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US: 'बीते दशकों में सबसे ज्यादा भारत समर्थक रहा अमेरिकी प्रशासन', विशेषज्ञ बोले- नए राष्ट्रपति के लिए यह कठिन
Sun, 05 Jan 2025 07:59 AM IST
बशु जैन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन
Published by: बशु जैन
Updated Sun, 05 Jan 2025 07:59 AM IST
सार
हडसन इंस्टीट्यूट थिंक-टैंक में इनिशिएटिव ऑन द फ्यूचर ऑफ इंडिया एंड साउथ एशिया की निदेशक अपर्णा पांडे ने बताया कि अमेरिका का मौजूदा बाइडन प्रशासन बीते दशकों में सबसे अधिक भारत समर्थक रहा है। किसी भी राष्ट्रपति प्रशासन के लिए इसका अनुसरण करना कठिन होगा। भारत के साथ अमेरिका के संबंध इसलिए मजबूत हुए।
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पीएम मोदी के साथ जो बाइडन
- फोटो : एक्स/@narendramodi
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विस्तार
अमेरिका-भारत संबंधों को लेकर बड़ा दावा किया गया है। एक थिंक टैंक की विशेषज्ञ ने कहा है कि बीते दशकों में अमेरिकी प्रशासन भारत का सबसे अधिक समर्थक रहा है और अगले राष्ट्रपति के लिए ऐसा करना कठिन होगा। क्योंकि आने वाला ट्रंप प्रशासन महाशक्ति के तौर पर राजनीति करने में विश्वास रखने वाला है।
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हडसन इंस्टीट्यूट थिंक-टैंक में इनिशिएटिव ऑन द फ्यूचर ऑफ इंडिया एंड साउथ एशिया की निदेशक अपर्णा पांडे ने बताया कि अमेरिका का मौजूदा बाइडन प्रशासन बीते दशकों में सबसे अधिक भारत समर्थक रहा है। किसी भी राष्ट्रपति प्रशासन के लिए इसका अनुसरण करना कठिन होगा। भारत के साथ अमेरिका के संबंध इसलिए मजबूत हुए क्योंकि यह अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के लिए महत्वपूर्ण है। भारत और अमेरिका के बीच सुरक्षा और रक्षा क्षेत्र में संबंधों में गहराई आई है।
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उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक पतन और भाड़े पर हत्या की घटना से जुड़े मुद्दे जैसी परेशानियों ने साझेदारी को पटरी से उतरने नहीं दिया। भारत की चिंता चाहे पाकिस्तान हो या चीन को ध्यान में रखा गया। अमेरिका ने चीन को लेकर भारत को खुफिया जानकारी और अन्य सहायता प्रदान की। हालांकि बांग्लादेश को लेकर दोनों के बीच असहमति बनी रही।
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ट्रंप प्रशासन के दौरान अमेरिका भारत संबंधों को लेकर उन्होंने कहा कि भारत ऐसे देशों में एक जिन्हें द्विदलीय समर्थन प्राप्त है। ट्रंप के प्रधानमंत्री मोदी के साथ अच्छे संबंध हैं और भारत के बारे में उनका समग्र दृष्टिकोण सकारात्मक है। प्रमुख पदों के लिए उनके नामित प्रतिनिधि माइक वाल्ट्ज, सीनेटर मार्को रुबियो ने लंबे समय से भारत के पक्ष में रुख व्यक्त किया है। इससे यह तो साफ है कि अधिकांश नीतियां जारी रहेंगी। ट्रंप के पिछले कार्यकाल में ही भारत-प्रशांत नीति, क्वाड और भारत के साथ उच्च प्रौद्योगिकी (एसटीए-1) साझा करना शुरू किया गया था। इसलिए इनमें से अधिकांश के जारी रहने की संभावना है।
उन्होंने कहा कि ट्रंप 2.0 की चीन के आर्थिक, तकनीकी और सैन्य विकास को पीछे धकेलने या रोकने की इच्छा के पीछे साफ है कि भारत को इस प्रयास में भागीदार के रूप में देखा जाए। जब पाकिस्तान की बात आती है तो देखना होगा कि चीजें कैसे आगे बढ़ती हैं, लेकिन अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं है कि चीजें सुधरेंगी। भारत-चीन संबंधों को लेकर ट्रंप 2.0 अपनी नीतियों और भारत के लिए बाइडन प्रशासन की समर्थन नीतियों को जारी रख सकता है। बांग्लादेश के मोर्चे पर हालात सुधर सकते हैं और दोनों देश एक साथ काम करने में सक्षम हो सकते हैं।
अर्पणा पांडे ने कहा कि ट्रंप प्रशासन के दौरान दीर्घकालिक व्यापार मतभेद, भारत से अवैध आव्रजन की उच्च दर और भारत और अधिकांश देशों से वैध आव्रजन चुनौती भरा रहेगा। साथ ही उच्च तकनीक साझा करने के बदले में भारत से कुछ मांगा जा सकता है, चाहे वह व्यापार क्षेत्र में हो या रक्षा बिक्री क्षेत्र में। ट्रंप प्रशासन मानवाधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता पर क्या नीति अपनाता है, यह देखना अभी बाकी है। ट्रंप प्रशासन ऐसा होगा जो सामरिक परोपकारिता में नहीं, बल्कि महान शक्ति राजनीति में विश्वास करता है। 78 वर्षीय ट्रंप 20 जनवरी को अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेंगे।