US Election Results 2020: ओबामा की विरासत को ध्वस्त करने में ट्रंप हुए कामयाब! अमेरिका कैसे करेगा दुनिया का नेतृत्व?
- जलवायु परिवर्तन के लिए हुई पेरिस संधि से अलग हुआ अमेरिका
- ‘टाइम’ का सवाल - पेरिस संधि से अलग होकर कैसे करेगा दुनिया का नेतृत्व
- अब ओबामा केयर को खत्म करने की कोशिश में लगा अमेरिकी प्रशासन
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जिस रोज अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के वोटों की गिनती शुरू हुई, उसी दिन खबर आई कि अमेरिका औपचारिक रूप से जलवायु परिवर्तन के लिए हुई पेरिस संधि से अलग हो गया है। इस पर मशहूर अमेरिकी पत्रिका टाइम ने सवाल उठाया कि क्या अब फिर कभी अमेरिका जलवायु परिवर्तन रोकने की कोशिशों में दुनिया का नेतृत्व कर पाएगा? डोनाल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी ने इस चुनाव में पेरिस समझौते से अपने देश को अलग करने को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश किया था। इसे पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की विरासत से देश को मुक्ति दिलाने की कोशिश के रूप में भी उन्होंने पेश किया था।
ओबामा की एक और विरासत अफोर्डेबल केयर एक्ट है, जिसे ओबामा केयर भी कहा जाता है। इसके तहत हर अमेरिकी नागरिक के लिए मेडिकल बीमा का प्रावधान किया गया था। ये विरासत भी अगले हफ्ते दांव पर होगी, जब इसे दी गई चुनौती पर सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला देगा। सुप्रीम कोर्ट में कंजरवेटिव जजों की भरमार को देखते हुए ज्यादा संभावना यही है कि कोर्ट इस कानून को रद्द कर देगा।
राष्ट्रपति चुनाव की मतगणना में आगे चल रहे डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जो बाइडन अगर सचमुच जीत जाते हैं, तो उनके लिए इन दोनों मामलों में वापसी आसान नहीं होगी। इसकी वजह यह है कि इस बार हुए संसदीय चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवारों को तगड़ा धक्का लगा है। अमेरिका में प्रावधान यह है कि कोई अंतरराष्ट्रीय संधि तभी लागू हो पाती है, जब ऊपरी सदन सीनेट उसे पास कर दे। नई परिस्थितियों में अगर संभावित बाइडन प्रशासन पेरिस संधि में फिर से अपने देश को शामिल करता है, तब भी उसका संसदीय अनुमोदन करवा पाना उसके लिए बहुत मुश्किल होगा।
पेरिस संधि का अब तक 189 देश अनुमोदन कर चुके हैं। जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए इसे अब तक का दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। इसमें दुनिया के तापमान को औद्योगिक युग शुरू होने के समय से दो डिग्री नीचे तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। बराक ओबामा के कार्यकाल में ये करार हुआ था। तब अमेरिका ने इसे संपन्न करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
ट्रंप प्रशासन ने इससे हटने का फैसला किया। खुद अमेरिकी जानकार भी मानते हैं कि इससे अमेरिका की सॉफ्ट डिप्लोमेसी कमजोर हुई है। दूसरी तरफ चीन अब खुद को जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर विश्व के नेता के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है। हाल में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने जिस पंचवर्षीय योजना को मंजूरी दी है, उसमें जलवायु परिवर्तन रोकने के अनुकूल विकास नीति अपनाने की बात की गई है।
अमेरिकी जनमत के एक बड़े हिस्से में इस बात पर भी हैरत है कि जिस समय देश कोरोना महामारी के कहर से गुजर रहा है, उसी समय ट्रंप प्रशासन की ओबामा केयर को खत्म करने की मंशा पूरी होती दिख रही है। कोरोना महामारी से अमेरिका में 90 लाख से ज्यादा लोग संक्रमित हुए हैं, जबकि दो लाख 30 हजार से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। चुनाव नतीजों से जाहिर है कि जलवायु परिवर्तन या हेल्थ केयर जैसे मुद्दे अमेरिकी मतदाताओं के एक बड़े हिस्से के लिए अहम नहीं थे। इसके बजाय उन्होंने नस्लीय ध्रुवीकरण और ट्रंप के कंजरवेटिव एजेंडे के मुताबिक मतदान किया।