमेरिकी लोगों से “भेदभाव” है? इसमें निशाना वो लोग हैं, जो एच-1बी वीजा के जरिए अमेरिका आते हैं। इस वीजा पर अमेरिका जाने वाले तकनीक प्रोफेशनल्स में ज्यादातर भारतीय रहे हैं।

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अब अमेरिका के न्याय मंत्रालय ने फेसबुक कंपनी पर मुकदमा दायर कियाहै। इसमें इल्जाम लगाया गया है कि 2,600 पदों पर भर्ती करते वक्त फेसबुक ने उन विदेशी कर्मियों को प्राथमिकता दी, जिनके वीजा को उसने स्पॉन्सर किया था। न्याय मंत्रालय ने इसे अमेरिकी नागरिकों के साथ भेदभाव करार दिया है।
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न्याय मंत्रालय के बयान के मुताबिक सोशल मीडिया कंपनी फेसबुक ने जानबूझ कर ‘भेदभाव-पूर्ण’ नियुक्ति प्रणाली अपनाई। इसके तहत अस्थायी वीजा धारियों को योग्य अमेरिकी कर्मियों पर प्राथमिकता दी गई। अब मंत्रालय ने कहा है कि फेसबुक को उन अमेरिकी कर्मियों को मुआवजा देना चाहिए, जो फेसबुक के कथित भेदभाव भरे व्यवहार के कारण इस कंपनी में नौकरी नहीं पा सके।
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न्याय विभाग के अधिकारियों के मुताबिक इस विभाग ने दो साल तक फेसबुक के नौकरी देने के तरीकों की जांच की। इससे सामने आया कि कंपनी जानबूझ कर योग्य और दक्ष अमेरिकी कर्मियों को बाहर रखती है। ऐसा कम से कम 2,600 पर नियुक्ति करते समय किया गया। ट्रंप प्रशासन के सहायक अटार्नी जनरल एरिक डेरीबैंड ने कहा- टेक्नोलॉजी सेक्टर सहित सभी कंपनियों को हमारा संदेश है कि आप नियुक्तियों में गैरकानूनी प्राथमकिता नहीं दे सकते- अमेरिकी कर्मियों को नजरअंदाज कर अस्थायी वीजाधारकों की नियुक्ति नहीं की जा सकती।

कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि फेसबुक ने 2018 के आरंभ से उस साल तक सितंबर तक नियुक्तियों में भेदभाव का रुख अपनाया। अमेरिकी कर्मी अप्लाई ना कर सकें, इसके लिए उसने जानबूझ कर नौकरियों के विज्ञापन करियर वेबसाइट्स पर नहीं दिए। उसने ई-मेल के जरिए अर्जियां मंगवाईं। इसके बावजूद आई अमेरिकी नागरिकों की अर्जियों पर उसने विचार नहीं किया। कंपनी ने 99.7 फीसदी मामलों में अस्थायी वीजा धारक कर्मियों को तरजीह दी, जो परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोसेस के तहत अमेरिका लाए गए थे।

याचिका में कहा गया है कि ऐसे भेदभाव से न सिर्फ अमेरिकी नागरिकों को नुकसान होता है, बल्कि स्पॉन्सर्ड वीजा धारक भी बंधक बन जाते हैं। इस वीजा में ये शर्त होती है कि अगर उन्होंने नौकरी छोड़ी या उन्हें हटाया गया, तो अमेरिका में रहने का उनका अधिकार खत्म हो जाएगा। ये वीजा ग्रीन कार्ड से अलग होता है।

न्याय विभाग का कहना है कि परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोसेस के तहत कंपनियों को विदेशियों को अस्थायी वीजा स्पॉन्सर करने का हक है। लेकिन ऐसा वे तभी कर सकती हैं, जब वे यह साबित कर दें कि जिन पदों के लिए उन्हें लोग चाहिए, वैसे योग्य अमेरिकी नागरिक उपलब्ध नहीं हैं।

न्याय विभाग ने फेसबुक पर आरोप लगाया है कि उसने इमिग्रेशन एंड नेशनलिटी एक्ट का भी उल्लंघन किया है, जिसके तहत अमेरिकी कंपनियां नियुक्ति में राष्ट्रीयता या नागरिकता की स्थिति के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकतीं। फेसबुक ने याचिका में लगाए गए तमाम आरोपों का खंडन किया है। उसने दावा किया है कि उसने हमेशा न्याय विभाग के साथ सहयोग किया।

गुजरे समय में एच-1बी वीजा पर स्पॉन्सर्ड कर्मियों को विदेश से लाकर नौकरी देने का अमेरिका में खूब चलन रहा है। ऐसा कंपनियां कर्मचारियों पर अपनी लागत घटाने के लिए करती रही हैं। ट्रंप प्रशासन के सत्ता में आने के पहले ये चलन कभी बड़ा मुद्दा नहीं बना। डोनाल्ड ट्रंप ने ‘अमेरिका फर्स्ट’ का नारा उछालते समय अमेरिकी नौकरियां विदेशियों के हाथ में जाने को भी मुद्दा बनाया था।


ताजा मामले को भी उसी कड़ी में देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि जाते-जाते ट्रंप यह संदेश देना चाहते हैं कि अमेरिकियों के हितों की रक्षा सिर्फ वे कर सकते हैं। जब उनकी निगाहें 2024 में फिर चुनाव लड़ने पर है, तो अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में अपने पैगाम को पुख्ता करना उनकी एक सही रणनीति ही मानी जाएगी।

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