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US-China Tech War: तकनीक को लेकर अमेरिका और चीन आमने-सामने क्यों? जानें क्या है विवाद और किस पर पड़ेगा असर?

Sat, 22 Jan 2022 04:43 PM IST
प्रतिभा ज्योति प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Sat, 22 Jan 2022 04:43 PM IST
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सार
विश्लेषक मानते हैं कि आमतौर पर बीजिंग के मेड इन चाइना 2025 कार्यक्रम तकनीकी तनाव के ट्रिगर के रूप में काम करता है। दोनों के बीच आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस और 5 जी की तकनीक को लेकर होड़ है। 
 
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us china tech war news what is the technology tension between the us and china, what is its effect, un secretary general antonio guterres has called for dialogue and negotiation between the us and china over trade and technology
अमेरिका-चीन - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने अमेरिका और चीन के बीच चल रहे प्रौद्योगिकी तनाव को खत्म करने की अपील की है। उन्होंने दोनों राष्ट्रों से इस मुद्दे पर बातचीत के लिए आगे आने को कहा है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन के साथ अमेरिका के सालों पुराने प्रौद्योगिकी विवाद पर टिप्पणी करते हुए गुटेरेस ने कहा कि 'उन्होंने हमेशा एक एकीकृत वैश्विक बाजार और एक वैश्विक अर्थव्यवस्था की वकालत की है। लिहाजा वैश्विक बाजार और अर्थव्यवस्था के ध्रुवीकरण से बचने के लिए व्यापार और प्रौद्योगिकी पर अमेरिका और चीन को बातचीत करनी चाहिए। उन्होंने कहा हमें हर कीमत पर दुनिया को दो भागों में विभाजित करने से बचना चाहिए। वर्तमान समय में, कई मतभेद हैं,  मैं अमेरिका और चीन दोनों के साथ, एक गंभीर बातचीत के महत्व की वकालत करता रहा हूं।'

अमेरिका-चीन
अमेरिका-चीन - फोटो : Politico
क्या अमेरिका और चीन अब पूरी तरह से तकनीकी युद्ध में लगे हुए हैं? 
यह ट्रम्प प्रशासन के तहत शुरू हुआ लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भी इस नीति को जारी रखा है। दोनों देशों के बीच व्यापार संघर्ष में पहले से ही प्रौद्योगिकी प्रतिबंध शामिल थे। मई 2019 में, इन प्रतिबंधों को लेकर विरोध तब तेज हुआ जब हुवावे और उसकी सहायक कंपनियों को यूएस एंटिटी लिस्ट में जोड़ा गया। इस सूची में उन व्यक्तियों, संस्थानों और कंपनियों का विवरण दिया जाता है जिन्हें अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा माना जाता है।

अमेरिका के संघीय संचार आयोग ने अमेरिका के सुरक्षा संबंधी हितों को ध्यान में रखते हुए चीन की कंपनी हुआवे और जेटीई को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया। साथ ही अमेरिकी प्रशासन ने चीनी टेक कंपनियों को उन्हें अपने सामान और सेवाओं के उत्पादन में अमेरिकी तकनीक का उपयोग करने से रोक लगा दिया और दोनों कंपनियों को बैन कर दिया। इससे पहले ट्रम्प प्रशासन ने भी व्यक्तिगत डेटा लीक होने के डर से अमेरिका में चीनी एप टिकटॉक पर प्रतिबंध लगाने के लिए कदम उठाया था, और कई चीनी एप पर प्रतिबंध लगाए गए।

बाइडेन प्रशासन भी चीन की टेक कंपनियों पर जबरदस्त दबाव बनाए हुए है। कहा जाता है कि बाइडन प्रशासन ने अमेरिका के कुछ सहयोगी देशों को चीनी कंपनी हुवावे का 5 जी नेटवर्क खरीदने से रोकने के लिए मजबूर किया है। 

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (फाइल फोटो)
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (फाइल फोटो) - फोटो : Twitter
इसकी कहानी क्या?  
प्रोद्योगिकी को लेकर तनाव एक व्यापार विवाद के रूप में शुरू हुआ, लेकिन जल्द ही 5G, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस  और सेमीकंडक्टर्स जैसी प्रमुख तकनीक  को लेकर नेतृत्व की लड़ाई में बदल गया। 

दरअसल अमेरिका, अनुसंधान, विकास और अविष्कार के अपने लंबे इतिहास के साथ, दशकों से वैश्विक तकनीक का नेता बना हुआ था,  जिसे अब चीन चुनौती दे रहा है। अमेरिका हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर में वह बहुत आगे है। फौजी ड्रोन, उपग्रह और सिस्टम अमेरिकी सेना को दुनिया में सबसे अधिक ताकतवर बनाते हैं। यही वजह है कि बाइडन चीन को रोकने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा रहे हैं। 

जब अमेरिका ने अपने नियंत्रण वाले कोर प्रोडक्ट सेमीकंडक्टर्स जैसे प्रौद्योगिकियों तक चीन की पहुंच को रोकना करना शुरू कर दिया, तो चीन ने अमेरिका के सप्लाई चेन को रोकने की कोशिश की। अमेरिका के इस कदम से चीन सेमीकंडक्टर के मामले में भी आत्मनिर्भर बनने की कोशिश कर रहा है। उसने स्वयं की विश्वस्तरीय चिप इंडस्ट्री बनाने के प्रयास शुरू कर दिए हैं। इसमें दस साल या अधिक समय लग सकता है। वहीं चीन बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट का इस्तेमाल कर अपनी डिजिटल ताकत को आगे बढ़ा रहा है।  

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग - फोटो : पीटीआई
तकनीकी युद्ध किस वजह से शुरू हुआ?
अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक इस बारे में आमतौर पर ‘मेड इन चाइना 2025’ के ब्लूप्रिंट की ओर इशारा करते हैं, जिसमें चीन को ‘विनिर्माण के क्षेत्र में विश्व शक्ति’ में बदलने की बात कही गई है। इसके लिए बीजिंग ने 2015 में 10 साल के लिए एक ब्लूप्रिंट तैयार किया था। माना जाता है कि इसके जरिए चीन तकनीक का केंद्र बनाने और 2025 तक सभी तरह की तकनीकी मैटेरियल की आपूर्ति के 70 फीसदी हिस्सा पर कब्जा करने का लक्ष्य रखता है। चीन प्लान 2025 की मदद से आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर दुनिया के उद्योगों पर हावी होना चाहता है। यह बात अमरीका को नागवार गुजर रही और उसने चीन के इस प्लान पर गंभीर चिंता जताई। 

अमेरिका के पूर्व वाणिज्य मंत्री विल्बर रॉस ने चीन की इस योजना को भयावह बताते हुए कहा था कि अमरीका की बौद्धिक संपदा को चीन की इस रणनीति से खतरा है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) ने तो अपनी एक रिपोर्ट में यह कहा  कि चीन ने अमेरिकी बौद्धिक संपदा और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की कथित चोरी की है और इसी रिपोर्ट में 5 जी प्रौद्योगिकी में हुवावे टेक्नोलॉजीज कंपनी के प्रभुत्व पर चिंता जताई गई, जिसके बाद  दोनों राष्ट्रों में एक व्यापक तकनीकी युद्ध छिड़ गया है। 

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन
अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन - फोटो : पीटीआई
क्या कोरोना महामारी ने तनाव बढ़ा दिया?  
विश्लेषक कहते हैं कि वैश्विक महामारी ने दोनों देशों के बीच तनाव तब और बढ़ा दिया जब अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने सेमीकंडक्टर, बैटरी  और चिकित्सा आपूर्ति जैसे मुख्य उत्पादों के लिए अमेरिकी आपूर्ति श्रृंखला की समीक्षा करने के लिए एक कार्यकारी आदेश जारी कर दिया। 

विशेषज्ञ इस तनाव को शीत युद्ध से भी ज्यादा खतरनाक बताते हैं और जिसे ‘तकनीकी शीत युद्ध’ कहा जा रहा है। नया युद्ध क्षेत्र सूचना तकनीक-सेमीकंडक्टर, डेटा, 5 जी मोबाइल नेटवर्क, इंटरनेट, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और क्वांटम कंप्यूटिंग से संबंधित है। माना जा रहा है कि यह तकनीक युद्ध अमेरिका-चीन के दायरे से निकलकर भारत समेत विभिन्न देशों के हितों को प्रभावित कर सकता है।
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