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अमेरिकी सेना का प्लान: पांच ठिकानों पर लगेंगे परमाणु माइक्रोरिएक्टर, खर्च होंगे 2.2 अरब डॉलर; क्या है मकसद?

Thu, 27 Aug 2026 06:43 AM IST
निर्मल कांत वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन।
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन। Published by: निर्मल कांत Updated Thu, 27 Aug 2026 06:43 AM IST
सार

अमेरिकी सेना पांच सैन्य ठिकानों पर परमाणु माइक्रोरिएक्टर लगाने की योजना बना रही है। इस पर पांच साल में 2.2 अरब डॉलर तक खर्च होंगे और 20 से ज्यादा रिएक्टर लगाए जा सकते हैं। ग्रिड फेल होने पर भी इनसे बिजली मिलती रहेगी, क्या इससे सेना की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी? पढ़िए रिपोर्ट

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US Army to spend USD 2B to build nuclear microreactors at 5 bases to ramp up nuclear power
अमेरिकी सेना (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक

विस्तार

अमेरिकी सेना ने बुधवार को बताया कि वह न्यूयॉर्क से टेक्सस तक पांच सैन्य ठिकानों पर परमाणु माइक्रोरिएक्टर लगाने की योजना बना रही है। इनसे भरोसेमंद बिजली मिलेगी। इसके लिए सेना को व्यावसायिक बिजली ग्रिड पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
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यह घोषणा ऐसे समय हुई है, जब ट्रंप प्रशासन अमेरिका में परमाणु ऊर्जा का विस्तार करने पर जोर दे रहा है। इसका मकसद नई परमाणु तकनीक को बढ़ावा देना है। खासकर डाटा केंद्रों की बढ़ती बिजली जरूरत पूरी करने पर जोर है। इसके तहत बड़े परमाणु रिएक्टरों के लिए अरबों डॉलर के कर्ज दिए जा रहे हैं। उन्नत रिएक्टर डिजाइन और परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए एक पायलट कार्यक्रम भी चलाया जा रहा है। इसमें सैन्य और आम नागरिक दोनों क्षेत्रों के लिए काम किया जा रहा है।
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अमेरिका में अभी कोई भी परमाणु माइक्रोरिएक्टर व्यावसायिक बिजली ग्रिड को बिजली नहीं दे रहा है। सेना ने पांच कंपनियों को चुना है। इन्हें पांच साल में कुल 2.2 अरब डॉलर तक दिए जाएंगे। ये कंपनियां माइक्रोरिएक्टर की मालिक होंगी। इन्हें बनाएंगी और चलाएंगी। हालांकि, इसके लिए उन्हें तय किए गए प्रदर्शन मानकों को पूरा करना होगा। सेना को उम्मीद है कि 20 से ज्यादा परमाणु माइक्रोरिएक्टर बनाए और चलाए जाएंगे।
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उद्योग और सेना से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि माइक्रोरिएक्टर सैन्य ठिकानों के लिए मजबूत बिजली स्रोत दे सकते हैं। अगर मुख्य बिजली ग्रिड बंद हो जाए, तब भी इनसे जरूरी ढांचे को बिजली मिल सकती है। इन रिएक्टरों को कई साल तक दोबारा ईंधन भरने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

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सेना के सचिव डैन ड्रिस्कॉल ने कहा कि इन परियोजनाओं से सैन्य ठिकानों तक सुरक्षित और भरोसेमंद लगातार बिजली पहुंचाने की क्षमता तेजी से बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि सेना ऐसी ऊर्जा व्यवस्था बना रही है, जिससे दुनियाभर में सैन्य ताकत इस्तेमाल करने के लिए जरूरी ऊर्जा मिल सके। इसके लिए कमजोर पड़ सकने वाले बाहरी बिजली ग्रिड पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

ये अनुदान सेना के 'जेनस प्रोग्राम' का हिस्सा हैं। यह कार्यक्रम पिछले साल अगली पीढ़ी की परमाणु ऊर्जा विकसित करने के लिए शुरू किया गया था। अधिकारी चाहते हैं कि परमाणु तकनीक का विकास तेजी से आगे बढ़े। उन्नत रिएक्टरों के डिजाइन केवल प्रयोग और शुरुआती मॉडल तक सीमित न रहें। वे कई वर्षों तक बिजली देने में सक्षम हों।


सेना के प्रतिष्ठानों, ऊर्जा और पर्यावरण मामलों के प्रधान उप सहायक सचिव जेफ वैक्समैन ने इसे इस दिशा में 'सबसे आगे की नोक' बताया। उन्होंने बुधवार को पत्रकारों के साथ बातचीत में कहा कि सेना इसी बदलाव को लाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने साफ किया कि ये डिजाइन केवल अमेरिकी सेना के लिए नहीं बनाए जा रहे हैं।

परमाणु रिएक्टरों की लागत और सुरक्षा पर सवाल
आलोचकों का कहना है कि नए परमाणु रिएक्टर बहुत महंगे हैं। इनमें दूसरे ऊर्जा स्रोतों की तुलना में जोखिम भी ज्यादा है। वैक्समैन ने कहा कि किसी खराबी की स्थिति में ये रिएक्टर सुरक्षित तरीके से बंद हो जाएंगे। ये आकार में छोटे हैं। सेना इन्हें किसी सैन्य ठिकाने पर तब तक नहीं लगाएगी, जब तक इनकी सुरक्षा को लेकर पूरी तरह संतुष्ट न हो जाए। उन्होंने बताया कि सेना रेडियोधर्मी कचरे को हटाने के लिए ऊर्जा विभाग के साथ समझौते पर काम कर रही है। इन सैन्य ठिकानों पर रेडियोधर्मी कचरे को लंबे समय तक रखने की व्यवस्था नहीं होगी।

चुनी गई कंपनियां और उनके सैन्य ठिकाने ये हैं- 
  • नॉर्थ कैरोलिना के फोर्ट ब्रैग में एंटारेस न्यूक्लियर।
  • केंटकी के फोर्ट कैंपबेल में बीडब्ल्यूएक्सटी।
  • टेक्सस के फोर्ट हूड में जनरल एटॉमिक्स इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिस्टम्स।
  • जॉर्जिया के फोर्ट बेनिंग में रेडिएंट इंडस्ट्रीज।
  • न्यूयॉर्क के फोर्ट ड्रम में वेस्टिंगहाउस गवर्नमेंट सर्विसेज
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