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जासूसी का आरोप: चीनी छात्रों पर प्रतिबंध लगाना भारी पड़ रहा है अमेरिका को?

Sat, 07 Aug 2021 03:01 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन Published by: Harendra Chaudhary Updated Sat, 07 Aug 2021 03:01 PM IST
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सार
सीएनएन ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि इस प्रतिबंध से न सिर्फ चीनी छात्रों को नुकसान हुआ है, बल्कि इससे अमेरिकी विश्वविद्यालयों को भी नुकसान उठाना पड़ रहा है। प्रतिबंध का शिकार वे छात्र हुए हैं, जो अति महत्वपूर्ण तकनीक के क्षेत्र में अनुसंधान कर रहे थे...
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US ban on Chinese students also harmed American universities
चीनी छात्र - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

पिछले साल मई में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के उन छात्रों के अमेरिकी विश्वविद्यालयों में दाखिला लेने पर रोक लगा थी, जिनके बारे में समझा जाता है कि उनके चीनी सेना से संबंध हैं। ऐसे छात्रों पर अमेरिका में पढ़ते हुए जासूसी करने का आरोप लगाया गया था। ट्रंप प्रशासन ने कहा था कि चीनी छात्र अमेरिकी टेक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा की व्यापक चोरी में लगे हुए हैं, ताकि चीन की सेना की क्षमता बढ़ाई जा सके।



टीवी चैनल सीएनएन ने अपनी एक ताजा रिपोर्ट में बताया है कि ट्रंप प्रशासन के उस फैसले के बाद से लगभग 1000 चीनी छात्रों पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है। चैनल ने यह भी कहा है कि इस बारे में उसने अमेरिका की मौजूदा सरकार से आधिकारिक आंकड़े हासिल करने की कोशिश की, लेकिन अधिकारियों ने उसे कोई जवाब नहीं दिया। चीन का कहना है कि उसके छात्रों पर प्रतिबंध राजनीतिक कारणों से लगाए गए हैँ।


सीएनएन ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि इस प्रतिबंध से न सिर्फ चीनी छात्रों को नुकसान हुआ है, बल्कि इससे अमेरिकी विश्वविद्यालयों को भी नुकसान उठाना पड़ रहा है। प्रतिबंध का शिकार वे छात्र हुए हैं, जो अति महत्वपूर्ण तकनीक के क्षेत्र में अनुसंधान कर रहे थे। इस रिपोर्ट के मुताबिक स्टेम (साइंस- टेक्नोलॉजी- इंजीनियरिंग- गणित) के क्षेत्र में अमेरिका में कुल जितने छात्र हैं, उनमें 16 फीसदी चीनी हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक में अमेरिका में जितने छात्र हैं, उनमें एक तिहाई ऐसे हैं, जिन्होंने ग्रैजुएशन चीन में किया है। सीएनएन ने ये आंकड़े शिकागो स्थित थिंक टैंक मार्को पोलो के हवाले से दिए हैं।

‘चाइना मिलेनियल्स: द वांट जनरेशन’ नाम की किताब के लेख एरिक फिश ने सीएनएन से कहा- ‘अमेरिका ने जो फैसला किया, उसका मतलब हजारों अति मूल्यवान चीनी छात्रों को उन महत्वपूर्ण क्षेत्रों से बाहर कर देना है, जिनका अमेरिका में अनुसंधान में बड़ा योगदान होता है।’ बीते मई में कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंध विभाग की उप प्रमुख वेंडी वोलफॉर्ड ने अमेरिका के विदेश मंत्री को एक पत्र लिखा। इसमें उन्होंने छात्रों के लिए भ्रामक स्थिति पैदा करने के सरकारी कदमों की आलोचना की। उन्होंने कहा- ‘अंतरराष्ट्रीय छात्रों का यहां आना जारी रहे, यह विश्व में अमेरिका की प्रमुख हैसियत कायम रखने के लिए जरूरी है। साथ ही यह बाकी दुनिया से हमारे सांस्कृतिक और राजनीतिक संबंध कायम रखने के लिए भी जरूरी हैं।’

फिश का कहना है कि अमेरिका ने जिस फैसले से खुद को नुकसान पहुंचाया, उससे चीन को फायदा हुआ है। इससे चीन को अपनी प्रतिभाओं को देश के अंदर बनाए रखने में मदद मिल रही है। चीन इस कोशिश में वर्षों से जुटा था कि उसकी सर्वोत्तम प्रतिभाएं अमेरिका जाने के बजाय चीन में ही रह कर रिसर्च करेँ।

थिंक टैंक विल्सन सेंटर के किसिंजर इंस्टीट्यूट ऑफ चाइना एंड द यूनाइटेड स्टेट्स के निदेशक रॉबर्ट डैली ने सीएनएन से कहा- ‘आज भी अमेरिकी शक्ति का सबसे बड़ा स्रोत हमारे विश्वविद्यालय हैं, जो दुनिया में सर्वश्रेष्ठ हैं। इन विश्वविद्यालयों की श्रेष्ठता उनके खुलेपन और अंतरराष्ट्रीय स्वरूप पर निर्भर करती है।’

अन्य विशेषज्ञों ने कहा है कि अमेरिकी विश्वविद्यालय दुनियाभर की सर्वोत्तम प्रतिभाओं को आकर्षित करते हैं। अब चीन भी छात्रों को आकर्षित करने के मामले में अमेरिका की बराबरी करने की तरफ बढ़ रहा है। उसकी आर्थिक इसकी बड़ी वजह है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ऐसे में अगर अमेरिका ने अपनी शैक्षिक श्रेष्ठता नहीं बनाए रखी, तो अंतरराष्ट्रीय प्रतिभाएं चीन की तरफ जाने लगेंगी।

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