बाइडन के दो नए सिर दर्द: अफगानिस्तान में गलत निशाने से उठा विवाद और ऑकुस
वाशिंगटन स्थित विश्लेषकों का कहना है कि अगर बाइडन प्रशासन ने काबुल हवाई अड्डे पर हमले के बाद संयम का परिचय दिया होता और ऑकुस को अंजाम देने को लेकर बेसब्री नहीं दिखाई होती, तो अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया को आज जैसी आलोचना झेलनी पड़ रही है, उससे बचा जा सकता था...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
अमेरिकी विशेषज्ञों की राय है कि हाल की दो घटनाओं से विदेश नीति संबंधी राष्ट्रपति जो बाइडन की क्षमता पर गहरे सवाल उठे हैं। इनमें एक घटना अमेरिका के सैनिक अधिकारियों का यह स्वीकार करना है कि आईएसआईएस-खुरासन के आतंकवादियों को मारने के लिए अमेरिका ने अफगानिस्तान में जो हमला किया था, उससे असल में आम अफगान मारे गए। दूसरी घटना फ्रांस की भावनाओं की अनदेखी करते हुए ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के साथ अमेरिका का नया त्रिगुट बनाने का बाइडन प्रशासन का फैसला है।
अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन ने अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित एक विश्लेषण में कहा है कि अगस्त में काबुल हवाई अड्डे पर हमले के बाद जो सैनिक कार्रवाई अमेरिका ने की, उसके बारे में जो बात सामने आई है, उससे व्हाइट हाउस का ये दावा खोखला साबित हो गया है कि अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी एक सफल कार्रवाई रही।
इसी टिप्पणी में कहा गया है- ‘फ्रांस को अंधेरे में रखते हुए ऑकुस (ऑस्ट्रेलिया-यूनाइटेड किंगडम-यूनाइटेड स्टेट्स) बनाने के फैसले से एक प्रमुख यूरोपीय शक्ति अमेरिका के खिलाफ हो गई है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों जब दोबारा राष्ट्रपति निर्वाचित होने के अपने अभियान में जुटे हैं, तब बाइडन ने उनके लिए बेहद असहज स्थिति पैदा कर दी है।’ सीएनएन ने कहा है- बाइडन अगले कुछ दिनों में मैक्रों को फोन कर सफाई देने वाले हैं। लेकिन वे चाहे जो कहें, यह साफ है कि अमेरिका फ्रांस के साथ संवेदनशीलता के साथ पेश नहीं आया।
ऑकुस को लेकर उठा विवाद शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। यूरोपियन यूनियन के अधिकारियों ने कहा है कि इस बारे में अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया को जवाब देने होंगे। इन अधिकारियों ने कहा है कि ऑस्ट्रेलिया ने जिस तरह का व्यवहार फ्रांस से किया, उसे लेकर उसे फ्रांस से माफी मांगनी चाहिए। गौरतलब है कि फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया के बीच पनडुब्बी बनाने के लिए पहले करार हुआ था। लेकिन उसे रद्द करते हुए ऑस्ट्रेलिया ने ब्रिटेन और अमेरिका के साथ परमाणु क्षमता से लैस पनडुब्बियां बनाने का नया समझौता पिछले हफ्ते कर लिया।
ब्रिटिश अखबार द गार्जियन में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक इस घटनाक्रम के बाद यूरोपियन यूनियन के साथ ऑस्ट्रेलिया का संभावित मुक्त व्यापार समझौता खटाई में पड़ गया है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उरसुला वॉन डेर लियेन ने ऑस्ट्रेलिया से कहा है कि पहले वह अपने व्यवहार के बारे में फ्रांस के सामने स्थिति स्पष्ट करे। उन्होंने एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा- ‘ईयू के एक सदस्य देश के साथ ऐसा व्यवहार किया गया है, जो स्वीकार्य नहीं हो सकता। इसलिए हम जानना चाहते हैं कि क्या हुआ और ऐसा क्यों किया गया? इसलिए इसके पहले की संबंध फिर से सामान्य हों, उनको पहले स्पष्टीकरण देना होगा।’
खबरों के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया ऑकुस करार के बाद से दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन आसियान से जुड़े देशों के सामने लगातार सफाई दे रहा है। इस सिलसिले में ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरीसन ने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति जोको विडोडो को फोन किया। लेकिन मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक अब तक ऑस्ट्रेलिया सकारात्मक जवाब सिर्फ फिलीपींस से मिला है। फिलीपींस ने ऑकुस करार का स्वागत किया है।
वाशिंगटन स्थित विश्लेषकों का कहना है कि अगर बाइडन प्रशासन ने काबुल हवाई अड्डे पर हमले के बाद संयम का परिचय दिया होता और ऑकुस को अंजाम देने को लेकर बेसब्री नहीं दिखाई होती, तो अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया को आज जैसी आलोचना झेलनी पड़ रही है, उससे बचा जा सकता था।